S M L

नकल रोकने के लिए बिहार सरकार को अभी और प्रयास करने होंगे

बिहार सरकार ने इस साल की परीक्षा में सराहनीय प्रयास किए हैं लेकिन अभी और कड़े कदम उठाए जाने जरूरी हैं

Surendra Kishore Surendra Kishore | Published On: May 30, 2017 07:33 PM IST | Updated On: May 30, 2017 07:34 PM IST

नकल रोकने के लिए बिहार सरकार को अभी और प्रयास करने होंगे

इंटरमीडिएट परीक्षा में नकल रोकने में बिहार सरकार को इस बार भी आंशिक सफलता ही मिल पाई है. लेकिन इससे यह उम्मीद जरूर बंधी है कि नकल रोकने के लिए अगर अगले वर्षों में भी इस साल की तरह ही कड़ाई जारी रही तो स्थिति पूरी तरह सुधर सकती है.

आश्चर्य की बात यह है कि पिछले साल टाॅपर घोटाले में बिहार इंटरमीडिएट परीक्षा बोर्ड के अध्यक्ष और सचिव सहित अनेक संबंधित लोगों की गिरफ्तारी के बावजूद कई नकल माफिया अब भी सक्रिय हैं.

1996 को माना जाता है कसौटी साल, कोर्ट ने दी थी दखल

patna-high-court

बिहार की परीक्षा को लेकर 1996 को कसौटी साल माना जाता है. उस साल की इंटर साइंस परीक्षा में करीब 15 प्रतिशत स्टूडेंट ही पास कर पाए थे. इस साल 30 प्रतिशत पास कर गए.

जबकि 1996 में बिहार के शिक्षण संस्थानों में आज की अपेक्षा शिक्षण की व्यवस्था बेहतर थी. यानी बदतर व्यवस्था के बावजूद रिजल्ट का प्रतिशत दुगना? इससे साफ लगता है कि गड़बडियां अब भी जारी है.

हालांकि इस साल नकल रोकने में शासन का प्रयास काफी अच्छा रहा. पर जब शिक्षा-परीक्षा तंत्र की रग-रग में नकल माफिया घुसे हुए हों तो कोई राज्य सरकार और अच्छी मंशा वाले परीक्षा बोर्ड अध्यक्ष भी कितना कुछ कर सकते हैं?

हालांकि हाल के पिछले वर्षों की अपेक्षा इस बार काफी कम नकल हुई है. फिर भी सरकार डाल-डाल तो नकल माफिया पात-पात!

याद रहे कि बिहार इंटर परीक्षा बोर्ड के अध्यक्ष लालकेश्वर सिंह सहित कई दुर्दांत नकल माफिया इन दिनों जेल में हैं.

गत वर्षों के धांधलीबाजों के खिलाफ बिहार सरकार ने अभूतपूर्व कार्रवाइयां की थीं .

पर आश्चर्यजनक बात यह है कि इतनी कठोर कार्रवाइयों और परीक्षा के बेहतर उपायों के बावजूद एक हद तक नकल करने वालों ने कर ही ली. हालांकि इस साल की नकल के अभी तक ठोस सबूत तो नहीं मिल सके हैं पर संकेत साफ हैं.

राज्य की शिक्षा और परीक्षा के गहरे जानकार बताते हैं कि राज्य सरकार का इस साल का प्रयास सराहनीय है, पर उसे अभी कुछ और प्रयास करने होंगे.

इस संदर्भ में एक पुराने प्रकरण की चर्चा मौजूं होगी. 1995 तक बिहार में शिक्षा व परीक्षा की हालत ऐसी दयनीय हो चुकी थी कि देश की कई राज्य सरकारों ने बिहार इंटर काउंसिल द्वारा जारी सर्टिफिकेट को मानने से ही इनकार कर दिया था.

सवाल सिर्फ इंटर शिक्षा का ही नहीं था. मैट्रिक सहित अधिकतर परीक्षाओं में नकल की पूरी छूट मिली हुई थी. उस स्थिति से ऊबकर पटना हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई. तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.पी.बाधवा और  बी.एन.अग्रवाल की खंड पीठ ने यह आदेश दिया कि जिलाधिकारी और प्रमंडलीय आयुक्त राज्य में नकलमुक्त परीक्षाएं आयोजित कराने के लिए जिम्मेदार होंगे. हाईकोर्ट ने जिला जजों को परीक्षा की निगरानी का भार सौंपा था.

परिणामस्वरूप 1996 में  मैट्रिक और इंटर की परीक्षाएं सचमुच नकलमुक्त  हुईं. जिलाधिकारी और एसपी भी कोई ढिलाई नहीं कर सके क्योंकि जिला न्यायाधीश भी नकलमुक्त परीक्षाओं की निगरानी कर रहे थे.

लालू के मंत्री ने दिया था बयान

Young Lalu Yadav

रिजल्ट के बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री जय प्रकाश नारायण यादव ने  4 जून 1996 को मीडिया को बताया कि ‘मैट्रिक और इंटर परीक्षाओं के परिणाम से यह जाहिर हो गया है कि बिहार में शिक्षा माफियाओं के पांव उखड़ गए हैं. फर्जी शिक्षण संस्थान अब स्वतः बंद हो जाएंगे.’

1996 की इंटर साइंस परीक्षा में  सिर्फ 15 प्रतिशत परीक्षार्थी पास कर सके थे. इधर पटना जिले में मैट्रिक परीक्षा में सिर्फ 16 प्रतिशत परीक्षार्थी ही सफल हो सके. कमोवेश ऐसा ही रिजल्ट पूरे बिहार के परीक्षार्थियों का रहा. नतीजतन काॅलेजों में एडमिशन के लिए छात्र -छात्रों का अकाल सा हो गया.

शिक्षा का व्यापार चला रहे अधिकतर कॉलेजों के बंद होने की नौबत आ गई. जिन्हें शिक्षा मंत्री ने शिक्षा माफिया करार दिया था,उन्हीं लोगों ने बाद में ऐसी जुगत भिड़ाई कि दोबारा नकल शुरू हो गई. यानी नकल की छूट दे दी गई.

1996 की कड़ाई के बाद के वर्षों में नकल की ऐसी छूट मिली कि एक दफा तो जो छात्र बिहार की परीक्षा में पूरे राज्य में प्रथम आया था,वह दिल्ली में ऊंची कक्षा में नामांकन के बाद एक सेमेस्टर भी पास तक नहीं कर सका.

बिहार इंटर काउंसिल के अध्यक्ष रह चुके नागेश्वर प्रसाद शर्मा ने अपनी चर्चित पुस्तक में लिखा है कि ‘पहचान हो बाहुबलि की,सदस्यता हो विधान सभा या विधान परिषद की,परवाह नहीं हो बदनामी की,मदांधता हो सम्पन्नता की और हवस हो दौलत की,तो सभी मुश्किलें अपने -आप आसान हो जाती हैं. शिक्षा उद्योग एक ऐसा उद्योग है जिसमें घाटे का प्रावधान नहीं. इस उद्योग में शुरुआती लागत की भी आवश्यकता नहीं.सिर्फ मॉडर्न टेकनिक के साथ-साथ हाई क्वालिटी के जन संपर्क की अनिवार्यता है इस उद्योग में’

इस उद्योग से जुड़े एक ‘कारखाने’ का जिक्र अपनी पुस्तक ‘इंटर काउंसिल एक हकीकत ’ में किया है शर्मा जी ने।उस कारखाने का नाम है वी.आर.कालेज,कीरत पुर, जिला वैशाली।

राज्य के उस अनाम कालेज के इंटर परीक्षार्थियों का जब सन् 2005 का रिजल्ट देखा गया तो पता चला कि उस कालेज के कुल 477 में से 461 परीक्षार्थियों ने प्रथम श्रेणी हासिल कर ली।यानी 97.27 प्रतिशत परीक्षार्थियों को प्रथम श्रेणी मिल गई।

हाल के वर्षों में इंटर आर्ट्स परीक्षा में पूरे बिहार में दूसरा स्थान प्राप्त करने वाली एक छात्रा एक टी.वी चैनल के संवाददाता के सामने सोशल साइंस शब्द की स्पेलिंग नहीं बता सकी. पिछले साल एक टाॅपर ने पोलिटिकल साइंस को प्रोडिकल साइंस कह दिया था.

यह संकेत जरूर मिल रहे हैं कि पिछले वर्षों की तरह इस बार धांधली नहीं हो सकी है, पर 1996 का आदर्श प्राप्त करने में अभी समय लग सकता है. दशकों की काई भला एक दो  साल में कैसे साफ हो सकती है !

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi