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किसका बीएचयू पार्ट-4: चौबीस घंटे लाइब्रेरी खोलने की मांग अश्लील कैसे?

उम्मीद है कि पीएमओ की निगरानी में आने के बाद बीएचयू अपनी अस्मिता को वापस पा सकेगा.

Utpal Pathak Updated On: Oct 03, 2017 09:03 AM IST

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किसका बीएचयू पार्ट-4: चौबीस घंटे लाइब्रेरी खोलने की मांग अश्लील कैसे?

डॉ जीसी त्रिपाठी के कार्यकाल के दौरान हुई अनेक नियुक्तियों की बंदरबाट के बीच एक फुसफुसाहट भरा जुमला परिसर में मशहूर हुआ. 'इलाहाबाद की यमुना में डुबकी लगाइए और काशी की गंगा से बाहर आइए' इसका आशय पूछने पर किसी भी वरिष्ठ अधिकारी ने साफ जवाब नहीं दिया लेकिन सब मुस्कुराए बिना भी नहीं रह पाए. खैर, इस जुमले के बारे में जांच एजेंसियां बेहतर बता पाएंगी लेकिन ऐसा भी नहीं है कि केंद्र सरकार बीएचयू मामले में बिलकुल कान में तेल डालकर सो रही थी.

प्रधानमंत्री के वाराणसी और बीएचयू आने-जाने के क्रम में कई आला अफसरों को बीएचयू में बहुत कुछ होने की गंध मिली तो उन्होंने लिखना-पढ़ना शुरू किया. खुफिया एजेंसियों के भी आला अधिकारी बीएचयू के पिछले कुछ सालों का इतिहास भूगोल खंगालने लगे और प्रधानमंत्री कार्यालय को अवगत करवाते रहे.

इसके अलावा समय-समय पर पीएमओ से सबंधित अन्य अधिकारी भी बीएचयू के बाबत तरह-तरह की जानकारियां जुटाते रहे लेकिन कभी भी कुछ सामने नहीं आया. अंदरखाने में इस बात की चर्चा आम थी कि संघ के दबाव के कारण डॉ त्रिपाठी पर कोई कार्यवाही नहीं होगी. लेकिन उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो पीएमओ समेत गृह मंत्रालय एवं मानव संसाधन मंत्रालय के आला अफसरों को बीएचयू की अनियमितताओं की ठीक-ठाक जानकारी लगातार मिल रही थी और उन्होंने भारी मात्रा में दस्तावेज भी जुटाए थे.

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छात्र आंदोलन और अन्य घटनाओं के अलावा परिसर के ठेकों, नियुक्तियों और आयोजनों पर भी चुपचाप पैनी नजर रखी जा रही थी और लाभार्थियों के बारे में सूचनाएं अलग-अलग स्रोतों से इकट्ठी की जा रही थी. विश्वविद्यालय के ही कुछ प्राध्यापकों और कर्मचारियों ने अलग अलग माध्यमों से आला अफसरों को कई अनियमितताओं के बारे में अवगत करवाया था.

इन सभी अनियमितताओं में सबसे अधिक उल्लेख नवनिर्मित ट्रॉमा सेंटर का है जहां ना सिर्फ ठेकों के नाम पर बेतहाशा खर्च किया गया बल्कि वहां हुई ढेर सारी नियुक्तियां भी संदेह के दायरे में है. ट्रॉमा सेंटर एक ऐसा अंधा कुंआ बन गया जहां कोई भी धनराशि जाकर गायब हो गई और इसके बहाने कई घर चमक गए.

आज ही ट्रॉमा सेंटर में बहुत कुछ ऐसा है जो किसी काम का नहीं और बहुत कुछ जो काम का है वो है ही नहीं. मसलन इस परिसर में महंगी टाईल लगाकर संगरमर के फर्श बनवाये गए जो मरीजों को अक्सर सुविधाजनक नहीं लगते वहीं दूसरी तरफ तीमारदारों को पानी पीने के लिए बड़े परिसर से कई सौ मीटर दूर बाहर आना पड़ता है. इसके अलावा अन्य ऐसी कई कमियां हैं जो इस बड़ी इमारत के नाम पर छिपा ली गईं.

कुछ प्रमुख मामले

पिछले साल मार्च के महीने में छह विद्यार्थियों को इसलिए सस्पेंड किया गया क्योंकि वे परिसर के अस्पताल में बेहतर सुविधाओं की मांग कर रहे थे. विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए राज्य सरकार को मामले पर गौर करने का अनुरोध यह कहकर किया था कि छात्र परिसर की संपत्ति को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं.

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पिछले वर्ष मई के महीने में 12 छात्रों ने एक शांतिप्रिय अनशन किया और वे 18 मई को धरने पर बैठ गए. उनकी मांग थी कि साइबर लाइब्रेरी को 24 घंटे चलने दिया जाए. पूर्व कुलपति डॉ लालजी सिंह ने इस लाइब्रेरी का लोकार्पण किया था और वर्तमान कुलपति डॉ जीसी त्रिपाठी ने यह कहते हुए 24 घंटे खोलने का आदेश वापस ले लिया था कि रात में छात्र वहां अश्लील वेबसाइट देखते हैं. इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग लाइब्रेरी को रात भर खोलने की मांग कर रहे हैं वे नैतिक रूप से दोषी हैं और संकीर्ण मानसिकता के हैं.

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12 में से नौ छात्र जिनमें विकास सिंह, प्रियेश पाण्डेय, अनुपम कुमार, दीपक सिंह, शांतनु सिंह, रौशन पांडेय, गौरव पुरोहित, आकाश पांडेय और अविनाश ओझा थे, उनको कुलपति ने 24 मई को सस्पेंड कर दिया. सभी छात्र कला संकाय के स्नातक द्वितीय एवं तृतीय वर्ष के विद्यार्थी थे, उनमें से एक विकास राजनीति विज्ञान का शोध छात्र था.

25 मई की रात को उन सभी छात्रों को पुलिस और प्रॉक्टर कर्मियों के जरिए बलपूर्वक परिसर से बाहर निकाल दिया गया. उसी समय आम आदमी पार्टी के कुछ लोगों ने जब छात्रों का समर्थन करने की कोशिश की तो उन्हें सुरक्षाकर्मियों और कुछ छात्रों ने पीटा गया.

साइबर लाइब्रेरी रात भर खुले रहने की मांग को लेकर सभी छात्र संगठन एकमत थे लेकिन विद्यार्थी परिषद ने खुद को अलग कर रखा था.

कोर्ट ने दी छात्रों को राहत

लाइब्रेरी की मांग को लेकर निलंबित हुए छात्रों ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी. इस मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने न सिर्फ बीएचयू को नोटिस जारी किया, बल्कि रजिस्ट्रार को भी व्यक्तिगत तौर पर पेश होने का आदेश दिया. लाइब्रेरी आंदोलन के निलंबित छात्रों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 28 अप्रैल को सुनवाई करते हुए 4 मई को रजिस्ट्रार बीएचयू को व्यक्तिगत तौर पर सुप्रीम कोर्ट में पेश होने को कहा.

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छात्रों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका विकास सिंह व अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य (रिट संख्या 306/2017) सिविल मामले की सुनवाई की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति एएम खन्विल्कर की बेंच ने यह आदेश दिया. साथ में कोर्ट ने यह भी कहा है कि रजिस्ट्रार बीएचयू के 4 मई को न्यायालय में प्रस्तुत न होने की दशा में वह छात्रों की छूटी हुई परीक्षाओं को कराने के लिए विशेष परीक्षा आयोजित कराने का निर्णय दे सकता है.

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सुप्रीम कोर्ट में छात्रों का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और अधिवक्ता निधि द्वारा रखा गया. आदेश के तीसरे दिन निलंबित छात्रों के एक प्रतिनिधिमंडल ने न्यायालय के आदेश की कॉपी को कुलपति एवं रजिस्ट्रार कार्यालय में रिसीव कराया. छात्रों की ओर से सेंट्रल ऑफिस के सामने पत्रकार वार्ता भी आयोजित की गई जिसमे निलंबित छात्र शांतनु सिंह ने बताया. 'वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट में छात्रों की लड़ाई निशुल्क लड़ रहे हैं.'

कुछ ही दिन बाद उच्चतम न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए लाइब्रेरी आन्दोलन के छात्रों का निलंबन बहाल किया. न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, और न्यायमूर्ति ए एम खनविल्कर की बेंच ने विकास सिंह व अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य (सिविल) रिट संख्या 306/2017 की सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिसमें यह बिंदु प्रमुख थे-

  1. छात्रों की सभी परीक्षाएं जून - जुलाई में कराए विश्वविद्यालय प्रशासन.
  2. शोध छात्र विकास सिंह की रुकी हुई फेलोशिप 14 दिन के अंदर मिले.
  3. छात्रों के खिलाफ दर्ज सभी फर्जी मुकदमें रद्द. छात्रों ने अपनी याचिका में लैंगिक भेदभाव और छात्राओं को जबरदस्ती दिए जा रहे हलफनामे का भी जिक्र किया गया जिस पर अगली सुनवाई नवंबर में निश्चित हुई है.
शोध छात्र विकास ने हमसे बातचीत में बताया कि 'हमने माननीय न्यायालय से कई मामलों में हस्तक्षेप करने का निवेदन किया है, देश के प्रमुख अधिवक्ता प्रशांत भूषण और निधि हमारी स्थिति जानते हुए हमसे फीस भी नहीं ले रहे हैं.

यह उनकी महानता तो है ही, लेकिन साथ ही इस दौर में बीएचयू के छात्रों के हित में खड़े होना उनकी बहादुरी का भी सबूत है. दुखद यह है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अब तक बहुत सी चीजों का पालन भी नहीं हुआ और दूसरी तरफ विश्वविद्यालय कवर करने वाले अधिकांश मीडियाकर्मी मुझे ‘निलंबित छात्र विकास’ कहते हैं. यकीन ना हो आज ही का एक प्रमुख अखबार उठाकर देख लीजिये. पता नहीं कि कोर्ट के आदेश के बावजूद यह जानबूझ कर मुझे कहा जाता है या कहलवाया जाता है.'

एक अन्य मामले में कुछ छात्रों ने 300 संविदाकर्मियों के समर्थन में परिसर में स्थित नए विश्वनाथ मंदिर परिसर में बैठकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया. लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा एक विज्ञप्ति जारी करके इन मांगों को निरर्थक करार दे दिया गया.

बहरहाल, अब बीएचयू पीएमओ की निगाह में है, उम्मीद है कि जातिगत गुटबाजी भी बंद होगी और जो गुटबाजी अब तक ब्राम्हणवाद द्वारा पोषित थी वो भविष्य में राजपूतवाद या भूमिहारवाद द्वारा नियंत्रित नहीं की जाएगी.

परिसर आज भी वैसा है और छात्र छात्राओं या उससे जुड़े पूर्व छात्रों के लिए आज भी जीवन का हिस्सा है लेकिन परिसर पर नियंत्रण की लालच ने हजारों लाखों लोगों को सिर्फ कष्ट दिया है. उम्मीद है कि अब कुछ ऐसे प्रयास होंगे जिनसे इस गौरवशाली विश्वविद्यालय की खोई हुई अस्मिता वापस आ सके.

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