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'हाफ' से बहुत बेटर हैं महिलाएं: नहीं मानते तो देखिए ये विज्ञापन

कुछ विज्ञापन जो महिलाओं को देखने के नजरिए को बदलते हैं

Nidhi Nidhi | Published On: Apr 19, 2017 10:07 AM IST | Updated On: Apr 19, 2017 11:44 AM IST

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'हाफ' से बहुत बेटर हैं महिलाएं: नहीं मानते तो देखिए ये विज्ञापन

डियोड्रेंट छिड़कते ही मर्द चॉकलेट बन जाते हैं और लड़कियां उन्हें चखने को बेकरार. बाइक चलाते लड़कों को देख लड़कियां बेकाबू होकर उनके पीछे हो लेती हैं. लड़का सीमेंट की मजबूती की बात करता है तो लड़की उस पर फिदा हो जाती है.

आखिर बाइक की माइलेज से लड़कियों का संबंध है? बुलंद दीवारों वाला सीमेंट आपको सेक्स सिंबल क्यों बना देता है?

विज्ञापन और फिल्मों पर हमेशा आरोप लगाए जाते हैं कि प्रॉडक्ट बेचने के लिए ये हमेशा महिलाओं को 'ऑबेजेक्टिफाई' करते हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि ऐसा होता भी है.

आखिर ऐसा क्यों है कि आदमियों की जरूरतों वाले प्रॉडक्ट्स के ऐड में भी महिलाओं को ही दिखाया जाता है. शेविंग क्रीम से लेकर मेंस डियो के विज्ञापन बिना लड़कियों के नहीं बनते. (भई, सैनिटरी नैपकिन के ऐड में तो हमने लड़के नहीं देखे)

लेकिन सब कुछ काला नहीं है. मार्केट में बढ़ रहे कॉम्पिटिशन और प्रॉडक्ट्स बेचने की होड़ के बीच इसी बाजार में कुछ ऐसे विज्ञापन भी बन रहे हैं, जो महिलाओं को देखने के नजरिए और उनके हक की आवाज को बुलंद करते हैं.

अभी हाल में ही कपड़ों के ब्रांड 'यूनाइटेड कलर्स ऑफ बेनेटेन' ने भी एक ऐसा ही ऐड कैंपेन शुरू किया है. यूनाईटेड बाई हाफ (#UnitedByHalf) के हैशटैग के साथ आया यह विज्ञापन इस समाज में लड़कियों के किसी पुरुष के सिर्फ ‘बेटरहाफ’ बन कर सिमट जाने की परंपरा को सिरे से नकारता है.

ये विज्ञापन दिखाता है कि औरतें अधूरी नहीं हैं. वो 'हाफ' रहकर भी खुश हैं. उन्हें किसी की कमी नहीं है- अगर वह 'हाफ' हैं तो भी अधूरी और कमजोर नहीं हैं, मजबूत हैं. एजुकेशन से लेकर मेडिकल तक हर क्षेत्र में वो अकेले ही काफी हैं और खुश भी.

धीरे-धीरे ही समाज में अब विरोध और हक पाने की आवाज सुनाई देने लगी है. मेट्रोसिटी की महिलाओं की समस्याओं के मुद्दे अब छोटी-छोटी जरूरतों से ऊपर उठ चुकी हैं. बातें सिर्फ बुनियादी शिक्षा और नौकरी की नहीं बल्कि नौकरी की जगह पर भी हो रहे पक्षपात के विरोध में भी हैं.

यह मुद्दे अब विज्ञापनों में नजर आते हैं. इसी बात पर जोर देते हुए 'घड़ी कंपनी' टाइटन रागा का एक विज्ञापन ऐसे लोगों की मानसिकता पर चोट करता है जो अभी भी महिलाओं को वर्कप्लेस पर कमजोर समझते हैं.

हमारे समाज में लड़की होने का मतलब ही जब उसकी खूबसूरती से तय होता है. इस खूबसूरती के भी पैमाने भी तय कर दिए गए. जैसे लंबे बाल किसी महिला की खूबसूरती का हिस्सा माने जाते हैं. लेकिन बदलते वक्त में इन तय किए हुए पैमानों से कहीं ऊपर उठती महिलाओं की कहानी लेकर आया था डाबर के वाटिका हेयर शैम्पू का विज्ञापन.

लड़कियां सिर्फ अपनी मर्जी से लाइफपार्टनर चुनना ही नहीं बल्कि बिना किसी लाइफपार्टनर के अकेले रहने के अधिकारों पर भी खुलकर बोल रही हैं. इस तरह के कई मुद्दों पर शॉपिंग वेबसाइट मिंत्रा डॉट कॉम ने कई विज्ञापन लाए थे.

पढ़ाई, नौकरी, घर से बाहर निकलना, कपड़े पहनना और यहां तक की औरतों के खाने-पीने तक तरीका भी बदल गया है. या फिर बदल दिया गया है. अपने ही अधिकारों के लिए उन्हें अपनी ही दुनिया, अपने घर में लड़ना पड़ता है. घरेलू हिंसा का शिकार होती औरतों पर बनाया गया एक विज्ञापन आपको अंदर तक झकझोरता है.

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