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प्रद्युम्न मर्डर: टीआरपी की होड़ में संवेदनहीन हुई मीडिया और पीड़ित बना प्रोडक्ट

रिपोर्टिंग करते-करते अगर मीडिया अगर संवेदनहीन होने लगेगा तो फिर आम आदमी किस पर भरोसा करेगा?

FP Staff Updated On: Sep 13, 2017 11:00 PM IST

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प्रद्युम्न मर्डर: टीआरपी की होड़ में संवेदनहीन हुई मीडिया और पीड़ित बना प्रोडक्ट

रायन इंटरनेशनल स्कूल में प्रद्युम्न की हत्या पर कई सवाल उठ रहे हैं. आरोपी कंडक्टर के बयान और हत्या की वजह किसी के गले नहीं उतर रहे हैं. खुद प्रद्युम्न के पिता हरियाणा पुलिस की कार्रवाई और रायन की सफाई से संतुष्ट नहीं हैं.

मीडिया ने इस मामले को बेहद संजीदगी से उठाया है तभी एक बड़े स्कूल पर कार्रवाई भी हो पा रही है. लेकिन यही मीडिया संवेदनशील खबर को कवर करते वक्त जब कहीं खुद संवेदनहीन हो जाए तो फिर शर्मसार होने के सिवा कुछ भी नहीं रह जाता.

ऐसा ही वाकया हुआ है जो मीडिया के उतावलेपन और संवेदनहीन की इंतेहा है. सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल है. इस वीडियो में प्रद्युम्न के पिता वरुण ठाकुर किसी चैनल पर अपने घर से लाइव बैठे हुए हैं. वो चैनल के माध्यम से अपने बेटे के लिए इंसाफ मांग रहे हैं. इसके बावजूद वीडियो में एक चैनल की रिपोर्टर की हरकत मीडिया को शर्मसार कर जाती है. लाइव शो के बीच में रिपोर्टर उनका माइक निकालने लग जाती है.

गमगीन पिता के दर्द का उड़ाया मजाक

उस वक्त विशाल अपने सात साल के बच्चे के लिए इंसाफ मांग रहे होते हैं. वो चैनल के दर्शकों से इंसाफ की लड़ाई के सपोर्ट मांगते हैं. लेकिन इसके ठीक उलट महिला रिपोर्टर उनकी शर्ट में लगे लेपल माइक को जबर्दस्ती खींच कर निकालने की कोशिश करती है. इस दौरान उसकी दूसरे पत्रकार के साथ बहस भी होती है. इतना सब होने के बावजूद वो रिपोर्टर बार-बार प्रद्युम्न के पिता से बाइट लेने पर आमादा रहती है.

वरुण बार-बार रिपोर्टर से कह रहे हैं कि उन्हें किसी से बहुत जरूरी मुलाकात करने जाना है. लेकिन महिला रिपोर्टर उन्हें जाने से रोकने लगती है. यहां तक कि वो उनका हाथ पकड़कर रोकने की कोशिश करती है. टीआरपी की होड़ में संवेदनहीन होता मीडिया का ये चेहरा भावशून्य दिखने के बाद डरावना भी दिखाई देने लगता है.

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मृतक छात्र प्रद्युमन ठाकुर की रोली-बिलखती मां ज्योति ठाकुर

जिस पिता ने अपने कंधे पर बेटे की अर्थी उठाई हो और वो अपने बेटे की हत्या का इंसाफ मांग रहा हो उसकी मनोदशा को समझने के लिए किसी विशेषज्ञ की जरूरत नहीं है. मीडिया इस मामले में मां और पिता की मानसिक हालत से वाकिफ है. इसके बावजूद मुंह में माइक ठूंस कर बाइट लेने वाले उतावले पत्रकारों की मानवीय संवेदनाएं सिर्फ अपने चैनल और अपनी स्टोरी से जुड़ी हुई थीं.

क्या पीड़ित के आंसू मतलब सिर्फ ज्यादा टीआरपी?

उन्हें इससे फर्क नहीं था कि एक पिता अकेले एक बड़ी लड़ाई लड़ रहा है. अपने बेटे की हत्या के लिए इंसाफ मांग रहा है. वो दूसरे किसी चैनल पर बैठकर जनता से समर्थन मांग रहा है. लेकिन सिर्फ टीआरपी के लिए उन्हें वरुण ठाकुर की अपने चैनल पर मौजूदगी और बाइट जरूरी थी. उन्हें इससे कोई मतलब नहीं था कि वरुण ठाकुर को किसी से जरूरी मुलाकात करनी है तो उन्हें जाने दिया जाए.

लेकिन टीआरपी की होड़ में मीडिया अगर संवेदनहीन होने लगेगा तो फिर आम आदमी किस पर भरोसा करेगा? अगर वरुण ठाकुर जैसे पिता चैनल के लिए सिर्फ एक प्रोडक्ट बन कर रह जाएंगे तो मीडिया से  इंसाफ की जंग की उम्मीद करना बेमानी ही होगा. ये उतावलापन, अधीरता और संवेदनहीनता ही मीडिया की निष्पक्ष छवि को आघात पहुंचाने का काम करता है.

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