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'बीफ' पर बवाल के बीच पशु बाजार के रेगुलेशन का वाजिब सवाल गायब है!

मवेशी बाजार को लेकर जो नए नियम बने हैं, उन्हें बनाने से पहले जानवरों की तस्करी और निर्दयता के पहलुओं पर काफी गौर किया गया है

Gauri Maulekhi Updated On: Jun 02, 2017 08:13 AM IST

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'बीफ' पर बवाल के बीच पशु बाजार के रेगुलेशन का वाजिब सवाल गायब है!

23 मई को केंद्र सरकार ने मवेशी बाजार के लिए नए नियमों की घोषणा की. ये नियम लागू होने, या यूं कहें कि जानने-समझने और पढ़ने से पहले ही पूरे देश पर अपना असर दिखा रहे हैं.

केरल में तो लोग सरकार के नोटिफिकेशन से इतने बौखलाए कि उन्होंने भारत सरकार को धमकियां देनी शुरू कर दीं.

मुझे यकीन है कि इन धमकी देने वालों ने मवेशियों के बारे में बनाए गए इन नए नियमों को पढ़ा नहीं होगा. केरल में कांग्रेस के नेताओं ने तो इस नोटिफिकेशन के विरोध एक बछड़े को सरेआम कत्ल कर डाला. फिर उसका मांस तमाशबीनों के बीच बांटा.

हंगामा है क्यों बरपा

केरल में सिर्फ मांस निर्यात करने वाले बूचड़खानों को लाइसेंस मिला हुआ है. इसलिए ये समझ से परे है कि आखिर सरकार के नए नियम से उन्हें इतनी दिक्कत क्यों होने लगी.

केरल को तो किसी को मारने की वजह भी तलाशने की जरूरत नहीं. वहां तो कुत्ते, गायों, औरतों, बच्चों, हाथियों और दूसरे दलों के कार्यकर्ताओं का कत्ल होता आया है.

पश्चिम बंगाल ने भी मवेशियों की खरीद-फरोख्त को लेकर हो-हल्ला मचाया. मगर उतना नहीं जितना केरल में हुआ. तमिलनाडु में भी नए नोटिफिकेशन को लेकर थोड़ा बहुत हंगामा हुआ.

Cow

इसकी बड़ी वजह ये है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में ही पशुओं का सबसे ज्यादा अवैध कारोबार होता है. पश्चिम बंगाल से बांग्लादेश को गर्भवती, बीमार और छोटे जानवरों की अवैध सप्लाई होती है. तमिलनाडु यही काम केरल के लिए करता है.

कुछ सियासी नेताओं और छात्र संगठनों ने मवेशियों को लेकर नए नियमों पर सख्त बयान दिए. लेकिन उनके बयानों में खोखलापन साफ दिखा. मुझे यकीन है कि इन बयानवीरों ने कभी मवेशियो का बाजार नहीं देखा होगा.

असल में ये बयानबाजी सिर्फ सियासी तूफान खड़ा करने के लिए हो रही है. इस बयानबाजी के चक्कर में जो नए नियम हैं उनकी भी हत्या कर दी गई.

मवेशी बाजारों पर लगाम लगाना क्यों है जरूरी?

पहले हमें मवेशी बाजारों को नियमित करने की जरूरत को समझना होगा. पशु बाजारों में सिर्फ दो तरह के जानवर बेचने के लिए लाए जाते हैं. पहले तो वो जो दुधारू होते हैं. या जिन्हें खेती के काम में इस्तेमाल किया जा सकता है. दूसरे वो जो मांस के लिए बेचे जाते हैं.

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जो उपयोगी जानवर होते हैं. उनकी ठीक से देख-रेख की जाती है. उन्हें लाने-ले जाने में भी कम बेदर्दी दिखाई जाती है. उनकी तस्करी भी कम होती है. इसकी वजह ये है कि उन्हें आसानी से खरीदार मिल जाते हैं. उनकी सेहत का मालिकों को खयाल रखना पड़ता है. तभी तो उन जानवरों की अच्छी कीमत मिलेगी.

जो जानवर मांस के लिए बेचने लाए जाते हैं, उनकी हालत बेहद खराब होती है. किसान आम तौर पर वो जानवर मांस के लिए बेचते हैं, जो उनके लिए बेकार हो चुके होते हैं.

किसान इन जानवरों को दलालों को बेच देते हैं. ये दलाल दर्जन भर या इससे ज्यादा जानवर खरीदते हैं. फिर इन्हें वो बड़े बाजारों में ले जाते हैं, ताकि बड़े दलालों को बेच सकें. कई बिचौलियों और बाजारों से गुजरते हुए ये जानवर इकट्ठे करके गाड़ियों में ठूंस करके दूसरे राज्यों में ठेकेदारो को बेचे जाते हैं.

CowProtection

उत्तरी भारत के राज्यों में सबसे ज्यादा जानवर पश्चिम बंगाल भेजे जाते हैं. जो झारखंड, ओडिशा और बिहार से होकर गुजरते हैं. दक्षिण भारत में कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र से जानवरों को केरल भेजा जाता है.

यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि ज्यादातर राज्यों में जानवरों के वध या ट्रांसपोर्ट करने के लिए पशुपालन और राजस्व विभाग से इजाजत लेनी होती है. हालांकि किसी भी राज्य में इन नियमों का पालन नहीं होता.

पुलिस चौकियों में पैसे देकर, यानी 'हफ्ता' देकर जानवरों की तस्करी का ये कारोबर बरसों से चलता आ रहा है. जाने-अनजाने ये सभी लोग जानवरों की तस्करी का हिस्सा बने हुए हैं. ये बीमारी पूरे देश को लगी हुई है.

बहुत बड़ा है जानवरों के तस्करों का रैकेट 

जानवरों की तस्करी का ये बहुत बड़ा रैकेट है, जो हर राज्य में सक्रिय है. गृह मंत्रालय ने 2006 में ही ये पाया था कि जानवरो की तस्करी का आतंकवादी फंडिंग से सीधा ताल्लुक है.

2008 में असम धमाकों के बाद गिरफ्तार हूजी के आतंकवादियों ने माना था कि उन्होंने धमाकों के लिए पैसे जानवरों की तस्करी से जुटाए थे. हर साल सिर्फ उत्तर प्रदेश में जानवरों के तस्करों के हाथों सौ से ज्यादा पुलिसवाले मारे जाते हैं.

भारत-बांग्लादेश की सीमा पर कई बीएसएफ जवान जानवरों के तस्करों के हाथों कत्ल हो जाते हैं. खाड़ी देशों को मांस के निर्यात में जबरदस्त मुनाफा होता है. इसीलिए मांस माफिया इसके लिए कुछ भी करने को तैयार होता है.

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दिल्ली के गाजीपुर स्थित मवेशी बाजार में महिलाओं के प्रवेश की अलिखित पाबंदी है. वो कहते हैं कि मंडी का मंजर बेहद डरावना और विचलित करने वाला होता है.

बिहार के सोनपुर मेले में जहां जानवर कटते हैं, वहां सिर्फ परिचित दलालों को ही जाने मिलता है. अगर कोई वहां कैमरा लेकर जाता है, तो वो कैमरे के साथ वापस नहीं आ सकता. हो सकता है कि उसके साथ ऐसा सलूक हो कि उसे स्ट्रेचर पर लादकर लाना पड़े.

मवेशियों से बेदर्दी का अंतहीन सिलसिला 

वजह वही है कि कसाईखाने का मंजर बेहद खतरनाक होता है. जानवरों को छोटी रस्सियों से बांधा जाता है. खरीदार के इंतजार में जानवर कई दिनों या कई बार हफ्तों तक खड़े रखे जाते हैं.

फिर खरीदार उन्हें गाड़ियों में ठूंसकर दूसरे नर्क ले जाते हैं. बदसलूकी के चलते जानवरों की हालत दयनीय होती है. छोटे जानवर बेचने के बाद अपनी मां को तलाशते दिखाई देते हैं.

मवेशियों के वध में बेदर्दी एक बड़ा मसला है. किसान के घर से कसाई खाने तक के इस मौत का ये सफर किसी एक खरीदार के मिल जाने से नहीं खत्म होता.

जानवर कई बार बिकते हैं. कई हाथों से गुजरते हैं. हर खरीदार उनसे बदसलूकी करता है. जानवरों को ठीक से खाना-पानी नहीं मिलता क्योंकि हर खरीदार को पता होता है कि इसे आखिर में कत्ल ही होना है.

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कई बार तो जानवरों को फिटकरी वाला पानी दिया जाता है, जिससे उनके गुर्दे फेल हो जाएं. इससे उनके शरीर में पानी जमा हो जाता है. इससे जानवर हट्टे-कट्टे दिखते हैं. इससे उनकी अच्छी कीमत मिलती है. उन्हें पैदल ही एक बाजार से दूसरे बाजार ले जाया जाता है.

कई बार जानवरों को ट्रकों या ट्रेनों में ठूंसकर ले जाया जाता है. इस दौरान नियमों की सिरे से अनदेखी होती है. जानवरों के ट्रांसपोर्ट की इजाजत नहीं ली जाती.

Cow

दक्षिण भारत के राज्यों में तो जानवरों की आंखों में मिर्च ठूंस दी जाती है. ताकि दर्द से वो खड़े रहें. भले ही खड़े-खड़े थकान से उनकी मौत ही क्यों न हो जाए. मुनाफा बढ़ाने के लिए ज्यादा से ज्यादा जानवर ट्रक में ठूंसकर ले जाए जाते हैं. वो मंजर देखकर कई बार बेहोशी आने लगती है.

तस्करी के दौरान कई जानवर दम घुटने से मर जाते हैं. कई की हड्डियां टूट जाती हैं, आंखें खराब हो जाती हैं, या पूंछ टूट जाती है. किसी के दूसरे अंग बेकार हो जाते हैं.

चढ़ाने-उतारने के दौरान जानवरों को गाडियों में फेंक दिया जाता है, जिससे वो जख्मी हो जाते हैं. उन्हें खींचकर गाड़ियों में भर दिया जाता है. उन जानवरों पर ये जुल्म नहीं होता जो दुधारू होते हैं या जिनका खेती में इस्तेमाल हो सकता है.

किसानों को नहीं दलालों और तस्करों को है नुकसान 

इस वजह से मवेशी बाजारों का नियमन और काटने के लिए जानवरों को सीधे किसान से खरीदने से सबसे ज्यादा नुकसान जानवरों के तस्कर माफिया को होगा. उन ठेकेदारों और दलालों को होगा जो तस्करी में शामिल हैं.

नए नियमों से डेयरी के कारोबार से जुड़े लोगों की जवाबदेही भी तय होगी. उनके कारोबार से पैदा हुए बाईप्रोडक्ट को लेकर वो जिम्मेदार बनेंगे. भारत सरकार के इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च ने दूध न देने वाले जानवरों के बेहतर इस्तेमाल के लिए भी कुछ नुस्खे सुझाए हैं.

राज्य सरकारों को इन नुस्खों को भी लागू करना होगा. डेयरी उद्योग को-ऑपेटिव के जरिए संगठित तरीके से चलता है. इनके जरिए बेकार जानवरों को काटने के लिए बेचा जा सकता है. इससे जवाबदेही तय होगी और जानवरों के साथ निर्दयता भी कम होगी.

An Indian Hindu man feeds a sacred cow a

विरोध की आखिर वजह क्या है?

मवेशी बाजार को लेकर जो नए नियम बने हैं, उन्हें बनाने से पहले जानवरों की तस्करी और निर्दयता के पहलुओं पर काफी गौर किया गया है. पता नहीं तमिलनाडु इनका विरोध क्यों कर रहा है.

जलीकट्टू पर पाबंदी के विरोध में यही लोग कह रहे थे कि वो केरल को जानवरों की तस्करी को रोकना चाहते हैं. इसीलिए चाहते हैं कि वो जलीकट्टू की परंपरा को जारी रखना चाहते हैं.

अब जबकि इस समस्या से निपटने के लिए नियम बनाए गए हैं, तो तमिलनाडु के लोग उनका विरोध भी कर रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट में 2014 में दाखिल याचिका नंबर 881 में पश्चिम बंगाल सरकार भी एक पक्ष है. वो हर सुनवाई में मौजूद थे. नियम बनाने की पूरी प्रक्रिया में पश्चिम बंगाल शामिल था.

13 जुलाई 2015 को सुनवाई के दौरान जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मवेशियों की तस्करी रोकने के लिए नियम बनाने को कहा, तो पश्चिम बंगाल के वकील कोर्ट में मौजूद थे. ये वकील उस वक्त भी कोर्ट में थे, जब केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया था कि उसने 17 जनवरी 2017 में नियमों का ड्राफ्ट जारी कर दिया है.

अगर पश्चिम बंगाल को इस पर ऐतराज था, तो उन्होंने नोटिफिकेशन जारी होने तक का इंतजार क्यों किया? उन्हें लगता है कि नए नियमों का रमजान से कोई ताल्लुक है! कांग्रेस ने तो हद ही कर दी. केरल में उनका विरोध प्रदर्शन उनकी अपनी सरकार के फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड एक्ट 2006 और रेगुलेशन 2011 के खिलाफ है.

मवेशियों को लेकर नए नियमों का विरोध हताशा और कायरता के सिवा कुछ नहीं.

बाकी देशवासियों ने इन नियमों के जारी होने के बाद राहत की सांस ली है. दिवंगत पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे ने इन नियमों की शक्ल में देश को सबसे बड़ी विरासत दी है.

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