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नीति आयोग के नए उपाध्यक्ष राजीव कुमार की राह आसान नहीं

बहुत संभव है कि राजीव कुमार को पहली चुनौती का सामना आरएसएस से मिले. स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय मजदूर संघ और भारतीय किसान संघ जैसे संगठनों ने नीति आयोग के कई फैसलों और उसके कामकाज का मुखर विरोध किया है

Debobrat Ghose Debobrat Ghose Updated On: Sep 01, 2017 02:57 PM IST

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नीति आयोग के नए उपाध्यक्ष राजीव कुमार की राह आसान नहीं

अर्थशास्त्री डा. राजीव कुमार ने जिम्मेवारी के कई पदों पर काम किया है और अपनी हर भूमिका में वे बेहतरीन साबित हुए हैं. लेकिन नीति आयोग के उपाध्यक्ष की नयी भूमिका उनके लिए सबसे ज्यादा कठिन साबित हो सकती है. उनका कार्यकाल 1 सितंबर से शुरु हो रहा है और आयोग के उपाध्यक्ष रुप में उनके लिए अर्थव्यवस्था को लेकर कई विरोधी विचारों के बीच संतुलन कायम करना जरुरी होगा. साथ ही उन्हें आयोग के भीतर और बाहर मौजूद कई सत्ता-केंद्रों के बीच भी तालमेल बैठाते हुए काम करना होगा.

चौकन्ना रहना होगा राजीव कुमार को 

rajiv kr and pangarhiya

राजीव कुमार से पहले नीति आयोग के उपाध्यक्ष का पद संभालने वाले अरविन्द पनगढ़िया के लिए ऐसा कर पाना मुश्किल साबित हुआ. सेंटर फ़ॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो और नीति-निर्माण की जरुरतों को ध्यान में रखकर शोध करने वाली नॉन-प्रॉफिट संस्था 'पहल इंडिया फाउंडेशन' के संस्थापक निदेशक रह चुके राजीव कुमार को काम के शुरुआती समय से ही काफी सतर्क और चौकन्ना रहना होगा.

आरएसएस के सहयोगी संगठनों की रहेगी पैनी नजर 

बहुत संभव है कि राजीव कुमार को पहली चुनौती का सामना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से मिले. स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय मजदूर संघ और भारतीय किसान संघ जैसे आरएसएस के सहायक संगठनों ने नीति आयोग के कई फैसलों और उसके कामकाज का मुखर विरोध किया है.

बात चाहे श्रम संबंधी सुधारों की हो या फिर जीएम सीडस् (आणुवांशिक रुप से संवर्धित बीज) को अमल मे लाने का मुद्दा—आरएसएस के ये सहायक संगठन पनगढ़िया के फैसलों पर सवाल उठाने के मामले में काफी सख्त साबित हुए हैं.

स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक अश्विनी महाजन ने फर्स्टपोस्ट को बताया कि “ बात किसी खास व्यक्ति की नहीं है. 64 साल पुराने योजना आयोग की जगह लेने वाले नीति आयोग की भूमिका और कामकाज पर हमने हमेशा सवाल उठाये हैं. मौजूदा संदर्भ में नीति आयोग की बुनियादी भूमिका योजना बनाने, राज्यों तथा बाकी भागीदारों (स्टेकहोल्डर्स) के साथ सलाह-मशविरा करके सरकार की नीतियों को उचित दिशा-निर्देश देने तथा इसके अनुकूल काम करने की है. आयोग गरीब और धनी हर राज्य के लिए एक जैसी नीति नहीं बना सकता. जरुरत नीचे से ऊपर देखने का नजरिया अपनाते हुए नीति बनाने की है लेकिन आयोग के गठन के ढाई साल बाद भी ऐसा होता नहीं दिखता. ”

पनगढ़िया के सख्त आलोचक रहे हैं आरएसएस के सहयोगी संगठन 

अश्विनी महाजन का कहना था कि “प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की ओर से प्रत्यक्ष नगदी हस्तांतरण (डीबीटी-डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर), जन-धन योजना, मुद्रा जैसी कई अच्छी नीतियां शुरु की गई हैं लेकिन नीति आयोग के कामकाज से ऐसी भावनाएं नहीं झांकतीं. उसका सारा जोर आर्थिक वृद्धि पर है, उसने मान लिया है कि बाकी सारा कुछ अपने आप हो जायेगा. यह मॉडल 1960 के दशक में नाकाम रहा. गरीबी, बेरोजगारी, सर्वजन की शिक्षा जैसी समस्याओं का समाधान नहीं हो सका.”

आरएसएस के सहायक संगठन पनगढ़िया के ग्रोथ (आर्थिक वृद्धि) मॉडल के सख्त आलोचक साबित हुए हैं. उनका तर्क रहा है कि बेरोजगारी, गरीबी, छोटे उद्योगों की बढ़वार जैसे मुद्दों की अनदेखी हुई है.

दीनदयाल उपाध्याय अंत्योदय योजना का उदाहरण देते हुए स्वदेशी जागरण मंच ने कहा कि आर्थिक नीति ऐसी होनी चाहिए कि उससे कमजोर तबके के आदमी को फायदा हो.

बेरोजगारी और आर्थिक वृद्धि में बैठाना होगा सामंजस्य 

rajiv kumar

नीति आयोग का जीन-संवर्धित (जीएम) बीज यानी जीएम सरसों को भारत के खेतों के लिए लागू करने का फैसला और निजीकरण की दिशा में की गई इसकी पहलकदमियां राजीव कुमार के लिए एक और चुनौती साबित होगी. इन दो मामलों पर आरएसएस के सहयोगी संगठनों ने नीति आयोग पर सबसे तेज हमले किए हैं. स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय किसान संघ, दोनों ने ही गहरी चिन्ता का इजहार करते हुए कहा है कि अगर जीएम सरसो के अमल को मंजूरी दी गई तो इसका सेहत, जैव-विविधता तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर खराब असर होगा.

अश्विनी महाजन का कहना है कि “ संसद की स्थायी समिति ने भी हितों के टकराव, एकाधिकार की प्रवृत्ति और सेहत के लिए नुकसानदेह जैसे कारण गिनाते हुए जीएम सरसो के अमल पर सवाल खड़े किए हैं. लेकिन नीति आयोग जीएम सरसों के इस्तेमाल पर जोर लगा रहा है. शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र को कारपोरेट के हाथों में सौंपने की बात करने वाली निजीकरण की आयोग की खुलमखुल्ला नीति बहुत आपत्तिजनक है. एक तरफ हम आर्थिक वृद्धि की बात कर रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ बेरोजगारी बढ़ रही है. यह एक बड़ी चुनौती है.”

बेरोजगारी, गरीबी, आर्थिक वृद्धि जैसे मुद्दों के अलावे राजीव कुमार को यह भी देखना होगा कि नीति-निर्माण की प्रक्रिया में अलग-अलग भागीदारों (स्टेकहोल्डर्स) की भूमिका कैसे बढ़ायी जाय.

नीति-निर्माण में शामिल करना होगा किसानों, मजदूरों को 

भारतीय मजदूर संघ के महासचिव बृजेश सिंह का सवाल है कि “ नीति-निर्माण की संस्था किसान, मजदूर और कामगार जैसे भागीदारों की कैसे अनदेखी कर सकती है ? हमने नीति-निर्माण में इन भागीदारों को शामिल करने का सवाल कई दफे उठाया है. नीति आयोग नीतियों का फ्रेमवर्क तैयार करने के मामले में जिस ढंग से कदम उठा रहा है उससे यही जाहिर होता है कि उसके सिद्धांतों का जमीनी सच्चाइयों से मेल नहीं है. "

पनगढ़िया को अपने कार्यकाल में कई कड़वे सवालों का सामना करना पड़ा. एक वक्त ऐसा भी आया जब सरकार ने नीति आयोग की एक रिपोर्ट ‘ईज ऑव डूइंग बिजनेस’ (व्यापार करने में आसानी) से अपने को अलग कर लिया.

विशाल अनुभव का इस्तेमाल करना होगा 

राजीव कुमार बीते वक्त में भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग परिसंघ (फिक्की) के महासचिव, इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकॉनॉमिक रिलेशन्स (आईसीआरआईईआर) के निदेशक और मुख्य कार्यप्रभारी (चीफ एक्जिक्टिव) तथा सीआईआई के मुख्य अर्थशास्त्री के पद पर रह चुके हैं. उन्होंने एशियन डेवलपमेंट बैंक तथा वित्त एवं उद्योग मंत्रालय में भी कई पदों पर काम किया है.

देखने वाली बात होगी कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई संस्थाओं के बोर्ड मेंबर रहने के अपने विशाल अनुभव का इस्तेमाल वह ढ़ेर सारी चुनौतियों से निपटने में कैसे करते हैं और न्यू इंडिया के लिए प्रधानमंत्री मोदी जो कुछ करना चाहते हैं उसे राजीव कुमार किस तरह हासिल कर पाते हैं.

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