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किसान रिकॉर्ड फसल उगाता है, सरकारी खरीद पाता है- फिर भी क्यों रोता है?

जब तक सही तरीके से बाजार का मैकेनिज्म तैयार नहीं किया जाएगा किसान यूं ही मरता रहेगा

Sompal Shastri Updated On: Jun 09, 2017 10:22 AM IST

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किसान रिकॉर्ड फसल उगाता है, सरकारी खरीद पाता है- फिर भी क्यों रोता है?

पहले महाराष्ट्र और फिर मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन ने बहुत सारे शहरों में रहने वाले और खेती किसानी से ताल्लुक ना रखने वाले लोगों को उलझन में डाल रहा है. लोगों ने पढ़ा है कि मध्य प्रदेश को कई बार कृषि कर्मण अवार्ड मिल चुका है. बड़ी कंपनियों के ज्यादा महंगे आटे के पैकेट के ऊपर छपा होता है ‘मध्य प्रदेश का बेहतरीन आटा’. यानी खूब उग रहा है, महंगा बिक रहा है तो किसान नाराज क्यों है.

मध्य प्रदेश की सड़कों पर प्याज फेंका जा रहा था, दूध बह रहा था, ऐसे में मध्य प्रदेश सरकार ने घोषणा की कि वो उसका प्याज आठ रुपए किलो की दर से खरीद लेंगे. किसानों ने आंदोलन वापस नहीं लिया. ऊपर से हालत बेहद खराब हो गए. अब मध्य प्रदेश सरकार ने कहा है कि तूअर जिसे अरहर भी कहा जाता है और उड़द की दालें भी राज्य सरकार 5225 रुपए प्रति क्विंटल की दर से खरीद लेंगे. लेकिन इससे समस्या ज्यादा से ज्यादा टल जाएगी पर उसका समाधान नहीं होगा. ये समस्या कल फिर खड़ी होगी. आज मध्य प्रदेश है, कल कोई और जगह होगी.

एमएसपी मिली तो क्या गम है? 

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दरअसल समझने वाली बात यह है कि यह न्यूनतम मूल्य या मिनिमम सपोर्ट प्राइस (एमएसपी) एक तरह से छलावा है. केंद्र सरकार या राज्य सरकारें इन्हें घोषित कर देती हैं और खरीद की कोई व्यवस्था होती नहीं. मजबूर जला बैठा किसान वो फसलें लगाने लगाता है जो बिकती हैं. अंबार लग जाता है. सरकार मजबूरन या दबाव में कभी खरीद भी लेती हैं तो सड़ जाता है.

किसान की अजीब कहानी है. उसे कुदरत के गुस्से की सजा भी भोगनी होती है और सरकारों की गलत नीतियों की भी.

तो ये लहलहाते खेत हमेशा से नहीं थे?

दरअसल आजादी के बाद हमारे देश में पैदावार बेहद कम ही थी. साल 1951 में हमारे देश में कुल अनाज की उपज थी 51 मिलियन टन और बीते साल थी 272 मिलियन टन.

आजादी के समय भारत की हालत ऐसी थी कि खुद अपने लिए पूरा अनाज नहीं होता था. अमेरिका भारत को अपने कानून पीएल 480 के तहत अनाज देता था.

1965 में भारत पाकिस्तान के बीच जंग हुई तो नाराज अमेरिका ने मदद बंद कर दी. भारत के पास उस समय न अनाज आयात करने के लिए पैसा था, न भंडारों में पर्याप्त अनाज. उस समय नॉर्मन बॉरलो नामक एक अमेरिकी कृषि विशेषज्ञ ने सुझाव दिया कि गेहूं की कुछ ऐसी किस्में लगाई जाएं जो रासायनिक खाद और अधिक पानी लेकर बेहद अधिक उपज देती हैं. बाद में बॉरलो को भारत सरकार ने 2006 में पद्म विभूषण से भी नवाजा.

विश्वनाथ सिंह पहली बार लाए थे एमएसपी

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उसके बाद उपज बढ़ना शुरू हुई और बढ़ती गई. उपज के साथ ही बढ़ीं किसान की समस्याएं. साल 1986 की जनवरी 25 को भारत के तत्कालीन वित्त मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने गन्ने के लिए पहली बार एमएसपी की घोषणा की.

उस समय एक मुलाकात के दौरान उन्होंने मुझसे किसानों की बेहतरी के लिए सुझाव मांगा और मैंने उन्हें एक रिपोर्ट बना कर दी.

उस रिपोर्ट के आधार पर नवंबर में उसी साल भारत सरकार ‘एग्रीकल्चर पॉलिसी अ लॉन्ग टर्म पर्सपेक्टिव’ संसद में लेकर आई. इसमें गेहूं चावल के अलावा दालें और तिलहन जैसे सूरजमुखी,सरसों और तिल की तरह की 22 फसलें थीं.

ये एक अच्छा कदम था पर दिक्कत बनी रही क्योंकि सरकारें गेहूं चावल के अलावा कुछ खरीदना नहीं चाहती थीं.

किसान की दिक्कत यह है कि उसे उसकी उपज की पूरी कीमत नहीं मिलती और सारा मुनाफा मंडी व्यापारियों के हाथों में चला जाता है. सरकारें किसानों को यह कह कर अधिक दाम नहीं मिलने देती हैं कि इसकी वजह से शहरों में आम आदमी को कम कीमत में भोजन मिल सके. पर ऐसा होता कहां है.

साल 2012 में मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान किसान को अरहर की दाल की कीमत मिल रही थी 43 रुपए किलो और बाजार में उपभोक्ता को वही दाल मिल रही थी 130 रुपए किलो.

उस दौरान हमने दाल निर्माताओं से बैठक की तो उन्होंने कहा कि उन्हें कच्ची दाल को प्रोसेस करने में बड़ा खर्चा आता है. बहुत पूछताछ पर पता लगा वो खर्च आठ से दस प्रतिशत है. अगर बाकी अन्य खर्चे जोड़ लें तब भी तीस-चालीस फीसदी से ऊपर दाम नहीं होने चाहिए.

मनमोहन सिंह ने सुझाव के बावजूद कुछ नहीं किया

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मैंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से आग्रह किया वो एक ड्युअल प्रेस मैकेनिज्म ले कर आएं. इससे मेरा मतलब है कि एक ऐसा मैकेनिज्म जो दामों के बहुत गिरने पर किसानों की मदद करें और बहुत अधिक चढ़ जाने पर उद्योगों की. लेकिन उन्होंने कुछ किया नहीं.

मैंने मध्य प्रदेश सरकार से इसी कारण इस्तीफा दिया क्योंकि वहां भी सरकार यह व्यवस्था लागू करने के लिए तैयार नहीं थी.

जब तक इस तरह की व्यवस्था नहीं लागू होती किसान यूं ही मरता रहेगा कभी पुलिस की गोली से और कभी कर्ज से.

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