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आनंदपाल: एनकाउंटर में फंसी सरकार, सुलग रहा राजस्थान

आनंदपाल के एनकाउंटर के बाद पर सवाल उठाए जा रहे हैं

Mahendra Saini Updated On: Jul 14, 2017 08:03 AM IST

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आनंदपाल: एनकाउंटर में फंसी सरकार, सुलग रहा राजस्थान

राजस्थान में आनंदपाल के एनकाउंटर की जांच का ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका अनुमान लगाना लगातार टेढ़ा होता जा रहा है. जिस एनकाउंटर को वसुंधरा सरकार अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित करने के मंसूबे बना रही थी, वो अब ऐसा मकड़जाल बन चुका है कि सरकार और बीजेपी, दोनों ही इसमें फंस कर रह गए हैं.

गैंगस्टर आनंदपाल उर्फ एपी का अंतिम संस्कार 19 दिन बाद गुरुवार को हो तो गया. लेकिन सरकार के सामने अब इससे भी बड़ी चुनौती कानून व्यवस्था को बनाए रखने की पैदा हो गई है.

एपी को श्रद्धांजलि के नाम पर उसके गांव सांवराद में जुटी भीड़ ने हालात संकटपूर्ण बना दिए. दिन भर भीड़ को ये कह कर शांत रखने की कोशिश की जाती रही कि समझौता बस होने को है. सरकार राजपूतों की मांगें मानने वाली ही है कि शीर्ष स्तर के राजपूत मंत्री सीधे वसुंधरा का सहमति पत्र लेकर आने को हैं.

लेकिन शाम होते-होते जब ये भ्रम टूटने लगा तो युवाओं के सब्र का बांध भी टूट गया. फिर वही हुआ, जिसे रोकने के लिए पूरे नागौर जिले को छावनी में तब्दील कर दिया गया था. भीड़ हिंसा पर उतारू हो गई. रेल की पटरियां उखाड़ दी गई. आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े.

आमने सामने की गोलीबारी में एक शख्स की मौत हो गई जबकि एसपी समेत 20 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हो गए. पुलिस और आरपीएफ का दावा है कि भीड़ ने उनसे हथियार छीन लिए और फायरिंग भी उधर से ही की गई.

आनंदपाल के बहाने जाति की राजनीति!

श्रद्धांजलि सभा में भाषण देने वाले समाज के नेताओं ने ही नहीं बल्कि कांग्रेस ने भी इस मुद्दे पर राजपूतों में बीजेपी विरोध को हवा देने की पूरी कोशिश की. हजारों की भीड़ से हाथ उठवा कर 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का बॉयकॉट करने का वादा लिया गया.

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया कि राजपूतों पर ये अत्याचार है और अब समय है जब राजनाथ सिंह अपना क्षत्रिय धर्म निभाएं और राजस्थान के राजपूत मंत्री इस्तीफा दें.

वैसे, राज्य के गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया ने एक बार फिर जोर देकर कहा कि गैंगस्टर के एनकाउंटर में फर्जी जैसा कुछ है ही नहीं. कटारिया ने किसी भी सूरत में सीबीआई जांच से इनकार कर दिया.

सरकार के सामने सबसे बड़ा संकट!

अब मामला केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहने वाला नहीं है. कांग्रेस इस मुद्दे के जरिये जहां नाकाम विपक्ष की छवि तोड़कर सत्ता में लौटने का मंसूबा बना रही है. वहीं, एनकाउंटर की जांच अब राजपूत समाज और बीजेपी सरकार के लिए मूंछ की लड़ाई बन गई है.

दरअसल, पिछले डेढ़ साल के दौरान, जब आनंदपाल फरार था, वसुंधरा सरकार को उसे गिरफ्तार न कर पाने के सवालों से जूझना पड़ रहा था. एसओजी में तेजतर्रार आईपीएस दिनेश एमएन के आने के बाद जब आनंदपाल का एनकाउंटर कर दिया गया तो बाद के हालात का अंदाजा न सरकार लगा पाई और न ही इंटेलिजेंस. 12 जुलाई की हुंकार रैली के बाद अब बीजेपी सरकार खुद को ऐसे चौराहे पर पा रही है जहां आगे कुआं और पीछे खाई है.

अगर राजपूतों की मांगें नहीं मानी जाती हैं तो हालात और भयावह हो सकते हैं. लॉ एंड आर्डर बनाए रखना मुश्किल साबित हो सकता है जैसा कि राजपूत करणी सेना के लोकेंद्र सिंह कालवी ने चेतावनी दी है. कालवी ने कहा कि सरकार नहीं झुकी तो राजपूत युवा पटरियां उखाड़ देंगे. हाईवे खोद देंगे और बीजेपी के किसी नेता को गांवों में घुसने नहीं देंगे.

राजपूत समाज बीजेपी का विश्वसनीय वोट बैंक रहा है. चुनाव से एक साल पहले वसुंधरा सरकार की छवि वैसे ही नकारात्मक सी बनी हुई है. ऐसे में पार्टी का कोर वोटर अगर उससे छिटकता है तो टारगेट-180 तो छोड़िए, सरकार बनाने के लाले पड़ सकते हैं.

दूसरी ओर, अगर एनकाउंटर की सीबीआई जांच की मांग मानी जाती है तो 2018 चुनाव से पहले बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है. जांच में कई ऐसे तथ्य निकल कर आ सकते हैं जिनसे बीजेपी हर हाल में बचना चाहेगी. जैसे-

- एनकाउंटर की सूचना पुलिस विभाग के मुखिया यानी गृहमंत्री को पुलिस - अधिकारियों के बजाय सीएम द्वारा क्यों दी गई? - उन आरोपों पर सफाई कौन देगा जिनमें आनंदपाल की फरारी में 4 कैबिनेट मंत्रियों का हाथ बताया गया है? - बीजेपी सरकार पहले ही चूरू के दारा सिंह और जैसलमेर के चतुर सिंह एनकाउंटर केस में काफी मुश्किलों का सामना कर चुकी है.

फिर जांच हुई तो पुलिस अधिकारी भी लपेटे में आ सकते हैं. परिस्थितियां संदेह का इशारा तो कर ही रही हैं, मसलन एनकाउंटर की रात अमावस थी. पुलिस ने पूरे इलाके की लाइट कटवा दी थी. पुलिस के मुताबिक घुप्प अंधेरे में शीशे में देखकर आनंदपाल को गोली मारी गई जो सटीक निशाने पर लगी.

रिटायर्ड सैन्य अफसर हनुमान सिंह राठौड़ का कहना है कि एक पुलिसकर्मी के लिए आमतौर पर ये संभव नहीं कि वो अंधेरे में एक शीशे में देखकर सटीक निशाना लगा दे. हां, एनएसजी कमांडो ऐसा कर सकता है.

पुलिस अधिकारियों पर उठते सवाल

एनकाउंटर से असहमत लोग इसमें शामिल पुलिस अधिकारियों के करियर रिकॉर्ड पर भी उंगली उठा रहे हैं जैसे कि आईजी दिनेश एमएन. दिनेश सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में पहले भी काफी साल जेल में रह चुके हैं.

इधर, मानवाधिकार आयोग ने भी वसुंधरा सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. आयोग अध्यक्ष प्रकाश टाटिया ने राज्य सरकार को 24 घंटे के अंदर एपी का अंतिम संस्कार कराने का आदेश दिया.

लेकिन इस पूरे मामले में जो सबसे बड़ा पहलू सामने आ रहा है वो है सरकार की लापरवाही, अकर्मण्यता के साथ ही संवाद और संकटमोचकों की कमी.

सरकारी स्तर पर समय रहते सही कदम नहीं उठाए गए. न एपी के परिवार से बात की गई, न राजपूत समाज को विश्वास में लिया गया. न किसी राजपूत मंत्री ने आगे आकर मोर्चा संभाला. इसके बदले सरकार ने हर कदम उल्टी ही चाल चली. मामले को पहले जाट बनाम राजपूत रंग देने की कोशिश हुई.

फिर राजपूतों की एकता तोड़ने की कोशिश हुई. फिर एपी के घर बैठक के लिए आने वालों का नाम पता दर्ज करना, इलाके की ड्रोन कैमरा से निगरानी, धारा 144 लगाना और नागौर, चूरू और सीकर जिलों में इंटरनेट सेवा बाधित करने जैसे कदमों ने स्थानीय लोगों को उकसाने का ही काम किया.

बहरहाल देर से सही, राजस्थान सरकार ने 12 जुलाई की हिंसा के बाद अब तेवर सख्त कर लिए हैं. सरकार का मानना है कि जिसको भी एनकाउंटर फर्जी लगता है उसके लिए सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खुले हैं.

अब देखना ये है कि देश के सबसे बड़े राज्य में क्या एक गैंगस्टर के बहाने जाति और ब्लैकमेलिंग की राजनीति पर रोक लग पाएगी?

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