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अमर्त्य सेन डॉक्यूमेंट्री विवाद: सेंसर बोर्ड के आदेश अब हास्यास्पद होते जा रहे हैं

जिस मशहूर अर्थशास्त्री की आवाज दुनिया भर में गूंजती है, उनके साथ यह व्यवहार शर्मनाक है.

Sandipan Sharma | Published On: Jul 14, 2017 11:21 AM IST | Updated On: Jul 14, 2017 11:50 AM IST

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अमर्त्य सेन डॉक्यूमेंट्री विवाद: सेंसर बोर्ड के आदेश अब हास्यास्पद होते जा रहे हैं

जे के रॉलिंग को अतिसंवेदनशील भारतीयों और वर्तमान सेंसर बोर्ड में उनके संरक्षकों के लिए नए शब्द गढ़ने चाहिए. ये शब्द उन वैसे लोगों के लिए होने चाहिए फिलहाल अमर्त्य सेन पर बनी डॉक्यूमेंट्री से डरे हुए हैं.

शब्दों की इस नई सूची में उन शब्दों के लिए कोई विकल्प ढूंढा जाना चाहिए, जिनका जिक्र डर की वजह से नहीं हो सकता और इसी वजह से व्यक्तियों या जगहों के नाम साफ तौर पर नहीं लिए जा सकते हैं. निश्चित रूप से ऐसा किसी अनजाने या ‘ईश्वर’ के भय के कारण होता है.

रॉलिंग के इस शब्दकोष में ‘यू-नो-हू (जिन्हें जानते हैं) या ‘ही-वू-मस्ट-नॉट-बी-नेम्ड (वो जिनका नाम नहीं लिया जा सकता)’ के जरिए हर बात को बताया जा सकता है, जिनका जिक्र नहीं किया जा सकता. जिन जगहों का जिक्र नहीं हो सकता उनके लिए यू-नो-वेयर (आप जानते हैं कहां) जैसे शब्दों का इस्तेमाल हो सकता है.

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यह शब्दकोष उन फिल्मकारों के काम को कितना आसान बना देगा जिन्हें गुजरात, गाय, हिन्दू इंडिया जैसे जिक्र नहीं किए जाने वाले शब्दों पर बात करनी होती है. और, जिन शब्दों को हटाने की बात सेंसर बोर्ड कहता है.

किसी फिल्म या डॉक्यूमेंट्री में बातचीत तब कुछ इस तरीके से होती- 'कभी दंगे हुए थे. जैसा कि आप जानते हैं वे-क्या-थे, आप जानते हैं कि वो कौन-सी-जगह- थी.'

या

'चार पैरों वाली मां जिनका-नाम-नहीं-लिया-जा-सकता, के मांस को खाने के संदेह में रक्षकों की ओर से लिंचिंग की कई घटनाएं हुईं हैं जिस बारे में आप-जानते-हैं-कि-वे-किस-समुदाय-के-थे” (इसमें मांस का शब्द भी बदल दो, इसकी जगह लिखो- जो-गोवा-में-नहीं-खाया-जा-सकता, लेकिन-दिल्ली-में-नहीं).

आप शर्त लगा सकते हैं पहलाज निहलानी (वह-जो-अपने-मालिक-की-आवाज-है) और उनकी टीम आपसे तब कभी किसी कट, डायलॉग में बदलाव या फिल्म निर्माता से शब्द म्यूट करने को नहीं कहते. और पूरा सिनेमा जगत अपनेआप संस्कारी हो जाता.

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नोबेल पुरस्कार विजेता पर घंटे भर की डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले सुमन घोष को सेंसर बोर्ड का निर्देश सही मायने में चेतावनी है कि आगे से कंटेंट में ऐसे किसी भी शब्द या मुहावरे से बाज आएं जो किसी वर्ग विशेष या लोगों को किसी भी तरह आहत करते हों.

ताजा मामले से ये साफ है कि बोर्ड के सदस्यों को अब मनोवैज्ञानिक डर हो गया है जो उन्हें उन शब्दों से भी डरा रहा है जो वर्षों से रोजाना इस्तेमाल होते आए हैं.

नहीं तो, थोड़ा भी दमखम रखने वाला दक्षिणपंथी भी क्या ‘भारत के हिंदूवादी नजरिये’ को ‘सांप्रदायिक सौहार्द्र’ पर खतरे के रूप में देखता? या डॉक्यूमेंट्री में गुजरात के जिक्र पर हास्यास्पद तर्क देता कि यह 'राज्य की सुरक्षा को खतरे में डाल देगा?'

लेकिन यही भारतीय फिल्म के सेंसर बोर्ड का असली चेहरा है. यह झाल-मजीरा बजाने वाली चापलूसों की टोली बन गई है, जो अपने मालिकों को खुश करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है, ऐसे संकेत दे सकती है कि ऐसे कौन से शब्द हो सकते हैं जिनका नाम नहीं लिया जा सकता.

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कभी दोहरे अर्थ और उत्तेजक गीतों वाली फिल्में बनाने वाले (उदाहरण के लिए निहलानी की फिल्म जैसे-आंखें और अंदाज) शख्स के नेतृत्व में अचानक संस्कार और राजनीतिक रूप से सही होने की ललक न सिर्फ छलावा है, बल्कि उस देश पर एक दाग है जहां हर मुद्दे तर्क और बहस की कसौटी पर परखे जाते रहे हैं. जहां विद्वानों में शास्त्रार्थ और दर्शन के बीच धार्मिक तर्क-वितर्क की पुरानी परंपरा रही है.

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जिस मशहूर अर्थशास्त्री की आवाज दुनिया भर में गूंजती है, उनके साथ यह व्यवहार शर्मनाक है. नैतिक रूप से कायरता और ओछी सोच का प्रदर्शन है. वह-जो-अपने-मालिक-की-आवाज-है में जो हास्यास्पद बात है और उसका जो शोर है, उससे पता चलता है कि वे पहले की घटनाओं से भी कुछ सीखना नहीं चाहते.

हालिया वाकयों पर गौर करें तो साफ होता है कि सेंसर बोर्ड पर संभोग जैसे शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति, जेम्स बॉन्ड की फिल्म स्पेक्टर में चुम्बन के सीन को छोटा करने और ‘उड़ता पंजाब’ के टाइटल से ‘पंजाब’ जैसे शब्द पूरी तरह से हटाने समेत दर्जनों कट के आदेश को लेकर सवाल उठते रहे हैं. लेकिन अपनी पिछली भूलों से सीखने के बजाए बोर्ड अजीबोगरीब तर्क दे रहा है. उसके आदेश और ज्यादा गैरवाजिब और हास्यास्पद लगते हैं.

जब बिना रीढ़ वाले लोग सत्ता में बैठ जाते हैं और सेंसर की ताकत का इस्तेमाल करने लगते हैं, तो वे कला और साहित्य को अपने व्यक्तित्व के आईने में देखने लगते हैं. उसे तार्किक बनाने लगते हैं और समाज को अपने सांचे में ढालने की कोशिश करने लगते हैं. निहलानी और उनकी टीम वही करने की कोशिश कर रही है.

ऐसे में कला को जिंदा रखने वालों के लिए यही विकल्प रह जाता है कि वह-जो-अपने-मालिक-की-आवाज-है का विरोध करें या, भारतीय सिनेमा को श्रद्धांजलि देते हुए रॉलिंग की नजर से दुनिया को देखें, जहां आप-जानते-हैं-किसके डर की वजह से किसी का नाम नहीं लिया जा सकता.

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