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अमरनाथ आतंकी हमला: ये इलाका 16 साल पहले भी उतना ही संवेदनशील था

संवेनदशील माहौल के बीच सुरक्षा घेरे से बाहर होने कारण आतंकियों को हमले का मौका मिल गया

David Devadas Updated On: Jul 11, 2017 03:15 PM IST

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अमरनाथ आतंकी हमला: ये इलाका 16 साल पहले भी उतना ही संवेदनशील था

वह 2001 का साल था. मैं दिन का अपना काम निपटा कर श्रीनगर से 30 किलोमीटर दूर एक गांव की ओर लौट रहा था. मैं पंदाच पहुंच गया था जो कि हाईवे पर एक मुख्य क्रॉसिंग है. यहां से बालटाल के लिए महज एक संकरी सड़क थी. यह अमरनाथ यात्रा के लिए नया मार्ग था.

एक पुलिसवाले ने लाठी भांजते हुए मुझे कार रोकने का इशारा किया. लगा कि नहीं रोका तो वह कार पर लाठी चला देगा. उसे लगा कि मैं एक यात्री हूं. जब मैंने उससे कश्मीरी में कहा, 'बा चुस रोजन यापारी (मैं यहीं रहता हूं)' तब उसने मुझे जाने दिया.

खतरे के मद्देनजर आज की तरह तब भी अंधेरा होने के बाद यात्रियों को सफर नहीं करने दिया जाता था और सफर के दौरान भारी सुरक्षा व्यवस्था होती थी.

सुरक्षा दायरे से बाहर थे यात्री

सोमवार को हुए हमले में जो लोग मारे गए वह सुरक्षा दायरे के बाहर थे. रात में यात्री बस का सफर करना मना होता है.

लेकिन सालों से कई यात्री सफर खत्म होने के बाद घूमने के इरादे से अपने-अपने रास्ते निकल जाते हैं. शुरुआती जानकारी के मुताबिक इस हमले के शिकार हुए यात्री भी यही कर रहे थे.

ऐसा भी लग रहा है कि लगभग उसी वक्त हुए दूसरे हमले में आतंकियों ने सुरक्षाबलों के काफिले पर हमला किया था.

इस बार किए गई थे भारी सुरक्षा इंतजाम

इस साल की यात्रा के लिए सुरक्षा व्यवस्था पिछले कई सालों से ज्यादा चाक-चौबंद की गई थी. सभी यात्रियों को पहलगाम होते हुए जाने और बालटाल होते हुए लौटने को कहा गया था. सरकार और सुरक्षाबल, दोनों का ध्यान यात्रा को सुरक्षित संपन्न करवाने पर ही था.

इस साल ऐसे भी यात्रा करने वाले लोगों की संख्या में कमी आई थी. जो यात्री थे उनमें से ज्यादातर ने भी कश्मीर घूमने में ज्यादा रुचि नहीं दिखाई थी. यात्रा के करीब स्थित सोनमर्ग में स्थानीय लोगों ने खाली पड़े होटलों पर चिंता जताई थी.

सीमित जानकारी बाहर आई

हमले के बाद सरकार ने पुलिस के जरिए जानकारी को बाहर निकलने से रोक दिया. इसके चलते सारी जानकारी सिर्फ अर्धसैनिक बलों और नेताओं के जरिए ही मिली.

सरकार चला रहे दोनों दलों की ओर से महज एक-एक मंत्री को मीडिया से बात करने के लिए उतारा गया जिसमें केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह भी शामिल हैं. उन्होंने हमले की भयावहता और कश्मीरियत का जिक्र किया.

बाद में सामने आने वाले नेताओं और अधिकारियों ने शुरुआत में यह साफ नहीं किया कि जिन पर हमला हुआ वो यात्री के रूप में रजिस्टर्ड नहीं थे और सुरक्षा घेरे से बाहर थे. इसके कारण इस खबर के मीडिया में आते ही सनसनी फैल गई और इसके बाद राज्य और केंद्र सरकार की भारी फजीहत हुई.

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