S M L

एम्स में फंड की कमी: अधर में लटक सकते हैं कई प्रोजेक्ट्स

एम्स ने स्वास्थ्य मंत्रालय से विकास कार्यों पर साल 2017-18 में 3 हजार करोड़ रुपए की मांग की थी, लेकिन अभी तक मात्र 576 करोड़ रुपए ही मिल पाए हैं

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Sep 20, 2017 04:41 PM IST

0
एम्स में फंड की कमी: अधर में लटक सकते हैं कई प्रोजेक्ट्स

देश के सबसे बड़े और नामचीन अस्पतालों में से एक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में फंड की कमी हो गई है. एम्स में फंड की कमी होने की वजह से कई प्रोजेक्ट्स का काम अधर में लटकता दिख रहा है.

एम्स में पहले से ही मरीजों का काफी दबाव रहता है. ऊपर से फंड की कमी ने एम्स की हालत पतली कर दी है. स्वास्थ्य मंत्रालय ने काफी लंबी-चौड़ी परियोजनाएं तैयार तो जरूर कर ली, पर अब उन परियोजनाओं के लिए पैसा जुटाना मुश्किल चुनौती साबित हो रहा है.

पैसे की मार झेल रहा एम्स!

अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक एम्स ने स्वास्थ्य मंत्रालय से विकास कार्यों पर साल 2017-18 में 3 हजार करोड़ रुपए की मांग की थी, लेकिन अभी तक मात्र 576 करोड़ रुपए ही मिल पाए हैं.

एम्स के एक अधिकारी के अनुसार, ‘अस्पताल की वित्त कमेटी की बहुत जल्द ही बैठक होने वाली है, जिसमें एम्स में चल रहे विकास कार्यों पर चर्चा की जाएगी. साथ ही यह कोशिश की जाएगी कि कम से कम 14 सौ करोड़ रुपए किसी तरह से जुटाए जा सके, जिससे अधूरे प्रोजेक्ट को पूरा किया जा सके.’

ऐसी खबर है कि एम्स वित्तीय संकट से उभरने के लिए कई बैंकों से लोन लेने पर भी विचार कर रहा है. एम्स प्रशासन बैंकों से लोन लेकर अधूरी परियोजनाओं को पूरा करने का मन बना रही है.

ऐसा कहा जा रहा है कि स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों ने एम्स प्रशासन को बता दिया है कि एम्स बैंकों से लोन लेकर संस्थान के द्वारा बनाए जा रहे सेंटरों का काम पूरा करे. स्वास्थ्य मंत्रालय ने एम्स को कहा है कि सरकारी बजट से कम पैसा खर्च करे.

हम आपको बता दें कि एम्स में इस वक्त कई परियोजनाओं पर काम चल रहा है. इनमें सबसे बड़ी परियोजना झज्जर में निर्माणाधीन राष्ट्रीय कैंसर संस्थान का काम भी शामिल है.

710 बेड की क्षमता वाली इस परियोजना में 2 हजार 35 करोड़ रुपए की लागत आने वाली है. लेकिन, पैसे की कमी के कारण यह काम भी अधर में लटक गया है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

यह प्रोजेक्ट जुलाई 2018 में बनकर तैयार होना था, पर अब लगता है कि 2019 से पहले यह प्रोजेक्ट तैयार नहीं होगा.

इसी तरह एम्स में सर्जिकल ब्लॉक बन कर तैयार है. इस सर्जिकल ब्लॉक के लिए फर्नीशिंग वर्क, मशीनों की खरीदारी और कर्मचारियों की भर्ती होना बाकी है. एम्स का कहना है कि सर्जिकल ब्लॉक का काम साल 2018 के मध्य तक शुरू हो जाएगा.

इसी तरह एम्स में 400 बेड वाला नया जच्चा-बच्चा ब्लॉक बनाया जा रहा है. नया जच्चा-बच्चा ब्लॉक बनाने का काम साल 2014 में शुरू हुआ था. लेकिन, अभी भी इस प्रोजेक्ट में 60 प्रतिशत काम पूरा होना बाकी है.

इस ब्लॉक को बनाने की डेड लाइन फरवरी 2016 रखी गई थी. लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी सिर्फ 40 प्रतिशत ही काम पूरा हुआ है.

एम्स में नया ओपीडी ब्लॉक, एम्स ट्रामा सेंटर का विस्तारीकरण सहित कई छोटे-मोटे प्रोजेक्ट पर काम किया जा रहा है. चिकित्सा उपकरण लगाने से लेकर कर्मचारियों की नियुक्ति में भारी भरकम बजट खर्च आने वाला है.

एम्स में प्राइवेट वार्ड, इमरजेंसी वार्ड और जेरियाट्रिक ब्लॉक का भी निर्माण होना है. इसलिए एम्स ने वर्तमान परियोजनाओं के लिए सरकार से 4 हजार करोड़ रुपए की मांग की थी.

फंड की कमी नई बात नहीं

एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया के मुताबिक अभी तक एम्स को लगभग 400 करोड़ का बजट ही मिला है. बैंकों से लोन लेकर परियोजनाओं को पूरा करने के विकल्प पर विचार किया जा रहा है.

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में पिछले कई सालों से रेजिडेंट्स डॉक्टरों के लिए और होस्टलों की मांग होती रही है. इसके बावजूद अभी तक इन डॉक्टरों की मांग पूरी नहीं की गई है. रेजिडेंट्स डॉक्टरों को कैंपस से बाहर रहना पड़ रहा है.

एम्स के एक रेजिडेंट डॉक्टर फर्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ‘देखिए पहले भी फंड को लेकर एम्स के कई प्रोजेक्ट्स बंद हुए हैं. एम्स के लिए फंड की कमी कोई नई बात नहीं है. पूर्व में ऐसा होता रहा है. सरकार को यह ध्यान देना चाहिए कि कम से कम फंड की वजह से तो कोई प्रोजेक्ट नहीं रुके. एम्स जैसे संस्थानों के लिए भी अगर सरकार का रवैया ऐसा है तो और चीजों में कैसा होगा?’

देश के सबसे बड़े अस्पताल एम्स में फंड का ही रोना नहीं है. चुनौती और भी कई हैं. देश के छह नए एम्स में आज भी डॉक्टरों की भारी कमी है. सरकार के द्वारा बार-बार विज्ञापन के बाद भी पटना, भुवनेश्वर, भोपाल, रायपुर, जोधपुर और ऋषिकेश के एम्स में डॉक्टर काम करने को तैयार नहीं हो रहे हैं.

ऐसी खबर मिल रही है कि स्वास्थ्य मंत्रालय इन सभी छह एम्स में रिटायर डॉक्टरों की सेवा लेने की तैयारी कर रहा है. डॉक्टरों और कर्मचारियों की कमी के कारण अभी तक इन छह एम्स में पूरी तरह से काम शुरू नहीं हो सका है.

साल 2016 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश के छह एम्स के लिए 1300 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था. इनमें सिर्फ 300 लोगों का ही चयन हुआ था. इन 300 में से 200 डॉक्टर्स थे. ऐसा कहा गया कि आवेदन करने वालों में से ज्यादातर योग्य उम्मीदवार नहीं थे.

देश के सबसे बड़े अस्पताल एम्स का जब ये हाल है, जहां पर सरकार के द्वारा बजट में एक विशेष पैकेज दिया जाता है, डॉक्टरों की सैलरी देश के दूसरे सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों से कहीं ज्यादा होती है. ऐसे में देश के उन अस्पतालों या रिसर्च सेंटरों का क्या हाल होगा जहां पर सरकारी फंड देने के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जाती है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi