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आरुषि-हेमराज मर्डर: जांच को ताक पर रखकर कहानियां सुनाती रही CBI

पूरा मामला केवल संदेहों और मान्यताओं के आधार पर चल रहा था. सीबीआई ने पिछले 9 सालों से कई कहानियां गढीं, जिन्हें कोर्ट ने खारिज कर दिया.

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Oct 13, 2017 01:34 PM IST

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आरुषि-हेमराज मर्डर: जांच को ताक पर रखकर कहानियां सुनाती रही CBI

आरुषि-हेमराज हत्याकांड में राजेश तलवार और नूपुर तलवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूं ही नहीं बरी कर दिया. इस हत्याकांड की हकीकत यह है कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी इस दोहरे हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने में पूरी तरह नाकामयाब साबित हुई. यह सीबीआई की कार्यक्षमता और कार्यशैली पर सवालिया निशान है.

सीबीआई के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि सीबीआई के पास अब कोई चारा नहीं बचा है. सीबीआई अगर सुप्रीम कोर्ट जाती भी है तो उसका भी अंजाम इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले जैसा ही होगा.

गौरतलब है कि सीबीआई ने अपने शुरुआती जांच में तलवार दंपत्ति के तीन नौकरों को संदेह के आधार पर गिरफ्तार किया था. लेकिन बाद में सीबीआई के संदेह के घेरे में राजेश तलवार और नूपुर तलवार आ गए.

सीबीआई को भी नहीं पता कि आरुषि को किसने मारा

लेकिन ताज्जुब यह है कि इसमें से किसी के भी खिलाफ सीबीआई कोई ठोस सुबूत नहीं जुटा पाई. न ही फोरेंसिक साक्ष्य, न ही मोबाइल सर्विलांस काम आया और न ही सीन ऑफ क्राइम के पास पड़ी शराब की बोतल, गिलास, फिंगर प्रिंट, छत पर पड़े खून से सने पंजे के निशान और न ही फुटप्रिंट से कोई सुराग मिल पाया.

सीबीआई दबी जुबान में स्वीकार कर रही है कि जांच से जुड़े सीबीआई के किसी भी अधिकारी को मालूम नहीं है कि आखिरकार आरुषि और हेमराज की हत्या किसने की.

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दरअसल इस हत्याकांड की पूरी गुत्थी शराब की एक बोतल और एक गिलास पर अंगुली की एक निशान पर टिक गई थी. इस गिलास पर आरुषि और हेमराज के खून से सनी अंगुली के निशान थे. सीबीआई अपने शुरुआती जांच में यह मानकर चल रही थी कि जिसने भी उस रात को शराब पी थी, उसी ने हेमराज और आरुषि की हत्या की. यानी हत्या के बाद शराब पी गई.

लेकिन सीबीआई अभी तक इस अंगुली वाले शख्स को तलाशने में विफल साबित हुई है. बचाव पक्ष की यही दलील सीबीआई के खिलाफ गई. फोरेंसिक एक्सपर्ट ने उस गिलास पर राजेश या नूपुर तलवार की अंगुली के निशान होने का साफ इंकार किया था.

यूपी पुलिस ने बिगाड़ा था पूरा मामला

दरअसल इस केस को उत्तर प्रदेश पुलिस की लापरवाही ने जटिल बना दिया. सीबीआई को जब तक जांच का जिम्मा सौंपा गया तब तक गंगा-जमुना से काफी पानी निकल चुका था यानी सुबूतों से छेड़छाड़ और नष्ट किया जा चुका था.

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सीबीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, आज भले ही सीबीआई पर ठीकरा फोड़ा जा रहा है, पर किसी केस का मेरिट सुबूतों के आधार पर ही बनता और बिगड़ता है. यूपी पुलिस ने शुरुआती सात-आठ दिनों में ही इस केस को खराब कर दिया था.

सीबीआई जांच के शुरुआती दो-तीन सालों में अपने ही किए जांच को पलटती रही. यूपी पुलिस के आईजीपी और इस केस के पहले जांच अधिकारी गुरुदर्शन सिंह ने राजेश तलवार को गिरफ्तार किया था. गुरुदर्शन सिंह ने ही नोएडा में मीडिया से बात करते हुए पिता और बेटी के चरित्र पर भी सवाल उठाए थे.

वहीं, इस केस की शुरुआती जांच की कमान संभालने वाले सीबीआई के ज्वाइंट डायरेक्टर अरुण कुमार ने 10 दिन के भीतर ही राजेश तलवार के तीन नौकरों कृष्णा, राजकुमार और विजय मंडल को गिरफ्तार किया और राजेश तलवार को रिहा कर दिया था.

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सीबीआई के ज्वाइंट डायरेक्टर अरुण कुमार 31 मई 2008 को इस केस का चार्ज लिया था. अरुण कुमार के जांच अधिकारी रहते इस हत्याकांड की पूरी जांच इन्हीं तीन नौकरों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही. सीबीआई ने नार्को टेस्ट के आधार पर तीन नौकरों पर चार्जशीट दाखिल करना चाहा.

क्लोजर रिपोर्ट भी थी बेकार

इस हत्याकांड में उस समय नाटकीय मोड़ आ गया जब सीबीआई के ज्वाइंट डायरेक्टर अरुण कुमार की जगह एजीएल कौल को सितंबर 2009 में जांच का जिम्मा सौंपा गया. एजीएल कौल ने जिम्मेदारी संभालते ही जांच की दिशा तलवार दंपत्ति के तरफ मोड़ दिया. लेकिन दिसंबर 2010 में जांचकर थक चुकी सीबीआई ने कोर्ट में एक क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी.

सीबीआई ने यह कहते हुए क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी कि हत्या में कोई साक्ष्य नहीं मिला, फिर भी सीबीआई को राजेश तलवार पर ही इस हत्याकांड को अंजाम देने का शक है.

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25 जनवरी 2011 को क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ तलवार दंपत्ति कोर्ट चले गए. इस पर सीबीआई के तत्कालीन जुडिशियल मजिस्ट्रेट ने सीबीआई को दोबारा जांच करने का आदेश दिया.

इस बीच तलवार दंपत्ति निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक और जेल से अंदर-बाहर होते रहे. कहीं अपील खारिज होती तो कहीं सीबीआई की फटकार लगती. कुल मिलाकर जनवरी 2011 से लेकर 25 नवंबर 2013 तक गाजियाबाद की विशेष अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ट्रायल चलता रहा.

आखिर 25 नवंबर 2013 को गाजियाबाद की विशेष सीबीआई अदालत ने आरुषि और हेमराज की हत्या का दोषी पाया और उम्रकैद की सजा सुनाई.

सीबीआई की रिपोर्ट खुद विरोधाभासों से भरी

साल 2014 में तलवार दंपत्ति फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट चले गए. इसी साल 11 जनवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तलवार दंपत्ति की अपील पर फैसला सुरक्षित रखा.

1 अगस्त को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अपील दोबारा से सुनेंगे क्योंकि सीबीआई के दलीलों में काफी विरोधाभास है. दोबारा दलील सुनने के बाद कोर्ट ने 8 सितंबर 2017 को फैसला सुरक्षित रख लिया और 12 अक्टूबर को कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में तलवार दंपत्ति को बरी कर दिया.

अब लोगों के जेहन में दो सवाल कौंध रहे हैं, पहला आरुषि-हेमराज को किसने मारा? दूसरा, अगर मारा तो क्यों मारा? यूपी पुलिस से लेकर सीबीआई तक के पास भी इसका कोई जवाब नहीं है.

सच्चाई यह है कि पूरा मामला केवल संदेहों और मान्यताओं के आधार पर चल रहा था. सीबीआई ने पिछले 9 सालों से इस केस में एक से बढ़ कर एक कहानियां गढ़ी, जिन्हें कोर्ट ने आखिरकार खारिज कर दिया.

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