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449 निजी स्कूलों की बिल्कुल सही 'क्लास' लगाई है दिल्ली सरकार ने

दिल्ली सरकार निजी स्कूलों की बरसों से चली आ रही फीस बढ़ाने की मनमानी और गलत तौर-तरीकों पर लगाम लगाना चाहती है.

Atishi Marlena Updated On: Aug 25, 2017 01:35 PM IST

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449 निजी स्कूलों की बिल्कुल सही 'क्लास' लगाई है दिल्ली सरकार ने

कुछ दिनों पहले एक खबर ने बहुत सुर्खियां बटोरी थीं. अखबारों ने लिखा था कि दिल्ली सरकार 449 स्कूलों को अपने कब्जे में लेने वाली है. इस खबर से कई सवाल उठे. क्या ये दिल्ली सरकार की अधकचरी समाजवादी योजना है? क्योंकि दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने लोगों को पानी और बिजली की सब्सिडी देकर पहले ही पुराने समाजवादी तौर-तरीके दिखाए थे. या फिर आम आदमी पार्टी की सरकार एक बार फिर से राष्ट्रीयकरण का पुराना दौर वापस लाना चाहती है?

ये दोनों ही बातें गलत हैं. दिल्ली सरकार तो बस निजी स्कूलों की बरसों से चली आ रही फीस बढ़ाने की मनमानी और गलत तौर-तरीकों पर लगाम लगाना चाहती है.

स्कूलों ने की मनमानी

दिल्ली में स्कूलों को दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट ऐंड रूल्स 1973 के तहत काम करना होता है. इस कानून के मुताबिक, निजी स्कूलों को अपने अध्यापकों को सरकारी स्कूलों के बराबर तनख्वाह देनी चाहिए. जब 2008 में छठा वेतन आयोग लागू हुआ था, तो निजी स्कूलों को भी अपने टीचर्स की सैलरी बढ़ानी चाहिए थी. लेकिन, दिल्ली के कई निजी स्कूलों ने दावा किया कि उनके पास पैसे ही नहीं हैं. अध्यापकों की सैलरी बढ़ाने के लिए उन्हें फीस बढ़ानी होगी. इसके बाद तमाम निजी स्कूलों ने फीस बढ़ा दी.

इसका कई अभिभावकों ने विरोध किया. कई बच्चों के मां-बाप कोर्ट भी गए. 2011 में दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली अभिभावक संघ बनाम दिल्ली सरकार के मुकदमे की सुनवाई करते हुए जस्टिस अनिल देव सिंह कमेटी बनाई. इस कमेटी को स्कूलों के खातों की पड़ताल करके ये तय करना था कि उनका फीस बढ़ाना कितना सही था.

544 स्कूलों ने मनमाने तरीके से बढ़ाई थी फीस

जस्टिस अनिल देव सिंह कमेटी ने अगले तीन साल तक एक हजार से ज्यादा निजी स्कूलों के खातों की गहरी पड़ताल की. इस कमेटी की जांच में कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं. इससे बच्चों के मां-बाप की शंका सही साबित हुई. कमेटी की जांच में पता चला कि 544 स्कूलों ने गैरवाजिब और मनमाने तरीके से फीस बढ़ाई थी. जबकि उनके पास अध्यापकों की तनख्वाह बढ़ाने के लिए रिजर्व फंड था.

जो लोग भी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजते हैं, उन्हें बार-बार फीस बढ़ोत्तरी की मार झेलनी पड़ती है. इसके अलावा भी उन्हें तमाम मदों में पैसे देने पड़ते हैं. देश के तमाम हिस्सों में अभिभावक, निजी स्कूलों की मनमानी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते रहे हैं. कई बार ये सवाल भी उठता है कि क्या अभिभावक अपने बच्चों को उन स्कूलों में पढ़ने भेज देते हैं, जिनका खर्च उठाना उनके बस की बात नहीं होती. और फिर यही अभिभावक बात-बात पर नाखुशी और विरोध जताते हैं?

मगर, जस्टिस अनिल देव सिंह कमेटी की जांच से साफ हो गया कि अभिभावकों की शिकायतें गलत नहीं थीं. स्कूल मनमाने तरीके से फीस बढ़ा रहे थे. पहले तो वो ये दावा अंदाजे से कर रहे थे. मगर कमेटी की जांच में तो ये बात पक्के तौर पर सामने आ गई.

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ऐसा पहली बार हुआ था जब स्कूलों के खातों की पड़ताल हुई. पिछले साल दिल्ली सरकार ने एक बार फिर से कुछ निजी स्कूलों के खातों की जांच की. ये वो स्कूल थे, जो अपनी फीस बढ़ाना चाहते थे. ऐसा करते हुए दिल्ली सरकार ने पहली बार उस नियम के तहत कार्रवाई की, जो कानून में तो था, मगर उसे कभी लागू नहीं किया गया. दिल्ली सरकार के एजुकेशन एक्ट के मुताबिक जो निजी स्कूल सरकारी जमीन पर चल रहे हैं, उन्हें फीस बढ़ाने से पहले सरकार से इजाजत लेनी होगी.

केवल 5 को थी जरूरत

दिल्ली के सौ से ज्यादा निजी स्कूलों ने फीस बढ़ाने की अर्जी दी थी. उनके खातों को सीएजी के लिए काम करने वाले चार्टर्ड अकाउंटेंट ने जांचा-परखा. इस पड़ताल के नतीजे तो जस्टिस अनिल देव सिंह कमेटी की रिपोर्ट से भी ज्यादा चौंकाने वाले थे. जिन सौ से ज्यादा स्कूलों ने फीस बढ़ोत्तरी की इजाजत मांगी थी, उनमें से केवल पांच को इसकी जरूरत थी. क्योंकि उनके पास फंड की कमी थी. बाकी स्कूलों के पास खर्च और स्कूल चलाने के लिए पर्याप्त पैसे थे. फिर भी वो फीस बढ़ाना चाहते थे.

सरकार के ऑडिट में स्कूल में कई और गड़बड़ियों का भी पता चला. एक स्कूल के मैनेजमेंट ने फार्महाउस खरीदा था. किसी स्कूल के मालिक के खाते में स्कूल का पैसा ट्रांसफर किया गया था. इसके अलावा स्कूलों के नाम पर कई स्कूल मालिकों ने मोटा कर्ज ले रखा था. असल में अभिभावक, फीस के नाम पर जो पैसे दे रहे थे, वो ये स्कूल मालिक अपनी निजी संपत्ति बढ़ाने में इस्तेमाल कर रहे थे.

क्यों नहीं हुई सही कार्रवाई?

अब सवाल ये उठता है कि आखिर इस मामले की पड़ताल के लिए हाईकोर्ट के कमेटी बनाने का इंतजार क्यों किया गया? कानून में जो धारा थी कि फीस बढ़ाने से पहले शिक्षा विभाग से इजाजत लेनी होगी, उसे लागू क्यों नहीं किया गया? जबकि ये धारा तो कई दशक से कानून का हिस्सा है.

इसकी वजह तमाम राजनैतिक दलों और स्कूल मालिकों की मिलीभगत है. बहुत से सियासी लीडर स्कूल चलाते हैं. इनमें से कई स्कूलों को सरकार से जमीन मिली हुई है. ये जमीन उन्हें बेहद कम कीमत पर मिली थी. इन स्कूलों में रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट ही मैनेजमेंट का हिस्सा होते हैं. इन ताल्लुकात की रोशनी में ये समझा जा सकता है कि दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग ने क्यों नहीं कभी भी निजी स्कूलों के खातों की पड़ताल की. जबकि हर स्कूल हर साल अपने खातों का ब्यौरा सरकार को देता है.

सरकार से मिल रहे संरक्षण के चलते ही निजी स्कूल बरसों से मनमाने तरीके से फीस बढ़ाते आए हैं. इसी वजह से आज भी ये स्कूल जस्टिस अनिल देव सिंह कमेटी की सिफारिशों की अनदेखी कर रहे हैं. 550 से ज्यादा स्कूलों को कई बार आदेश दिया जा चुका है कि वो बढ़ाई गई फीस अभिभावकों को वापस करें. मगर पिछले तीन सालों में केवल 100 स्कूलों ने ये आदेश माना है.

मनीष, manish

सरकार के पास बस यही है रास्ता

बाकी के 449 स्कूलों ने सरकार के आदेश की अनदेखी की है. दिल्ली एजुकेशन एक्ट और रूल्स के मुताबिक, ऐसे स्कूलों पर सरकार दो तरह से कार्रवाई कर सकती है. या तो इन स्कूलों की मान्यता खत्म कर दी जाए, या फिर सरकार उनका मैनेजमेंट अपने हाथ में ले ले. अगर सरकार इन स्कूलों की मान्यता रद्द करती है, तो इसका बच्चों के भविष्य पर बुरा असर पड़ेगा. सरकार हर हाल में बच्चों और अभिभावकों की मदद करना चाहती है.

ऐसे में बार-बार की नाफरमानी से निपटने का दिल्ली सरकार के पास दूसरा तरीका ही बचा है. वो ये कि वो इन 449 स्कूलों का कामकाज अपने कब्जे में ले ले. इसीलिए दिल्ली की सरकार ने इन स्कूलों से दो-टूक कह दिया है कि वो या तो बढ़ी हुई फीस लौटा दें, या फिर उन्हें सरकार अपने कब्जे में ले लेगी.

सरकार के सख्त रुख के चलते कई स्कूलों ने फीस लौटानी शुरू कर दी है. कई और स्कूलों के ऐसा करने की उम्मीद है. अगले कुछ हफ्तों में वो अभिभावकों को पैसे लौटा देंगे.

अब दिल्ली सरकार, अपने हुक्म की नाफरमानी करने वाले स्कूलों का अधिग्रहण करेगी या नहीं, ये तो वक्त ही बताएगा. लेकिन एक बात तो साफ है कि निजी स्कूल, अफसरों और नेताओं की शह पाकर ही मनमाने तरीके से काम कर रहे थे. इस गठजोड़ को तोड़ना बहुत जरूरी है, तभी बच्चों और अभिभावकों के हितों की रक्षा हो सकेगी. और अगर ये काम दिल्ली में हो सकता है, तो, देश के दूसरे राज्यों में भी हो सकता है.

(लेखिका आम आदमी पार्टी की सीनियर लीडर और दिल्ली के उपमुख्यमंत्री और शिक्षामंत्री मनीष सिसोदिया की सलाहकार हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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