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हमसे आधार मांगने से पहले सरकार को बहुत कुछ देना होगा

आधार प्रोजेक्ट के अपने फायदे हैं. लेकिन इससे जुड़ी दिक्कतों-चिंताओं के बारे में भी सोचना चाहिए.

Seetha Updated On: Mar 07, 2017 12:22 PM IST

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हमसे आधार मांगने से पहले सरकार को बहुत कुछ देना होगा

आधार एक बार फिर सुर्खियों में है. और अफसोस की बात है कि इस बार भी आधार गलत वजह से ही चर्चा में है.

सरकार ने कहा है कि सर्वशिक्षा अभियान के तहत मिड डे मील योजना का फायदा लेने के लिए बच्चों के पास आधार होना चाहिए. इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक सरकार की डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर की तीस योजनाओं को आधार से जोड़ दिया गया है. जल्द ही बीस और योजनाओं का फायदा भी आधार के जरिए ही मिलेगा.

सरकार का अपनी योजनाओं का फायदा उठाने को आधार से जोड़ने पर विवाद उठने की सबसे बड़ी वजह है, इससे जुड़े आंकड़ों के बेजा इस्तेमाल का डर.

कई बार खबरें आ चुकी हैं कि आम लोगों की निजी जानकारियां जुटाकर इनका गलत इस्तेमाल किया जा रहा है. हाल ही में खबर आई थी कि एक निजी बैंक, एक कारोबारी चिट्ठी पत्री का कारोबार करने वाली फर्म और एक ई-साइन देने वाली कंपनी के लोग, कुछ लोगों की निजी जानकारियों का अपने हित में इस्तेमाल करते पाए गए थे.

आधार अथॉरिटी यानी UIDAI ने इस पर एक पुलिस रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. इस घटना ने आधार पर सवाल उठाने वालों को एक मौका और दे दिया. ये लोग काफी वक्त से आधार कार्ड से जुड़े आंकड़ों के बेजा इस्तेमाल की आशंका जता रहे हैं. वहीं आधार के समर्थक इन आशंकाओं को खारिज करते रहे हैं.

अब मिड डे मील को आधार से जोड़ने पर हंगामा हो रहा है. शायद दबाव में सरकार ये फैसला वापस भी ले ले. मगर ये गलत दिशा में उठा कदम होगा.

mid day meal

सर्वशिक्षा अभियान के तहत मिड डे मील योजना का फायदा लेने के लिए बच्चों के पास आधार होना चाहिए

मेरा हमेशा से मानना रहा है कि सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का फायदा सही लोगों तक पहुंचाने का आधार इस वक्त सबसे बेहतरीन जरिया है. इसकी अपनी कमियां हैं. फिर भी इससे सरकारी पैसे का दुरुपयोग थमा है. इसके जरिए सरकारी मदद सही आदमी तक पहुंचने का काम आसान हुआ है. बेहतर हुआ है.

ऐसे में सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के फायदे को आधार से जोड़ने का फैसला बिल्कुल सही है. फिर चाहे वो छात्रों को मिलने वाले वजीफे हों, सस्ता खाना हो या फिर मिड डे मील.

बिना आधार वाले बच्चों को दिन का एक खाना न देने का फैसला बेहद कठोर मालूम हो सकता है. ये कदम संवेदनहीन लग सकता है. लेकिन इसका विरोध करने वालों को एक ठोस और बेहतर विकल्प सुझाना चाहिए. ताकि सरकारी योजनाओं का फायदा उस नागरिक तक पहुंचे, जिसका वो वाजिब हकदार है.

सही लोगों तक फायदा पहुंचाना ही असल चुनौती है. खास तौर से मिड डे मील योजना में. ओडिशा में सरकार ने जब मिड डे मील योजना का फायदा ले रहे बच्चों की पहचान शुरू की, तो, प्राइमरी और सेकेंडरी स्कूलों में आने वाले बच्चों की तादाद में 11 हजार तक की गिरावट दर्ज की गई. सरकार ऐसे छात्रों को खाना खिलाने के लिए हर साल 78 लाख रुपए खर्च कर रही थी. जबकि ये छात्र सिर्फ कागज में ही मौजूद थे, असल जिंदगी में नहीं.

ये परेशानी सिर्फ ओडिशा तक सीमित नहीं. हाल ही में मुझे यही बात उत्तर के एक राज्य के वित्त मंत्री ने बताई थी. उन्होंने बताया था कि आंगनबाड़ी के तहत दी जा रही रकम का ऐसा ही दुरुपयोग हो रहा है, जोकि बच्चों के विकास के लिए ही शुरू की गई थी.

और कमोबेश हर सरकारी कल्याणकारी योजना के साथ ऐसा हो रहा है. जिसके चलते सरकारी खजाने यानी हमारे आपके पैसे को भारी चपत लगाई जा रही है. घोटाले करने वाले इस पैसे को लोगों की मदद के नाम पर ऐंठ ले रहे हैं.

इसका मतलब ये नहीं कि आधार में कोई खामी नहीं. या आधार को सरकारी योजनाओं से जोड़ने में दिक्कत नहीं.

अगर सरकारी योजनाओं का फायदा लेने के लिए आधार को अनिवार्य बनाया जा रहा है, तो सरकार को भी ऐसा इंतजाम करना होगा कि आधार का सही इस्तेमाल हो. ताकि लोगों की निजी जानकारी का दुरुपयोग न हो.

आम नागरिकों की निजता बेहद अहम है. इससे समझौता नहीं किया जा सकता. हाल के दिनों में आधार की जानकारी के बेजा इस्तेमाल के बाद UIDAI ने अपने सिस्टम की सुरक्षा को लेकर तमाम तर्क दिए हैं.

Amir Rashidi, an Internet security researcher who has worked with Telegram users who were victims of hacking, works at the offices of International Campaign for Human Rights in Iran, in the Brooklyn borough of New York, U.S., July 27, 2016. Picture taken July 27, 2016. REUTERS/Brendan McDermid - RTSKP0Z

अथॉरिटी ने गुड़गांव स्थित एक थिंक टैंक, स्कॉच डेवेलपमेंट फाउंडेशन के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई है. इस फाउंडेशन ने आधार की सुरक्षा पर सवाल उठाए थे. अब यूनीक आइडेंटिटी अथॉरिटी के पास इस बात का पूरा अधिकार है कि वो खुद को बदनाम करने वालों के खिलाफ कदम उठाए लेकिन आंकड़ों की सुरक्षा पर उठ रहे सवालों को इस तरह से खारिज नहीं किया जा सकता. लेकिन अथॉरिटी हमेशा ही ऐसा करती है.

प्राइवेसी की सुरक्षा करने वाले सिस्टम को बनाने का मुद्दा इससे जुड़ा है. सरकार ने आधार (टारगेटेड डेलिवरी ऑफ फाइनेंशियल ऐंड अदर सब्सिडीज बेनेफिट ऐंड सर्विसेज) बिल तो फौरन पास कर दिया. लेकिन प्राइवेसी का कानून बनाने पर सरकार का रवैया ढुलमुल है.

अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने आधार के खिलाफ तमाम याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान तो यहां तक कह दिया कि निजता यानी प्राइवेसी कोई मूल अधिकार नहीं.

अगर सरकार आधार को बाकी योजनाओं से जोड़ना चाहती है, तो, उसे प्राइवेसी के कानून को भी जल्द से जल्द बनाना चाहिए.

इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में बायोमेट्रिक पहचान को आम लोगों से जोड़ने का मुद्दा भी अहम है. तमाम रिपोर्ट आधार को अनिवार्य बनाने में आने वाली दिक्कतों को बता चुकी हैं.

सरकार ये तो फौरन बताती है कि आधार को सरकारी योजनाओं से जोड़कर उसने कितना पैसा बचाया. कितने करोड़ के घोटाले रोके. सरकार का दावा है कि उसने योजनाओं को आधार से जोड़कर 49 हजार करोड़ रुपए बचाए हैं. लेकिन क्या इस बात की पड़ताल की गई है कि ये बचत सिर्फ आधार की वजह से हुई है. या फिर ऐसे कई लोगों का हक मारकर पैसे बचाए गए हैं, जो वाकई जरूरतमंद थे.

Aadhaar

बहुत से जानकार कहते हैं कि फिंगरप्रिंट और आंखों के आधार पर पहचान में एक दिक्कत है. वो ये कि मजदूरी करने वालों के फिंगर प्रिंट और बुजुर्गों की आंखों की रौशनी की दिक्कत सही आंकड़े जुटाने की राह में रोड़ा है. इस चुनौती को समझने और दूर करने की जरूरत है. इसे खारिज नहीं किया जाना चाहिए. खास तौर से ये कहकर कि बहुत छोटे से तबके के साथ ये दिक्कत आ रही है.

एक बात हमें साफ तौर पर समझनी होगी कि हमारा मकसद सिर्फ सरकार के पैसे बचाना नहीं होना चाहिए. पैसे बचाने के साथ हमें जरूरतमंदों तक योजनाओं का फायदा पहुंचाने पर भी जोर देना होगा.

हमें देश के हर नागरिक को आधार से जोड़ने की प्रक्रिया भी जल्द पूरी करनी होगी. सरकार को इस मोर्चे पर तेजी दिखानी चाहिए. आधार को अनिवार्य बनाकर ये मान लेना कि हर नागरिक इससे जुड़ जाएगा, भूल होगी. हमें ये तय करना होगा कि लोग बिना ज्यादा परेशानी उठाए, आधार से जुड़ें. सिर्फ ये कहना गलत होगा कि जिनके पास आधार नहीं वो लोग सिर्फ कागजों में मौजूद हैं.

सरकार को ये भी देखना होगा कि गैरजरूरी जगहों पर आधार को अनिवार्य न बनाया जाए. जैसे कि एक अप्रैल से रेलवे टिकट लेने पर आधार बताना जरूरी होगा. साथ ही नया मोबाइल कनेक्शन लेने, बैंक खाते खोलने, इन्कम टैक्स भरने, एफआईआर दर्ज कराने और रेंट एग्रीमेंट के गवाह के तौर पर दस्तखत करने पर आधार नंबर देना होगा. सरकार कई डिजिटल लेन-देन के लिए भी आधार को जरूरी बना रही है.

आधार कानून, योजनाओं का फायदा सही लोगों तक पहुंचाने के लिए बना है. ये समाज की निचली पायदान के लोगों को पहचान देने और एक जगह से दूसरी जगह जाकर बसने वालों के लिए मददगार के तौर पर लाया गया था. ताकि वो बैंक खाते खोल सकें. सरकारी योजनाओं का फायदा ले सकें. अब इसका दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है. इसकी जरूरत समझ में नहीं आती. खास तौर से निजी क्षेत्र में और उन लोगों को भी आधार के इस्तेमाल के लिए मजबूर किया जा रहा है, जो सरकारी योजनाओं का फायदा नहीं लेते. वो अपने कई और पहचान पत्र दे सकते हैं.

इसी वजह से प्राइवेसी के कानून की कमी और भी महसूस होती है. अब आधार को पहचान का मूल दस्तावेज बनाया जा रहा है. ऐसे में किसी भी नागरिक की हर जानकारी और हर लेन-देन का इसके जरिए पता लगाया जा सकता है.

आधार प्रोजेक्ट के अपने फायदे हैं. मगर हमें इससे जुड़ी दिक्कतों और चिंताओं को भी दूर करने के बारे में सोचना चाहिए.

 

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