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आधार अनिवार्य: नागरिकों को अपने शरीर पर भी पूरा अधिकार नहीं

नकली पैन कार्ड का इस्तेमाल झूठी कंपनियों की तरफ ‘पैसों की दिशा मोड़ने’ के लिए किया जा रहा है

FP Staff | Published On: May 03, 2017 11:29 PM IST | Updated On: May 03, 2017 11:29 PM IST

आधार अनिवार्य: नागरिकों को अपने शरीर पर भी पूरा अधिकार नहीं

मंगलवार को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि आधार कार्ड को पैन कार्ड के लिए अनिवार्य कर दिया गया है ताकि फर्जी पैन कार्ड के विस्तार को रोका जा सके.

रकार की तरफ से दलील देते हुए आगे कहा गया कि इस तरह के फर्जी पैन कार्ड का इस्तेमाल आतंकवादियों तक पैसा पहुंचाने और ब्लैकमनी को आगे बढ़ाने में किया जाता है. निजता के नाम पर जताई जा रही चिंता को सरकार ने ‘फर्जी’ करार दिया.

ये भी कहा गया कि आधार कार्ड लाने का मकसद एक सुरक्षित और मजबूत प्रणाली को हासिल करना था ताकि किसी व्यक्ति की पहचान झूठी नहीं बन पाए.

अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतोगी ने जस्टिस ए.के सीकरी और अशोक भूषण की खंडपीठ को बताया, ‘आज आपके पास ब्लैकमनी है, जिसका इस्तेमाल ड्रग और आतंक के विस्तार में किया जा रहा है. इसलिए, निर्णय लिया गया है कि एक ऐसी ज्यादा मजबूत व्यवस्था की जाए, जिससे किसी भी व्यक्ति की पहचान की नकल नहीं की जा सके.

29 करोड़ संदिग्ध पैन कार्ड में से 10 लाख पैन कार्ड कैंसिल कर दिए

आधार को पैन कार्ड के लिए अनिवार्य बनाने की चुनौती का विरोध करने वाले आला कानून अधिकारी ने कहा कि भारत में 29 करोड़ संदिग्ध पैन (परमानेंट एकाउंट नंबर) कार्ड में से 10 लाख पैन कार्ड को कैंसिल कर दिया गया है, क्योंकि ऐसा पाया गया कि पैन कार्ड की संख्या बहुत ज्यादा है और एक व्यक्ति के पास एक से अधिक पैन कार्ड हैं, जिनका इस्तेमाल ऐसी गतिविधियों के लिए किया जा रहा था, जिससे राजस्व का घाटा होता है.

गलत पैन कार्ड इस्तेमाल करने से राजस्व घटता है

गलत पैन कार्ड इस्तेमाल करने से राजस्व घटता है

उन्होंने कहा कि देश में अबतक 113.7 करोड़ आधार कार्ड जारी किए गए हैं और सरकार ने पाया है कि किसी भी हालत में इनकी नकल नहीं की जा सकी है, क्योंकि इनमें उंगलियों और आइरिस स्कैन का बायोमेट्रिक सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है. अब तक की जानकारी के हिसाब से यह इकलौती ऐसी तकनीक है, जो दुनिया भर में पूरी तरह सुरक्षित मानी जाती है.

याचिकाकर्ता की आपत्तियों का जवाब देते हुए रोहतगी ने कहा कि तथाकथित गोपनीयता और शरीर के बारे में बेवजह हस्तक्षेप को लेकर उनकी बहस फर्जी है.

हाल ही में बजट और फाइनेंस एक्ट 2017 के जरिए सामने रखे गए इनकम टैक्स के सेक्शन 139AA की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली तीन याचिका की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट कर रहा था.

इस साल 1 जुलाई से लागू होने वाले पैन नंबर के आवंटन के लिए आवेदन और इनकम टैक्स रिटर्न के फॉर्म को भरने के लिए आधार आवेदन फॉर्म की इनरॉलमेंट आईडी या आधार की चर्चा करते हुए सेक्शन 139AA ने इन्हें अनिवार्य बताया था.

अटॉर्नी जनरल ने दावा किया कि आधार के कारण गरीबों के लाभ वाली योजनाओं के साथ-साथ पेंशन योजनाओं पर केंद्र ने लगभग 50,000 करोड़ रुपये की बचत की है. क्योंकि इससे यह सुनिश्चित करने में सुविधा हुई है कि सरकार द्वारा चलाई जा रही जनकल्याण योजनाएं उन लोगों तक ही पहुंचे, जो इन योजनाओं का लाभ पाने के हकदार हैं.

रोहतगी ने कहा कि आधार जैविक सूचना कोड के रूप में है और इन्हें सरकारी डेटाबेस में सहेजा गया है और किसी व्यक्ति तक ये सूचनाएं नहीं पहुंच सकती हैं. ऐसा सिर्फ उसी हालत में हो सकता है, जब किसी व्यक्ति पर चल रहे आपराधिक मामले में अदालत इसकी मांग करती है.

उन्होंने कहा,’आधार आतंक तक पैसे पहुंचाने और ब्लैकमनी के विस्तार को रोकने का एक असरदार हथियार है. यह सुनिश्चित करता है कि जरूरी पैसे जरूरतमंद तक ही पहुंचे. ऐसा विचार है कि ईमानदार लोगों पर टैक्स का बोझ उनके लिए असहनीय नहीं होना चाहिए.’

यह बताते हुए कि आधार किस तरह अपने वजूद में आया, रोहतगी ने कहा कि 2009-10 में सरकार ने महसूस किया कि गरीबों तक पहुंचने वाली रकम का एक बड़ा हिस्सा उनतक नहीं पहुंच रहा था.

‘आधार के कारण गरीबों के लाभ वाली योजनाओं के साथ-साथ पेंशन योजनाओं पर केंद्र ने करीब 50,000 करोड़ रुपए की बचत की है. उन्होंने आगे कहा, ‘टैक्स चुकाने वालों की पहचान को तय करने और आतंक पर पैसे लगाने और ब्लैकमनी को रोकने के लिए नियम बनाए गए हैं’.

139A साल 1975 में आई थी

इनकम टैक्स की धारा 139AA के सिलसिले में अटॉर्नी जनरल ने कहा कि किसी भी प्रावधान को चुनौती सिर्फ दो आधारों पर दी जा सकती है: या तो विधायी क्षमता या फिर संविधान के विपरीत होने की स्थिति में. उन्होंने कहा, ‘आयकर अधिनियम अपनी प्रकृति में अनिवार्य है, इसलिए इसे अनुच्छेद 19 का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘संसद आम लोगों का सर्वश्रेष्ठ न्यायाधीश है. संसद ही यह फैसला करती है कि टैक्स लगाने की क्या प्रक्रिया होनी चाहिए और किस अपराध के लिए क्या सजा होनी चाहिए.’

उन्होंने बताया,’टैक्स लगाना जरूरी होता है. आईटी के नियम कई मायनों में लोगों पर भारी पड़ते हैं क्योंकि लोगों को टैक्स का भुगतान करना पड़ता है. लेकिन टैक्स के रूप में इकट्ठा किए गए इन पैसों का इस्तेमाल जरूरतमंदों के लाभ और समाज की बेहतरी के लिए किया जाता है’.

Aadhar Card

उन्होंने कहा कि धारा 139AA साल 1975 में आई थी, जिसे अभी तक चुनौती नहीं दी गई है. यह टैक्स का भुगतान करने वाले लोगों को एक नई पहचान देने के उद्देश्य से अस्तित्व में आया था.

रोहतगी ने कहा कि टैक्स के सुचारू कलेक्शन और करदाताओं की पहचान को सुनिश्चित करने के लिए इसे लाया गया था.

उनका यहां तक कहना था कि संपत्ति की रजिस्ट्री के लिए किसी को अपनी उंगलियों के निशान देने की जरूरत होती थी और जब कोई ड्राइविंग लाइसेंस या पासपोर्ट बनाने के लिए जाता था, तो उसे भी उसी स्थिति का सामना करना पड़ता था.

‘आज सिर्फ इतना ही अंतर आया है कि तस्वीर और फिंगरप्रिंट पेपर पर नहीं बल्कि एक इलेक्ट्रोनिक माध्यम में संजोए गए हैं, ‘उन्होंने सवाल किया ‘याचिकाकर्ता द्वारा बताया गया शारीरिक अतिक्रमण वाला तर्क क्या है, इसे मैं जानना चाहता हूं.’

याचिकाकर्ता के तर्कों के खिलाफ अपना पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल ने कहा, ‘कोई भी व्यक्ति शून्य में नहीं रह सकता, क्योंकि वहां भी सामाजिक अनुबंध है. जब राज्य कुछ सुविधाएं दे रहा है, तो वह आपकी पहचान रखने का हकदार तो है ही.‘

उन्होंने आगे पूछा, ’क्या याचिकाकर्ता आज कह सकते हैं कि उनके पास कोई मोबाइल फोन, क्रेडिट कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट या अन्य पहचान पत्र नहीं है और वे क्या हिमालय में रहते हैं ? ‘

‘तथाकथित गोपनीयता और शारीरिक अतिक्रमण पर बहस तो फर्जी है. किसी के शरीर पर उसका पूर्ण अधिकार नहीं हो सकता.‘

उन्होंने कहा कि कानून बहुत साफ है और अगर सरकार हर किसी को किसी योजना का लाभ नहीं दे सकती है, इसका मतलब यह तो नहीं है कि वह एक लाभकारी योजना शुरू ही नहीं कर सकती.

113.7 करोड़ लोगों के पास नहीं है एक से अधिक आधार कार्ड

इसे लेकर दो जजों की ये बेंच बहस को आगे जारी रखेगी. कोर्ट ने कहा, ‘यहां जिस मामले पर बहस चल रही है,  वह किसी सामाजिक कल्याण योजना के बारे में नहीं है. यह तो आयकर को लेकर है.’

बहस के दौरान अटॉर्नी जनरल ने कहा, ‘ हमें एक नक़ली पैन कार्ड तो मिले हैं, लेकिन कोई नकली आधार कार्ड नहीं मिला है. जारी हुए 113.7 करोड़ आधार कार्डों से हमें एक व्यक्ति के पास से एक से अधिक आधार कार्ड नहीं मिले हैं.‘

उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ ‘फॉरेन एकाउंट टैक्स कम्प्लाएंस एक्ट’ नाम के एक समझौते पर दस्तखत किए हैं. अगर हमारे पास एक मजबूत सिस्टम नहीं होगा, तो जानकारी के लिए हमें मजबूरन समझौता करना पड़ेगा.

उन्होंने कहा, ’हमारी कुछ अंतर्राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी तो है.’ याचिकाकर्ता के तर्कों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि वो अपने शरीर का टुकड़ा नहीं चाहते, ‘आप कह सकते हैं कि आप खुद को भूल जाना चाहते हैं लेकिन राज्य आपको नहीं भूलना चाहता.’

‘संसद पर कोई प्रतिबंध नहीं लादा जा सकता है और इसके पास कानून की सबसे बड़ी ताकत है.’ ‘ठीक है कि हम आधार को लेकर इस हद तक आगे बढ़ रहे हैं कि आधार स्वैच्छिक है, लेकिन कानून की भाषा कुछ अलग कहती है. अगर आपके पास आधार है तो ठीक है. अगर नहीं है तो इसके लिए आवेदन दीजिए क्योंकि ये अब जरूरी है.’

रोहतगी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से पारित अंतरिम आदेश को संसदीय कानून पर हमला करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है. साथ ही धारा 139 AA लागू करने के लिए संसद पर कोई प्रतिबंध नहीं है. उन्होंने कहा कि सेक्शन 139AA सिर्फ इतना कहता है कि अगर आप टैक्स का भुगतान करते हैं, तो सरकार को आधार विवरण चाहिए.

‘लोग पहचान चाहते हैं और ऐसे में यह नहीं कह सकते कि आधार एक राक्षस है. आपके पास किसी तरह की कम दिखायी देने वाले प्रकार की चुनौती नहीं है कि आप यह कह दें कि मुझे यह नहीं चाहिए. आखिरकार हम एक बेहतर समाज चाहते हैं. अगर कोई टैक्स का भुगतान नहीं करना चाहता है, तो उसे नियमों का पालन तो करना होगा.’

नकली पैन कार्ड का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है

याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान और अरविंद दातार ने पहले तर्क दिया था कि धारा 139AA असंवैधानिक है और यह आधार अधिनियम को ‘सीधे टक्कर’ देता है.

दीवान ने दलील दी थी कि किसी व्यक्ति को आधार के लिए अपनी सहमति देने के लिए मजबूर किए जाने का कोई सवाल ही नहीं है और यह एक ऐसा मुद्दा है, जो ‘अपने नागरिकों के साथ भारत गणराज्य के संबंध को बदल देता है.’

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याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया है कि कानून का पालन करने वाले करदाता को इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करते समय अपना आधार देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है.

साथ ही ये भी कहा गया कि यह तो एक ‘इलेक्ट्रोनिक पट्टा’ जैसा है, क्योंकि इससे तो सरकार अपने नागरिकों पर एक तरह का नियंत्रण रखेगी. सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले यह तर्क दिया था कि पैन कार्ड बनाने को लेकर आधार को अनिवार्य बनाये जाने में सरकार के निर्णय पर कानून निर्माताओं की तरफ से कोई आपत्ति क्यों नहीं की गई?

अटॉर्नी जनरल ने यह भी साफ कर दिया था कि आईटी अधिनियम की धारा 139AA में इस बात का जिक्र कहीं नहीं किया गया है कि यह पहले से ही लागू प्रभाव के साथ प्रभावी होगा.

सरकार ने पहले ही सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि नकली पैन कार्ड का इस्तेमाल झूठी कंपनियों की तरफ ‘पैसों की दिशा मोड़ने’ के लिए किया जा रहा है.

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