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मोदी सरकार के 3 साल: वादे पे तेरे मारा गया...

मोदी को विरासत में बेहाल अर्थव्यवस्था मिली थी और आज अर्थव्यवस्था कहीं बेहतर स्थिति में है, लेकिन...

Rajesh Raparia Rajesh Raparia | Published On: May 19, 2017 07:39 AM IST | Updated On: May 19, 2017 07:39 AM IST

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मोदी सरकार के 3 साल: वादे पे तेरे मारा गया...

तीन साल पहले मई 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को बंपर जीत हासिल हुई. 30 साल बाद केंद्र में किसी दल को भारी बहुमत मिला था.

हर साल की तरह इस साल भी मोदी सरकार जीत का जश्न जोर-शोर से मनाएगी. केंद्र सरकार के मंत्री ही नहीं, बीजेपी शासित राज्यों के मंत्री और मुख्यमंत्री इस जश्न को ऐतिहासिक बनाने में दिन-रात एक किए हुए हैं.

मोदी सरकार के खाते में गिनाने को अनेक उपलब्धियां हैं. इसमें कोई दोराय नहीं है कि मोदी को विरासत में बेहाल अर्थव्यवस्था मिली थी, लेकिन आज अर्थव्यवस्था कहीं बेहतर स्थिति में है.

प्रमुख बड़े आर्थिक संकेतक

उपभोक्ता मुद्रास्फीति सूचकांक, सेंसेक्स, कार बिक्री, डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत, विदेशी मुद्रा कोष, भुगतान संतुलन, सरकारी घाटा, आवास कर्ज ब्याज और काफी हद तक आर्थिक विकास दर भी तब से अब काफी मजबूत स्थिति में है.

इसमें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों की भूमिका अहम है. 2014 में कच्चे तेल की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल थी जो अब 48.50 डॉलर प्रति बैरल है.

Modi

मोदी सरकार के कई कार्यक्रमों और योजनाओं ने बेहतर प्रदर्शन किया है जिनमें प्रधानमंत्री उज्जवला योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण प्रमुख हैं.

शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार का कोई मामला सामने नहीं आया है. जिसे प्रधानमंत्री मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है, क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपीए काल का भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा बन कर उभरा था.

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2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी ने काला धन, महंगाई, सामाजिक कल्याण खर्चों में बढ़ोतरी, रोजगार, किसानों को लाभप्रद मूल्य, टैक्स टेररिज्म, शिक्षा पर अधिक व्यय आदि बहुतेरे वादे किये थे, जिनका बीजेपी के घोषणापत्र में विस्तृत ब्योरा है.

बैंको के बढ़ते एनपीए (नॉन परफार्मिंग एसेट्स) को अंकुश रखने का भी वादा था. इन वादों और मुद्दों पर मोदी सरकार के प्रदर्शन और उपलब्धियों को तौले- नापे, तो तमाम मजबूत आर्थिक संकेतक, विकास दर, कम महंगाई, विशाल विेदशी मुद्रा कोष, कुलांचे भरता शेयर बाजार, बढ़ता कर संग्रह आदि उपलब्धियां बेमानी सी लगती हैं.

कालाधन 

BannedNotes

विदेश से काला धन वापस लाने का समयबद्ध वादा किया गया था. आडवाणी के समय से यह भाजपा का बड़ा चुनावी मुद्दा रहा है. हर खाते में 15 लाख रुपए आएंगे, इसका शोर भूलना मुश्किल है. विदेशों से काला धन लाने में मोदी सरकार को अब तक कोई सफलता नहीं मिली है.

इसके लिए मोदी सरकार 2015 में ब्लैक मनी (अन डिसक्लोज्ड फॉरेन इंकम एंड एसेट्स) एंड इम्पोजिशन ऑफ टैक्स अधिनियम लाई. इसमें सीमित समय में विदेशी आय और संपत्ति घोषित करने का मौका दिया गया था. यह कानून नक्कारखाने में तूती की आवाज ही साबित हुआ.

पिछले साल तक इस कानून के तहत 4164 करोड़ रुपए घोषित किए गए थे. इसका कोई आधिकारिक अद्यतन आंकड़ा नहीं मिलता है. एचएसबीसी बैंक को विदेशी अघोषित आय के लिए 5377 करोड़ रुपये का टैक्स डिमांड का नोटिस अवश्य थमाया गया है.

नोटबंदी

नोटबंदी से कितना काला धन सरकारी खाते में आया, इसका इंतजार सबको है. रिजर्व बैंक इस जानकारी पर गहन चुप्पी साधे हुए है. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि नोटबंदी से मोदी को राजनीतिक फायदा हुआ है.

नोटबंदी के दौरान कुल कितना धन बैंकों में जमा हुआ, यह जानकारी देने में रिजर्व बैंक मुंह चुरा रहा है. शुरुआती अनुमानों में उम्मीद जताई गई थी कि नोटबंदी से तीन से साढ़े चार करोड़ रुपए का लाभ कालेधन के रूप में रिजर्व बैंक को होगा.

demonetisation

स्वैच्छिक रूप से काला धन घोषित करने के लिए नोटबंदी के दौरान प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना शुरू की गई. इसमें काला धन घोषित करने की अंतिम तारीख 31 मार्च 2017 थी. इस तारीख बाद में बढ़ाकर 30 अप्रैल और फिर 10 मई 2017 किया गया. यह योजना बुरी तरह विफल साबित हुई.

2016-17 में आयकर संग्रह और आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है, पर गरीब कल्याण योजना में मार्च 2017 तक कर दंड के रूप में महज 2300 करोड़ पर ही सरकार को मिल पाए जबकि अनौपचारिक उम्मीद एक लाख करोड़ रुपए से अधिक की थी.

इस विफलता से मोदी सरकार कुंठाग्रस्त हो गई है. इसका सीधा असर आयकर कानून संशोधनों में देखा जा सकता है.

टैक्स टेररिज्म

भाजपा और मोदी ने टैक्स टेररिज्म (टैक्स आतंकवाद) को लेकर यूपीए सरकार पर कड़े प्रहार किए थे. वादा किया था कि टैक्स प्रणाली को सरल और विश्वसनीय बना जाएगा.

टैक्स नीतियों को भविष्यवाची बना जायेगा, जिससे अचानक किसी पर टैक्स का भारी बोझ नहीं आए. बजट 2017 में आयकर कानून में जो संशोधन किये गये हैं, उनको कानूनविद बेहद स्वैच्छाकारी मानते हैं.

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आयकर विभाग की मनमानी से टैक्स टेररिज्म ही बढे़गा. आयकर विभाग किसी पर बिना किसी आधार के छापा मार सकता है. अब आयकर विभाग को छापे के कारण बताने की बाध्यता अब नहीं रह गयी है, न ही उन्हें इसके लिए अदालत में चुनौती दी जा सकती है.

किसानों को लाभप्रद मूल्य

[तस्वीर: रॉयटर्स]

बीजेपी ने किसानों को उपज की लागत का 50 फीसदी लाभप्रद मूल्य देने का वादा किया था. सत्ता में आए मोदी को तीन साल हो गए, लेकिन अब मोदी समेत उनके मंत्री इसका जिक्र करने से भागते हैं.

पिछले तीन सालों में फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य यूपीए काल की तुलना में काफी कम बढ़े हैं, जबकि लागत लगातार बढ़ी है. किसानों की माली हालत सुधारने के लिए तमाम उपायों की घोषणा की गई है, लेकिन जमीन पर उनका असर नहीं दिखाई देता है.

बंपर फसल होने पर किसानों को कौड़ियों के मोल उन्हें बेचना पड़ता है और लागत का भी मूल्य नहीं निकल पाता है. हां, बंपर फसल होने पर सरकार और व्यापारियों की मौज अवश्य हो जाती है. सरकार महंगाई कम करने का श्रेय लूटने में कोई चूक नहीं करती है. सही मायनों में किसानों की हालत में कोई सुधार अब तक मोदी काल में नहीं आया है.

एनपीए

RBI

बैंकों के बढ़ते एनपीए यानी नॉन परफर्मिंग एसेट्स पर काबू पाने में मोदी सरकार कोई सफलता नहीं मिली है. बल्कि एनपीए में फंसी रकम 2014 से दोगुनी से अधिक हो गई है.

लोकसभा चुनाव 2014 के अपने चुनाव घोषणा पत्र में बैंकों के बढ़ते हुए एनपीए पर भारी चिंता व्यक्त की थी और आश्वस्त किया था कि इस को दुरुस्त करने के लिए मुकम्मल उपाय करेगी.

गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की जालसाजी से निवेशकों को बचाने के लिए मजबूत नियामक फ्रेमवर्क स्थापित करेगी. मार्च 2014 में कुल एनपीए 2,40,971 करोड़ रुपए था, सितंबर 2015 में यह आंकड़ा 3,41,641 करोड़ रुपए हो गया.

2017 में यह आंकड़ा साढ़े सात लाख करोड़ रुपए को पार कर गया है. एक अनुमान है कि मार्च 2018 तक एनपीए बढ़कर तकरीबन 9 लाख करोड़ रुपए हो सकता है.

अब एक अध्यादेश के माध्यम से एनपीए पर काबू पाने और वसूली के लिए रिजर्व बैंक को विशेष अधिकार दिये गए हैं, पर जमीन पर इसका असर आने में लंबा वक्त लगेगा.

गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं के जालसाजी को रोकने के लिए कोई कारगर मजबूत नियामक तंत्र सरकार खड़ी नहीं कर पाई है. बल्कि आनलाइन पोंजी स्कीमों की अरबों रुपए की जालसाजी सामने आई है.

न्याय प्रणाली

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देश की अदालतों में लाखों की संख्या में केस लंबित है. बीजेपी ने न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए अपने घोषणा पत्र में वादे किए थे, लेकिन न सरकार को याद है, न मीडिया को. पीड़ित इनसे वाकिफ होंगे, इसकी उम्मीद करना बेकार है.

बीजेपी ने वादा किया था कि न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए निचले स्तर पर अदालतों और न्यायाधीशों की संख्या दोगुनी की जाएगी. इस दिशा में मोदी सरकार की उपलब्धि शून्य है. जज और निचली अदालतों की संख्या बढ़ाना तो दूर उच्च न्यायालयों में जजों के अनेक पद खाली पड़े हैं.

पिछले तीन सालों में 100 से अधिक कार्यक्रमों की घोषणा मोदी सरकार ने की है. स्मार्ट सिटी, बुलेट टेन, स्टार्ट अप इंडिया, मुद्रा योजना, स्टैंड अप आदि योजनाओं का नाम लेना ही मोदी भूल गए हैं.

मोदी के शासन के तीन सालों में मुद्रा स्फीति की दर में ऐतिहासिक गिरावट आयी है, पर लोगों का कहना है कि महंगाई दर भले ही कम हो, पर जीवन लागत में बढ़ोतरी आई है.

महंगा पेट्रोल-डीजल, महंगी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं मोदी सरकार को मुंह चिढ़ा रही हैं. शिक्षा पर जीडीपी का 6 फीसदी व्यय करने का वादा मोदी ने किया था, पर पिछले तीन सालों में शिक्षा व्यय यह अनुपात जस का तस है, जो अब भी जीडीपी के 2.5 फीसदी के आसपास है.

दो करोड़ रोजगार देने का हसीन वादा मोदी ने युवाओं से किया था, लेकिन सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि यूपीए काल से विगत तीन सालों में कम रोजगार सृजित हुए हैं. फिलहाल हर रोज हजारों हजार लोगों की नौकरियां जाने की खबर मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन सकता है.

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