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निर्भया के दोषियों की सजा 'जनभावना का सम्मान' लेकिन बिलकिस बानो का क्या?

बांबे हाई कोर्ट ने बिलकिस बानो केस के दोषियों को ज्योति पांडे केस के दोषियों जैसी सजा देने से इनकार कर दिया है

Sandipan Sharma Updated On: May 06, 2017 03:50 PM IST

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निर्भया के दोषियों की सजा 'जनभावना का सम्मान' लेकिन बिलकिस बानो का क्या?

अनुराग कश्यप की साइकलॉजिकल थ्रिलर रमन राघव  में एक पुलिस वाला अपनी गर्लफ्रेंड से एक सीरियल किलर की चर्चा करता है और उसे सजा दिलाने की अपनी योजना बताता है.

उसकी गर्लफ्रेंड, जिसे उसने तीन बार गर्भपात कराने के लिए मजबूर किया था,   पुलिसवाले को जवाब देती है: 'तुमने भी तो मेरे तीन बच्चे मारे हैं.'

ज्योति पांडे केस में सुप्रीम कोर्ट और बिलकिस बानो मामले में बांबे हाईकोर्ट के फैसले के बाद फिल्म का यह अंश याद आता है. दिल्ली की सड़कों पर 2012 में चार लोगों ने सामूहिक बलात्कार के बाद ज्योति की हत्या कर दी थी. गुजरात में गोधरा कांड के बाद बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार और उसके बेटे की हत्या कर दी थी.

बांबे हाई कोर्ट ने बिलकिस बानो केस के दोषियों को ज्योति पांडे केस के आरोपियों जैसी सजा देने से इनकार कर दिया है.

दोनों हादसों में अपराध एक जैसे थे

पहली नजर में दोनों मामले एक जैसे दिखते हैं. ज्योति को बहला-फुसलाकर चलती बस में बैठाया गया, उसे बांध कर हमले किए गए और फिर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया.

लेकिन आततायी इतने से संतुष्ट नहीं हुए. ज्योति के प्राइवेट हिस्से में सरिया घुसा दिया और उसकी आंतें क्षत-विछत कर दीं. इसके बाद उसे सर्द रात में चलती बस से सड़क पर मरने के लिए फेंक दिया.

इसी तरह, 3 मार्च, 2002 को गोधरा दंगों के बाद भीड़ ने 19 साल की गर्भवती बिलकिस बानो पर हमला किया. उससे बलात्कार किया, निर्दयता से पीटा और मरने के लिए छोड़ दिया. भीड़ ने उसके पांच साल के बच्चे को भी मार दिया.

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने ज्योति पांडे केस में दोषियों को फांसी की सजा देने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निर्भया के साथ सामूहिक बलात्कार और फिर उसकी हत्या फांसी की सजा देने के लिए उपयुक्त मामला है. कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मनुष्य की कामुकता, शैतानी करतूत में बदल गई थी.

अपने फैसले में कोर्ट ने कहा, 'इससे जनमानस को गहरा आघात लगा है और मानवता नष्ट हुई है. लिहाजा चारों को मौत की सजा देते हैं. हम अपराध को कमतर करने वाले हालात के मुकाबले जघन्य कृत्य को ज्यादा तवज्जो देने के लिए बाध्य हैं.'

ज्योति के साथ पहले सामूहिक बलात्कर और फिर उसकी हत्या सचमुच शैतानी काम था. इस मामले में एक नाबालिग आरोपी को सुधारगृह में 3 साल बिताने के बाद छोड़ दिया गया था. एक दूसरे आरोपी ने मामले की सुनवाई के दौरान खुदकुशी कर ली थी. बाकी चार आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई गई.

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कई देशों में ऐसे अपराध के लिए फांसी से बद्तर सजा

फांसी की सजा पाने वाले आरोपियों को खुद को भाग्यशाली समझना चाहिए. कई देशों में इस तरह का अपराध दोषियों के प्राइवेट पार्ट काटने और उन्हें पीड़ित की तरह दर्द का अहसास कराने का पर्याप्त कारण माना जाता. उनके लिए फांसी बहुत ही हल्की सजा है. यह उनके लिए अपने नारकीय जीवन से मुक्ति पाने का बेहद आसान रास्ता जैसा है.

बिलकिस बानो के दोषियों को तुलनात्मक रूप से हल्की सजा मिली है. और बांबे हाईकोर्ट ने तीन मुख्य आरोपियों को फांसी की सजा देने की सीबीआई अपील को नहीं माना और निचली अदालत से दी गई उम्र कैद की सजा पर मुहर लगाई.

एक ही तरह के अपराधों में कानून अलग-अलग तरीके से कैसे लागू हो सकता है, इसका जवाब तो कानूनी विशेषज्ञ और अदालतें ही दे सकती हैं.

अभियोजन पक्ष हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे तो हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट बिलकिस बानो केस को अलग नजरिए से देखे और एक समान अपराध के लिए एक समान सजा के मूलभूत सिद्धांत को लागू करे.

फिलहाल ऐसा लग रहा है कि बिलकिस बानो को उस तरह का न्याय नहीं मिला जिस तरह ज्योति पांडे को मिला है.

ज्योति पांडे के साथ बलात्कार और उसकी हत्या का मामला भारतीय इतिहास का एक नाजुक क्षण था. राजधानी में हुए इस अपराध के खिलाफ पूरे देश में सड़कों पर दिखे गुस्से ने इसे भारतीय न्याय प्रणाली के लिए टेस्ट केस बना दिया.

अगर दोषी हल्के में छूट गए होते तो यह फैसला सख्त संदेश देने में नाकाम रहता. जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने अफजल गुरु के मामले में कहा था: यह राष्ट्र के सामूहिक चेतना को संतुष्ट करने में नाकाम रहता.

नाबालिग गुनहगार आजाद घूम रहा है 

चारों दोषियों को उम्र कैद की सजा होती तो इसका असर वैसा ही होता जैसा कि इस केस के नाबालिग गुनहगार के साथ हुआ. नाबालिग गुनहगार ने ज्योति को बस में बैठाया था और उसके प्राइवेट पार्ट में सरिया घुसा दिया था, बावजूद इसके उसे हल्की सजा देकर छोड़ दिया गया था.

ज्योति पांडे मामले के एक साल बाद मुंबई के शक्ति मिल कंपाउंड में एक फोटो जर्नलिस्ट के साथ बलात्कार हुआ. इस मामले में एक आरोपी ने खुद को नाबालिग बताया और हल्की सजा की मांग की. शायद ज्योति पांडे के मामले में नाबालिग को मिली हल्की सजा से उसका मनोबल बढ़ गया था.

अगर ज्योति के गुनहगारों को सिर्फ उम्र कैद की सजा होती तो इस तरह के अपराध करने वालों के मन में कानून का भय न पैदा होता. लिहाजा, ज्योति के गुनहगार मौत की सजा के ही हकदार थे.

बिलकिस बानो को भी मिलना चहिए न्याय

बिलकिस बानो केस का अंत भी इसी तरह की सजा के साथ होना चाहिए था. सीबीआई का सिरफिरे अपराधियों के लिए फांसी की सजा मांगना बिल्कुल सही था. आखिरकार इन अपराधियों ने एक गर्भवती महिला के साथ सामूहिक बलात्कार कर उसे मरने के लिए छोड़ दिया था और उसके पांच साल के बेटे की हत्या कर दी थी.

अगर उन्हें फांसी पर लटकाया जाता तो भीड़ का न्याय और धर्म के नाम पर इस तरह के अपराध करने वाले शैतानों के बीच सही संदेश जाता.

शायद सुप्रीम कोर्ट यह सुनिश्चित करे कि अगर बलात्कार और हत्या के अपराध में रमन को फांसी होती है तो उसी तरह के क्रूर अपराध के लिए राघव को भी फांसी ही होगी.

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