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11 मई 1998: जब भारत ने दुनिया की सबसे शातिर एजेंसी को बनाया बेवकूफ

11 मई 1998 भारतीय इतिहास का एक यादगार दिन है

Avinash Dwivedi | Published On: May 11, 2017 02:31 PM IST | Updated On: May 11, 2017 03:25 PM IST

11 मई 1998: जब भारत ने दुनिया की सबसे शातिर एजेंसी को बनाया बेवकूफ

11 मई 1998. भारत ने तीन परमाणु हथियारों का परीक्षण किया. दो दिन बाद और दो परमाणु परीक्षण किए गए. तीन दिन के अंदर पांच परीक्षण हुए जो सफल रहे. वैज्ञानिक बिरादरी और देश में इसके बाद जश्न का माहौल था. इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र घोषित कर दिया.

इस तरह से भारत ऐसा करने वाला छठा देश बन गया. जबकि भारत पहला ऐसा परमाणु शक्ति संपन्न देश था, जिसने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर नहीं किए थे. NPT एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है जो कि अमेरिका, रूस, इंग्लैण्ड, फ्रांस और चीन के बीच हुआ था. इस समझौते का लक्ष्य परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना और परमाणु हथियारों के खात्मे की ओर कदम बढ़ाना है.

इस कदम के साथ ही भारत की दुनिया भर में धाक जम गई. परीक्षण के अगले साल 11 मई से भारत सरकार ने 'रीसर्जेंट इंडिया डे' मनाने का फैसला किया.

इस पोखरण से जुड़े कई ऐसे किस्से हैं जिन्हें कभी पूरा सुनाया नहीं गया. ऐसे में लेखक राज चेंगप्पा ने इसी विषय पर एक किताब लिखी. नाम था 'वेपंस ऑफ पीस' माने शांति के हथियार. किताब में ऐसे कई किस्से हैं जो पन्ने दर पन्ने हिंदुस्तानी जाबांजी और बुद्धिमत्ता की गवाही देते हैं. ऐसे ही कुछ किस्से यहां पेश हैं -

दुनिया की सबसे होशियार एजेंसी CIA को बनाया मूर्ख

इन विस्फोटों का सबसे बड़ा आश्चर्य ये था कि भारत ने इन विस्फोटों को इतना सीक्रेट कैसे रखा? यहां तक कि CIA जैसी एजेंसी को इसकी भनक तक नहीं लगी. तब तक दुनिया मानती थी कि CIA की नजरें हमेशा पोखरण पर अपनी सैटेलाइट के जरिए लगी रहती हैं. पर परमाणु परीक्षण से जुड़ी टीम ने इस मामले में जो होशियारी दिखाई और CIA को मूर्ख बनाया, उसे भी परमाणु विस्फोट जितना ही महत्वपूर्ण माना जाता है.

राजस्थान में उस सुबह ठंडी हवा बह रही थी. बहुत शांत माहौल था. तभी कुछ आदेश दिए गए और ट्रक और बुलडोजर तेजी से स्टार्ट होकर पास के कुछ हाल ही खोदे गए कुओं की ओर बढ़ने लगे. शांत माहौल मिनटों में खत्म हो गया और मशीनों की तेज आवाजें आने लगीं.

कुएं को बालू से ढंकने में मशीनों का साथ, बेलचा लिए हुए आदमियों ने दिया. और जल्दी ही कुएं में न सिर्फ बालू भर दी गई बल्कि कुओं के ऊपर बालू के छोटे पहाड़ बना दिए गए. उनसे निकले थे मोटे-मोटे तार. कुछ ही देर में जिनमें आग लगाई गई और एक तेज विस्फोट हुआ.

जिससे मशरूम के आकार का बड़ा सा एक ग्रे रंग का बादल बन गया. 20 लोग उसे आशा के साथ निहार रहे थे. नंगी आंखों से कुछ देखा तो नहीं जा सकता था पर तभी उन वैज्ञानिकों में से एक ने जोर से अपनी मुट्ठी बांधी और तेजी से हवा में लहराते हुए कहा, 'कैच अस इफ यू कैन', माने 'अगर पकड़ सको तो हमें पकड़ो'. इसके बाद तेजी से हंसी के ठहाके लगे. वो लोग जिस मिशन पर थे वो पूरी तरह से सफल हो चुका था.

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58 इंजीनियर रेजीमेंट के जिम्मे था काम

अगले दिन अमेरिका की एजेंसी CIA ने उस विस्फोट की अपनी सैटेलाइट से ली गई तस्वीरें डाउनलोड कीं और सिर खुजाते हुए उनके वैज्ञानिकों ने सोचा आखिर इतने सीक्रेट ढंग से भारतीयों ने ये परमाणु परीक्षण कैसे कर डाला?

भारत का ये मिशन CIA की सबसे बड़ी इंटेलिजेंस असफलता माना जाता है.

भारतीय सेना की 58 इंजीनियर रेजीमेंट को खासकर इस काम के लिए चुना गया था. इस रेजीमेंट के कमांडेंट थे कर्नल गोपाल कौशिक. इनके संरक्षण में ही भारत के परमाणु हथियारों का परीक्षण किया जाना था. उन्हें इस मिशन को सीक्रेट रखने का काम भी सौंपा गया था. इस बात को इस रेजीमेंट ने इतने अच्छे से निभाया कि भारत ने मई, 1998 में जो पांच परमाणु हथियारों का परीक्षण किया, उसे CIA की सबसे बड़े इंजेलिजेंस की असफलताओं में से एक माना जाता है.

अरबों रुपये खर्च करके अमेरिका ने पोखरण पर नजर रखने वाले चार सैटेलाइट लगाए थे. भारतीय वैज्ञानिकों ने इनके रहते ही ये कारनामा करके दिखाया. ये ऐसे सैटेलाइट थे जिनके बारे में कहा जाता था कि ये जमीन पर खड़े भारतीय सैनिकों की घड़ी में हो रहा समय भी देख सकते हैं. CIA ने तो यहां तक हांक रखा था कि इन सैटेलाइट्स के पास 'ह्यूमन इंटेलिजेंस' हैं. इन सारे दावों को धता बताते हुए 'नई दिल्ली' ने दुनिया भर में अपनी धाक साबित कर दी.

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दशकों की प्रैक्टिस का परिणाम था ये मिशन

पाकिस्तान बलूचिस्तान की चगाई पहाड़ियों के पास परमाणु परीक्षण करता है. उसके मुकाबले भारत के पास पोखरण में छिपकर सीक्रेट मिशन को अंजाम देने के लिए साधन बहुत कम हैं. थोड़ी बहुत कटीली झाड़ियां जो पोखरण में उगी भी हुई हैं उनकी भी लंबाई बस कंधे तक है.

इन सबके बावजूद बिना शक होने दिए 58 इंजीनियर डेढ़ साल तक प्रैक्टिस करने में कामयाब रहे. 1982, 1995 और 1997 में वहां पर छोटे-मोटे ब्लास्ट हो चुके थे जिससे अमेरिका को अंदाजा भी हो गया था कि भारतीय परमाणु परीक्षण का प्रयास कर रहे हैं.

पर इसने भारतीयों को ये भी सिखाया था कि कौन सी गलती फिर नहीं दोहरानी है? 1998 का ऑपरेशन सफल होने के बाद चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ, जनरल वी.पी. मलिक ने कहा था, 'सालों-साल हमारे लड़कों ने वहां रेत में बेहतरीन काम किया. पर अभी तक हम इसके बारे में कभी बात नहीं कर सकते थे.'

ऑपरेशन वाइट हाउस और ताजमहल पर होना था

भारतीय सेना ने इस ऑपरेशन में कई तरह की सावधानियां बरती थीं. इसी क्रम में भारतीय हाइड्रोजन बम का नाम 'वाइट हाउस' और एटम बम के एक दस्ते का नाम 'ताजमहल' रखा गया था. इन बमों का ये अजीब नाम इसलिए रखा गया था क्योंकि अफसर मानते थे जितना अजीब नाम होगा, याद रखने में उतनी ही आसानी होगी. हालांकि डिप्लोमैटिक तौर पर ये बहुत ही विवादास्पद नाम थे.

ऐसी ही तीसरे बम के दस्ते का नाम इनसे कम विवादास्पद था. उसका नाम था कुंभकरण. इसकी खास बात ये रही कि अपने नाम के हिसाब से ये काफी वक्त तक निष्क्रिय ही पड़ा रहा.

मई, 1998 में 6 बमों के दस्ते यूज हुए थे. इनमें से आखिरी तीन का नाम 'नवताल' रखा गया था. शॉर्ट में NT1, NT2, NT3. इसमें से केवल 5 ही बम फोड़े गए. NT3 को कुएं से निकाल लिया गया. इसे निकालने का आदेश दिया था, आर. चिदंबरम ने जो एटॉमिक एनर्जी कमीशन (AEC) के चेयरमैन थे.

इसके पीछे चिदंबरम का मानना था कि जो रिजल्ट उनकी टीम को चाहिए थे वो उन्हें मिल चुके थे फिर एक और डिवाइस बर्बाद करके क्या फायदा? वाकई उन्होंने टीम से भी इन्ही शब्दों को दोहराते हुए कहा था, 'इसे बर्बाद करके क्या फायदा?'

इतने उपनाम हो गए थे कि फिजिक्स वैज्ञानिकों को नाम याद करने से ज्यादा आसान लग रही थी.

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कोड में इतने नाम कि सबसे परेशान

डीआरडीओ के तत्कालीन चीफ एपीजे अब्दुल कलाम और एईसी के चेयरमैन आर. चिदंबरम इस ऑपरेशन में शामिल दो बड़े वैज्ञानिक थे. इनके साथ दोनों ही संस्थाओं के 80 और वैज्ञानिक शामिल थे जो कि परीक्षण स्थल का जायजा लेने आते-जाते रहते थे.

सभी को आर्मी की वर्दी में परीक्षण स्थल पर ले जाया जाता था और साथ ही सभी के छद्म (झूठे) नाम भी रखे गए थे. इस पूरी प्रक्रिया के दौरान इन लोगों के इतने सारे उपनाम हो चुके थे कि एक बार एक बड़े वैज्ञानिक ने मजाक में कहा था, 'वैज्ञानिकों के लिए नाम याद करने के बजाए अपने फिजिक्स के कैलकुलेशन करना ज्यादा आसान था.'

इस ऑपरेशन के दौरान दिल्ली के ऑफिस में कोडवर्ड में बात करते हुए जो बातें पूछी जाती थीं वो होती थीं, क्या सियरा अभी कैंटीन में व्हिस्की पिला रही है? क्या स्टोर आ चुका है? जिनमें कैंटीन का मतलब सीक्रेट चैंबर, बम दस्तों का व्हाइट हाउस या व्हिस्की या दूसरे नामों से बुलाते थे. और साइंटिस्ट माने सियरा होता था. यानि क्या वैज्ञानिकों ने काम करना शुरू कर दिया है?

ऐसे ही डीआरडीओ की टीम को चार्ली, बीएआरसी की टीम को ब्रावो और मिलिट्री को माइक कहा जाता था.

जो CIA नहीं समझ पाया, एक स्कूल प्रिंसिपल समझ गया था

पोखरण के पास ही एक राजस्थानी गांव है 'खेतोलाई'. जिसकी आबादी बस 1,200 है. इस गांव को सबसे ज्यादा तबाही इन विस्फोटों के चलते झेलनी पड़ी है. 1998 के बाद इस गांव का जो बोर्ड लगा है उसमें गांव के नाम के ऊपर छोटा-छोटा 'शक्तिस्थल' नाम भी पेंट कर दिया गया है.

सोहनराम विश्नोई जो कि इस गांव के एकमात्र स्कूल के प्रिंसिपल हैं, उन्हें 1974 के पहले परमाणु परीक्षण के वक्त का जमीन का थर्रा उठना आज तक याद है. तब वो केवल 15 साल के थे. उनका घर भी इस विस्फोट से ढह गया था. वो बताते हैं उस वक्त एक साधु ने उन्हें बताया था कि दुनिया एक गाय की सींगों पर रखी हुई है और गर्मी में जब वो धरती को बैलेंस करने के लिए सीगों को हिलाती है तो ऐसा होता है.

मई 1998 तक सोहनराम बड़े और बुद्धिमान हो चुके थे. इस विस्फोट के वक्त वो समझ चुके थे कि कुछ विशेष घटना हो रही है. वैसे विस्फोट से पहले मेजर मोहन कुमार शर्मा सोहनराम के पास स्कूल में गए और उन्हें कुछ वक्त तक बच्चों को स्कूल से दूर रखने को कहा. सोहनराम को उन्होंने इसका कोई कारण नहीं बताया. पर सोहनराम सब जानते थे उन्होंने मेजर से कहा, परेशान मत होइए. हम जानते हैं कि आप दोबारा टेस्ट करने जा रहे हैं. हम पूरी तरह से आपके साथ हैं.

एक स्कूल प्रिंसिपल भी वो बात समझ गया था जो CIA नहीं समझ पाया था.

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