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विनोद खन्ना की यादें : फिल्मों से रोकने के लिए पिता ने तान दी थी बंदूक

अगर विनोद खन्ना ने संन्यास न लिया होता तो आज वो इंडस्ट्री के नंबर वन स्टार होते

Sunita Pandey | Published On: Apr 27, 2017 12:48 PM IST | Updated On: Apr 27, 2017 05:22 PM IST

विनोद खन्ना की यादें : फिल्मों से रोकने के लिए पिता ने तान दी थी बंदूक

स्मार्ट और हैंडसम होना ही अगर बॉलीवुड में हीरो होने की पहली शर्त है तो विनोद खन्ना का विकल्प ना तब था ना अब है. लंबा गोरा कद, मजबूत देहयष्टि, होठों पर तैरती शरारती मुस्कान 60 के दशक में शायद हीरो बनने के मापदंड से कहीं ज्यादा था इसलिए विनोद खन्ना को अपनी शुरुआत नायक के बजाय खलनायक के रूप में करनी पड़ी

लेकिन जल्द ही विनोद खन्ना ने ये साबित कर दिखाया कि हिंदी सिनेमा ने निगेटिव रोल देकर उनके साथ न्याय नहीं किया. 6 अक्टूबर 1946 को अविभाजित पाकिस्तान के पेशावर में जन्मे विनोद खन्ना की फैमिली बैकग्राउंड ऐसी थी जहां सिनेमा को ज्यादा महत्त्व नहीं दिया जाता था. उनके पिता के सी खन्ना एक सख्त मिजाज बिजनेसमैन थे. बच्चों की अनुशासनहीनता उन्हें बिलकुल पसंद नहीं थी जबकि विनोद खन्ना बचपन से ही शरारती और विद्रोही किस्म के थे.

vinod khanna

कॉलेज की पढ़ाई के दौरान विनोद खन्ना ने फिल्म मुगले आजम देखी और यहीं से उनके अंदर अभिनेता बनने की इच्छा जगी. पिता उन्हें पढ़ा-लिखा कर एक कामयाब बिजनेसमैन बनाना चाहते थे जबकि विनोद खन्ना को बिजनेस में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. इसी दौरान एक पार्टी में उनकी मुलाक़ात अभिनेता सुनील दत्त से हुई जो उन दिनों 'मन का मीत' बनाने की तैयारी कर रहे थे.

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उन्होंने विनोद खन्ना को इस फिल्म में अपने भाई का रोल ऑफर किया और उन्होंने हामी भी भर दी. लेकिन जैसे ही उन्होंने अपने पिता के सामने अभिनेता बनने की ख्वाहिश जाहिर की वो काफी नाराज हो गए. के सी खन्ना बेटे के अभिनेता बनने की ख्वाहिश से इतने नाराज हो गए कि उन्होंने उनके सर पर बंदूक तान दी.

आखिरकार मां के बीचबचाव के बाद के सी खन्ना ने इस शर्त पर उन्हें एक्टिंग करने की इजाजत दी कि अगर दो साल में उन्होंने बॉलीवुड में अपनी जगह नहीं बनाई तो उन्हें फैमिली बिजनेस संभालना पडेगा, विनोद खन्ना ने पिता की ये शर्त मान ली और इस तरह बॉलीवुड में उनकी शुरुआत हुई.

सुनील दत्त की फिल्म 'मन का मीत' में विनोद खन्ना ने निगेटिव किरदार निभाया था जिसे काफी पसंद किया गया और उनके पास फिल्मों की लाइन लग गयी. इस फिल्म के बाद उन्होंने एक साथ 15 फ़िल्में साइन की. जिसमें पूरब और पश्चिम, आन मिलो सजना और मेरा गांव मेरा देश जैसी फिल्में शामिल थीं. 1971 में उन्हें फिल्म 'हम तुम और वो' में हीरो का रोल ऑफर हुआ और इस तरह वो खलनायक से नायक बन गए. 1973 में आई गुलज़ार की फिल्म मेरे अपने काफी कामयाब रही. इसके बाद आई 'अचानक' ने उन्हें बतौर हीरो स्थापित कर दिया.

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कुर्बानी, हेराफेरी, खूनपसीना, अमर अकबर एंथनी, मुकद्दर का सिकंदर जैसी फिल्मों के जरिये विनोद खन्ना का सितारा बुलंदियों पर जा पहुंचा. इस समय विनोद खन्ना अपने करियर के शीर्ष पर थे. इन्हीं दिनों विनोद  धार्मिक गुरु ओशो रजनीश के संपर्क में आये जिसने उनकी ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी. विनोद खन्ना ने शोहरत और दौलत की इस दुनिया को ठुकरा दिया और ओशो की शरण में चले गए.

विनोद खन्ना का विद्रोही स्वभाव किसी बंदिश में रहने का आदि नहीं था. जल्द ही रजनीश से उनका मोह भांग हो गया और 5 सालों बाद वो अपनी दुनिया में लौट आये. बॉलीवुड ने भी अपने इस स्टार का स्वागत बड़ी गर्मजोशी से किया. वापसी के बाद उन्होंने मुकुल आनंद की इन्साफ में काम किया. ये फिल्म हिट रही और विनोद खन्ना की गाड़ी एक बार फिर चल पडी.

इसके बाद उन्होंने क्षत्रिय, जुर्म, रिहाई, लेकिन जैसी दर्जनों फिल्मों में काम किया लेकिन सच्चाई यही है कि उन्हें पहले जैसी सफलता नहीं मिल पाई. संन्यास लेने से पहले उन्हें अमिताभ बच्चन का सबसे मजबूत प्रतिद्वंदी माना जाता था लेकिन उनके जाते ही बच्चन साहब का रास्ता साफ हो गया. कई लोगों का कहना है कि अगर उन्होंने संन्यास नहीं लिया होता तो आज सुपरस्टार का खिताब उनके पास होता.  1997 में विनोद खन्ना ने अपनी राजनैतिक पारी की शुरुआत की और सांसद बने. पंजाब के गुरुदासपुर से विनोद खन्ना इन दिनों सांसद थे.

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