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विक्टोरिया एंड अब्दुल: एक रानी और मुंशी के बीच बेमेल दोस्ती की कहानी

फिल्म ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ सितंबर 2017 में रिलीज के लिए तैयार है

Rohini Nair Updated On: Jun 04, 2017 02:50 PM IST

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विक्टोरिया एंड अब्दुल: एक रानी और मुंशी के बीच बेमेल दोस्ती की कहानी

एक नौजवान भारतीय अर्दली को 1887 में महारानी विक्टोरिया के शासन के स्वर्ण जयंती समारोह के दौरान उनके दरबार में सेवा करने के लिए इंग्लैंड लाया गया.

‘लंबे और गंभीर’ अब्दुल करीम में कुछ ऐसा था जिसे महारानी की आंखों ने पकड़ लिया. तब वह 26 साल का था और महारानी अपनी उम्र के छठे दशक के आखिर में थीं. जब उसे महारानी के सामने पेश किया गया तो उसने उनके पैरों को चूम लिया. कुछ दिन बाद उसने शानदार भारतीय व्यंजन तैयार कर महारानी को आश्चर्यचकित कर दिया.

करीम जल्द ही महारानी का पसंदीदा बन गया. उसे खाने की मेज पर प्रतीक्षा करने के काम से हटाकर ‘मुंशी’ बना दिया गया. उसने रानी को हिंदुस्तानी सिखाया, भारत से जुड़े मामलों पर उनके साथ अपनी राय साझा की और महारानी का सबसे करीबी भरोसेमंद बन गया.

दोनों के बीच की यह दोस्ती महारानी विक्टोरिया के दरबारियों और उनके बच्चों को नागवार गुजरती थी. 1901 में उनके निधन के बाद उनके बेटे किंग एडवर्ड VII ने महारानी और उनके मुंशी के बीच पत्राचार की सभी निशानियों को नष्ट कर दिया. साथ ही अब्दुल करीम को भारत वापस भेज दिया.

पत्रकार और लेखक श्राबणी बसु ने महारानी विक्टोरिया और अब्दुल के बीच पत्राचार के अवशेषों, महारानी के 'हिंदुस्तानी जर्नल' और बाद में लंबे समय से छिपी हुई अब्दुल करीम की डायरी को काफी मशक्कत से खोजकर इस बेमेल दोस्ती की छवि को फिर से जिंदा करने की कोशिश की है.

Book

2010 में यह ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल: द ट्रू स्टोरी ऑफ द क्वीन्स क्लोजेस्ट कॉन्फिडेंट’ के नाम से प्रकाशित हुई. इस किताब पर अब स्टीफन फ्रीर्स ने फिल्म बनाई है. इसमें डेम जुडी डेंच ने महारानी और अली फजल ने अब्दुल करीम की भूमिका निभाई है. इसी महीने जारी इसके ट्रेलर ने सबका ध्यान खींचा है. (इसे 70वें कान फिल्म समारोह में लॉन्च किया जाना था, लेकिन फिल्म के निर्माताओं ने मैनचेस्टर आतंकवादी हमले की वजह से इसे स्थगित कर दिया) ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ सितंबर 2017 में रिलीज के लिए तैयार है.

फ़र्स्टपोस्ट के साथ एक इंटरव्यू में लेखक श्राबणी बसु ने बताया कि किस तरह यह फिल्म उनकी किताब पर आधारित है. और महारानी विक्टोरिया और अब्दुल करीम की कहानी में उनकी दिलचस्पी कैसे पैदा हुई?

फ़र्स्टपोस्ट: ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ का ट्रेलर जारी होने के बाद आपकी 2010 में प्रकाशित किताब के प्रति फिर से रुचि पैदा हुई है. क्या आप हमें यह बताएंगी कि स्टीवन फ्रीर्स ने ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ पर फिल्म बनाने के लिए किस तरह आपसे संपर्क किया?

श्राबणी बसु: किताब के प्रकाशन के बाद 2011 में मुझसे वर्किंग टाइटल समेत कई स्टूडियो ने संपर्क किया. मैंने वर्किंग टाइटल को चुना क्योंकि उन्होंने ‘बिली इलियट’ और ‘वॉर हॉर्स’ के लिए मशहूर पटकथा लेखक ली हॉल के साथ करार किया था. मुझे ली का काम बहुत पसंद है और मैंने सोचा कि वह स्क्रिप्ट लिखने के लिए सही व्यक्ति थे. वर्किंग टाइटल ने कुछ शानदार फिल्में बनाई हैं, इसलिए यह एक बेहतरीन कॉम्बिनेशन था.

स्टीफन फ्रीर्स बाद में प्रोजेक्ट में शामिल हुए. जब मुझे बताया गया कि वह फिल्म को निर्देशित करने के लिए सहमत हो गए हैं तो मुझे बहुत खुशी हुई. विक्टोरिया की भूमिका निभाने के लिए डेम जुडी डेंच के तैयार हो जाने से एक ड्रीम टीम बन गई.

फ़र्स्टपोस्ट: क्या आपने फिल्म का ट्रेलर देखा है? आप की महारानी विक्टोरिया और अब्दुल करीम की भूमिका निभा रहे जुडी डेंच और अली फजल के बारे में क्या सोच है?

श्राबणी बसु: मैंने पूरी फिल्म देखी है. जुडी डेंच और अली फजल दोनों ने शानदार भूमिका निभाई है.

फ़र्स्टपोस्ट: बताया जाता है कि 2010 में आपकी किताब प्रकाशित होने के बाद अब्दुल करीम के एक वंशज ने आपसे संपर्क किया और आपको अरसे से छिपी उनकी डायरी दिखायी. जब आपको यह मिली तो आपके मन में क्या विचार पैदा हुए? क्या इसने ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ के लिए किये गये आप के शोध की पुष्टि की या इससे आपको कोई नई रोशनी मिली?

श्राबणी बसु: मैंने कई साल तक अब्दुल करीम के वंशजों का पता लगाने की कोशिश की थी. मुझे आगरा में उनका घर और उनकी कब्र मिल गयी थी. लेकिन मुझे बताया गया कि विभाजन के बाद अब्दुल का परिवार पाकिस्तान चला गया था, लिहाजा मेरी तलाश वहीं रुक गई. मैंने 2010 में अपने किताब का हार्डबैक संस्करण प्रकाशित किया. मैंने अपने हर मीडिया इंडरव्यू में कहा कि मुझे अब्दुल के वंशजों की तलाश है. किताब के प्रकाशन के एक महीने के भीतर उन्होंने मुझसे संपर्क किया और बताया कि डायरी कराची में है.

मैंने वीजा हासिल किया और जितना जल्दी कर सकती थी उतना जल्दी कराची के लिए उड़ान भरी. जब उनके परिवार ने मुझे डायरी दी तो वह मेरे लिए सबसे आश्चर्यजनक क्षण था. यह ऐसा क्षण था जिसका हर इतिहासकार सपना देखता है. यह एक ऐसी डायरी थी जिसे शाही परिवार प्रकाशित नहीं होने देना चाहता था. लेकिन यह सौ से ज्यादा साल तक बची रह गई थी. यह विंडसर से आगरा और फिर विभाजन की हिंसा के बीच आगरा से कराची होते हुए अंत में मेरे हाथों में आई थी. यह एक भावुक क्षण भी था और मुझे लगा कि कहानी आखिरकार पूरी हो गई.

मैंने जो भी शोध किया था, इसने उसकी पुष्टि की और कुछ और विवरण जोड़े. सबसे बड़ी बात यह थी कि अब्दुल की आवाज थी. मुझे पता चला कि उसकी पत्नी ने भी एक डायरी लिखी थी, लेकिन वह विभाजन के दौरान खो गयी थी. इन चीजों पर उसका नजरिया जानना बहुत अच्छा होता. करीम ने अपनी डायरी में उसकी डायरी का जिक्र किया है, लेकिन यह भी लिखा है कि वह उसे अपनी कहानी खुद बताने के लिए छोड़ रहे हैं. दुर्भाग्य से हम इसे कभी नहीं पढ़ पाएंगे.

मैंने अपनी किताब को इस डायरी की मदद से संशोधित किया और किताब का पेपरबैक संस्करण 2011 में प्रकाशित हुआ.

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फ़र्स्टपोस्ट: अपनी किताब पर काम करते वक्त आपने महारानी के 'हिंदुस्तानी जर्नल' का अनुवाद किया था. आप के मुताबिक उन 13 खंडों में सबसे यादगार पहलू क्या थे? आपको रानी के नोट्स (यादों) की गुणवत्ता के बारे में क्या मालूम हुआ?

श्राबणी बसु: हिंदुस्तानी जरनल के 13 खंडों को पढ़ना बेहद सुखद था. यह उनका स्थान था, जो महारानी की मौत के बाद शाही परिवार नष्ट नहीं कर सका था. प्रारंभ में अब्दुल करीम की अंग्रेजी कमजोर थी और वह उसे सही करती थीं, और उनका (महारानी) उर्दू दोषपूर्ण था. 13वें जर्नल के आखिर तक उसकी अंग्रेजी में सुधार हो गया था और वह (महारानी) धारा प्रवाह उर्दू में आधा पेज लिख लेती थीं.

हिंदुस्तानी जर्नल में लिखे विवरण से उनके जीवन पर रोशनी पड़ी. महारानी अक्सर मुंशी के घर चाय पीने के लिए जाती थीं और यूरोप के शाही परिवारों को भी ले जाती थीं. जब मुंशी की बिल्ली को बच्चा हुआ तो उन्होंने लिखा कि वह उन्हें देखने जाएंगी. इस तरह की साधारण बातों को उन्होंने साझा किया है, जिससे कहानी जीवंत हो गई है.

वह अपने महल में हों या यात्रा कर रही हों, महारानी ने कभी पढ़ाई नहीं छोड़ी. वह जहाज पर या बेलमोरल के समरहाउस में भी पढ़ती थीं. करीम बीमार होते थे तो वह उसके घर जाकर उसे तकिए के सहारे बैठा देती थीं और उससे पढ़ती थीं.

फ़र्स्टपोस्ट: अब्दुल करीम की डायरी शैली, सामग्री, लहजा और विषय में हिंदुस्तानी जर्नल से कैसे अलग थी?

श्राबणी बसु: हिंदुस्तानी जर्नल उन दिनों का दैनिक रिकॉर्ड हैं. यह एक ऐसी प्रक्रिया थी जिसके जरिए उन्होंने उर्दू सीखा और उसका अभ्यास किया.

करीम की डायरी विक्टोरिया के शासनकाल में 1887 से 1897 तक (स्वर्ण जयंती से हीरक जयंती की अवधि) उनके महलों में उसके बिताये वक्त का विवरण है.

फ़र्स्टपोस्ट: महारानी और अब्दुल करीम के बीच हुए ज्यादातर पत्राचार को किंग एडवर्ड ने नष्ट करा दिया था,  ऐसे में दोनों के बीच संबंधों का पता लगाना कितना मुश्किल था?

श्राबणी बसु: मैंने अलग-अलग स्रोतों के जरिए कहानी का पता लगाया. इनमें हिंदुस्तानी जर्नल, महारानी के डॉक्टर सर जेम्स रीड की रखी गई डायरी, महारानी और भारत के वायसराय के बीच के पत्र, शाही परिवार और वायसराय के बीच के पत्र, अखबारों की रिपोर्ट और अन्य स्रोत शामिल थे. मुझे शोध करने में चार साल लगे.

फ़र्स्टपोस्ट: क्या हम यह जानने के लिए थोड़ा पीछे जा सकते हैं कि आप महारानी विक्टोरिया और अब्दुल करीम की कहानी से व्यक्तिगत रूप से कैसे प्रभावित हुईं? इतिहास के इस पहलू में ऐसा क्या था जिसने आपको और छानबीन करने के लिए आकर्षित किया?

श्राबणी बसु: मैंने महारानी विक्टोरिया और करी से उनके प्यार के बारे में कुछ सुना था. मुझे पता था कि उनके पास कुछ भारतीय नौकर थे. आइल ऑफ वाइट में ओसबोर्न हाउस की यात्रा के दौरान मैंने करीम के चित्रों को देखा था. चित्रों ने मुझसे बात की. वह निश्चित रूप से कोई नौकर नहीं था. उसे नवाब की तरह चित्रित किया गया था. इसने मेरी जिज्ञासा जगाया और मुझे उसकी खोज पर ले गया.

फ़र्स्टपोस्ट: महारानी विक्टोरिया का 1887 का दरबार कैसा था जहां 24 साल का अब्दुल करीम गया था? वहां पहुंचकर अब्दुल करीम की भावनाएं क्या थीं?

श्राबणी बसु: यह वैभव और औपचारिकता से भरा दरबार था. उसे प्रोटोकॉल और रैंकिंग को समझने में हफ्तों लगा होगा. यह आगरा से आए एक युवा क्लर्क के लिए काफी कठिन रहा होगा.

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फ़र्स्टपोस्ट: आप महारानी विक्टोरिया और मुंशी अब्दुल करीम के रिश्ते को किस तरह का बताएंगी? जब आप उन सामग्रियों पर गौर कर रही थीं जिन्हें उन्होंने अपने पीछे छोड़ा था तो आप ने उन दोनों की शख्सियत के बारे में क्या समझा?

श्राबणी बसु: मुझे लगता है कि इसने विभिन्न स्तरों पर काम किया. वह उनका सबसे करीबी दोस्त और उनका भरोसेमंद था. वह उनके लिए एक बेटे की तरह भी था. लेकिन इसके साथ शारीरिक पहलू भी महत्वपूर्ण था. महारानी विक्टोरिया को एक मजबूत युवक को अपने बगल में खड़ा करना पसंद था जो उनका ख्याल रखता हो. उन्हें जॉन ब्राउन पसंद था और अब्दुल करीम ने बाद में उस जगह को भरा.

उन्होंने हर दिन उसे लिखा, कभी-कभी एक दिन में कई बार. वह अपने पत्र को चुंबन के साथ समाप्त करती थीं.

फ़र्स्टपोस्ट: क्या अब्दुल करीम ने अपनी अहमियत बनाने के लिए महारानी का बेजा इस्तेमाल किया था?

श्राबणी बसु: उसने अपने पिता के लिए पेंशन मांगी थी. बाकी – जमीन और खिताब - महारानी ने खुद उसे दिया था. उसे अपने घर के पुनरुद्धार के लिए बड़ी रकम खर्च करने की इजाजत थी. उसे गाड़ी और नौकर, आगरा में जमीन और खिताब दी गई थी.

 फ़र्स्टपोस्ट: आप के लिए महारानी विक्टोरिया और अब्दुल करीम के बीच दोस्ती के सबसे मार्मिक पहलू क्या थे?

श्राबणी बसु: यह दो लोगों के बीच का संबंध था - दो विपरीत छोर का संबंध. लेकिन वे एक दूसरे से विशुद्ध रूप से मनुष्य के तौर पर जुड़े थे और उन्होंने एक अद्वितीय दोस्ती कायम की.

फ़र्स्टपोस्ट: आप को क्या उम्मीद है... यह फिल्म इस रिश्ते, इन दोनों शख्सियतों और इतिहास की इस अवधि के बारे में अपने दर्शकों को क्या बता पाएगी?

श्राबणी बसु: सबसे बड़ी बात कि यह साम्राज्य की पृष्ठभूमि में मानव संबंधों की एक कहानी है. यह एक छिपी हुई कहानी बताती है.

(विक्टोरिया एंड अब्दुल का ट्रेलर यहां देखें)

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