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आखिर बॉलीवुड को 'स्टॉकिंग' से इतना प्यार क्यों है?

अक्षय कुमार की आने वाली फिल्म 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' का गाना ‘हंस मत पगली’कई सवाल खड़े करता है

Ritu Tiwari Updated On: Jul 07, 2017 04:48 PM IST

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आखिर बॉलीवुड को 'स्टॉकिंग' से इतना प्यार क्यों है?

फिल्में समाज का आइना होती हैं. ये मनोरंजन तो करती ही हैं, साथ-साथ समाज में फैली बुराइयों, कुप्रथाओं और सामाजिक मुद्दों की भी दशा-दिशा तय करती हैं. ऐसी कई फिल्में हैं जो बड़े सामाजिक मुद्दों पर हमें जागरुक करती हैं या हमें कुछ कर गुजरने को प्रेरित करती हैं. लेकिन जब इन्हीं फिल्मों के गानों में फूहड़ता दिखती है या फिर लड़कियों से छेड़खानी को प्यार का नाम दिया जाता है तो सवाल तो उठने लाजिमी ही हैं.

फिलहाल सवाल अक्षय कुमार की आने वाली फिल्म 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' उठ रहे हैं. स्वच्छ भारत और शौचालय जैसे सामाजिक मुद्दे उठाने के लिए यह फिल्म रिलीज होने से पहले ही काफी वाहवाही बटोर रही है. लेकिन हाल ही में आया इस फिल्म का नया गाना ‘हंस मत पगली प्यार हो जाएगा’ इन सारी वाहवाहियों के पीछे गंभीर सवाल खड़ा करता है.

इस गाने में फिल्म के हीरो अक्षय कुमार हीरोइन भूमि पेडनेकर के आगे-पीछे घुमकर उनकी चोरी-छिपे फोटो लेते नजर आ रहें हैं. पर्दे पर ये मस्ती और चुहलबाजी बड़ी अच्छी और रोमांटिक लग रही है. लेकिन क्या असल में भी ऐसा होता है? जब एक लड़का किसी का पीछा करता है तो क्या वो प्यार कहलाता है? उसकी चोरी छिपे फोटो लेना क्या लड़की को अच्छा लगता है? नहीं.

वास्तविकता पर आएं तो इसके मायने ही बदल जाएंगे... पर्दे पर जिसे हम प्यार कह रहे है असल में उसे स्टॉक करना कहते हैं. एक ऐसा शब्द जिससे डर और जुर्म जैसी भावनाएं जुड़ी हैं. अगर एक लड़का किसी लड़की का पीछा करता है, उसकी बिना इजाजत के फोटो लेता है तो वह स्टॉकिंग है. जिसके लिए कई कानून और हेल्पलाइन नंबर तक जारी है. जिसके लिए कड़ी सजा मुकर्रर है. अब सवाल यही पैदा होता है क्या सच में फिल्में ऐसे जुर्म को बढ़ावा दे रही हैं.

प्यार या स्टॉकिंग?

लव और स्टॉकिंग में मामूली सा फर्क है. कहते है प्यार और जंग में सब कुछ जायज होता है, लेकिन अगर प्यार गलत दिशा में ले जाए तो ये मुसीबत बन जाती है. किसे अच्छा नहीं लगता कि कोई उसे देखे, उसे पसंद करे और उसका इंतजार करे लेकिन यह एक हद तक ही ठीक लगता है. यह हद कितनी है- यह भी हमारा समाज ही तय करता है.

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याद है मुझे जब मैं यही कुछ 15-16 साल की थी. तब हम दिनभर टीवी से चिपके रहते थे. पर्दे की चकाचौंध, उनकी कहानियां अपनी सी लगती थी. मानो हमारा भी हीरो कही रास्ते में इंतजार कर रहा हो. मेरा रास्ते में अचानक उससे टकराना और हवाओं का चलना, पीछे बैकग्रांउड म्यूजिक का बजना, न जाने क्या-क्या सपने दे जाता था.

तब पापा अक्सर डांटा करते थे और टीवी से दूर रहने को कहते थे. उनका मानना था ये सिनेमा और टीवी ही जो हमें बिगाड़ रहा है, तब पापा की बातें बहुत बुरी लगती थी. क्योंकि सिनेमा, टीवी ही है जिससे हम सीखते थे. तब यही पता था जो समाज में होता आ रहा है वही यह दिखाता है.

फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता है कि हीरो हीरोईन को पसंद करता है तो उसको पाने के लिए कई चीजें करता है और आखिर में हीरोईन हीरो की हो जाती है. लेकिन रील और रीयल में फर्क है. फिल्मों की चुहल वाली छेड़छाड़ असल जिंदगी में कितनी मुश्किल हो सकती है, इसकी कल्पना मुश्किल है. आए दिन एकतरफा प्यार, स्टॉकिंग और रिवेंज अटैक की खबरें सुनने को मिलती हैं. ये 'आशिकी' कई बार फिल्मों से इंस्पायर्ड होती हैं.

कितना काफी है?

टॉयलेट कोई अकेली फिल्म नहीं जिसमें लड़की के पीछे पड़ने की इस 'अदा' को ग्लोरिफाई किया गया है. इस गाने को देखने से आपको धनुष की फिल्म रांझणा की याद आएगी. इसमें धनुष सोनम कपूर का पीछा करते दिखे थे. सोनम के कई थप्पड़ों के बावजूद धनुष हर रोज वापस आ जाते थे.

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ऐसी फिल्में सच्चे प्यार से ज्यादा मनचलों के मनोबल को शह देती नजर आती है. रोमांस के बादशाह कहे जाने वाले यश चोपड़ा ने शाहरुख खान का 'डर' वाला किरदार गढ़ा था. फिल्म में हीरो भले सनी देओल रहे हों लेकिन नौजवानों को 'कककक... किरण' वाली शाहरुख ही याद आता है. एक मानसिक रूप से बीमार किरदार हमारा आदर्श बन जाता है.

यहां तर्क दिया जा सकता है कि फिल्में वही दिखा रही हैं जो समाज में पहले से ही होता है. लड़कियों का पीछा करना, उन्हें ब्लैंक कॉल्स मारना, उनके इंतजार में खड़े रहना, बिना इजाजत उनकी तस्वीरें लेना- यह सब हमारे समाज की सच्चाई है. तो फिल्में यही दिखाती है तो इसमें गलत क्या है?

गलत ये है कि फिल्ममेकर यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता. फिल्में समाज का आइना तो होती हैं लेकिन यह टू-वे मिरर है. जैसे समाज फिल्मों का चेहरा तय करता है तो वहीं फिल्में भी समाज के चाल-चरित्र पर असर करती हैं. ऐसे में अगर फिल्में स्टॉकिंग दिखाती हैं और उसे जायज ठहराती हैं तो वह समाज का बड़ा नुकसान करती हैं. वह समाज के इस आइने में दरार ला रही हैं.

सिनेमा का समाज पर प्रभाव हमेशा से ही रहा है. छोटे-छोटे बच्चे ठीक से बोलना सीखने से पहले गानों की लाइनें गाते दिखते हैं. हर लड़का एक न एक समय शाहरुख, ऋतिक, सलमान या जॉन अब्राहम बनना चाहता है. ऐसे में जब सिनेमा समाज की उस हद को पार करता है तो इसका असर बहुत बड़ा होता है.

स्टॉकिंग और प्यार के बीच लकीर बहुत महीन है... बहुत जरूरी है कि फिल्में और फिल्मी गाने इस लकीर का खयाल रखें नहीं तो ऐसे गाने मनचलों का हौसला और बुलंद करेंगी.

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