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मौसिकी की तस्करी: पाकिस्तान से बदला लेने का सबसे 'हसीन' तरीका

अगर आप इस समुद्र के किनारे टहलते दस सीपीयां उठाएंगे तो सात सीपीयां पाकिस्तानी मिलेंगी

Satya Vyas Updated On: Apr 23, 2017 11:51 AM IST

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मौसिकी की तस्करी: पाकिस्तान से बदला लेने का सबसे 'हसीन' तरीका

फिल्मी गलियारों की एक कहावत है. संगीत समुद्र है और हिंदुस्तानी फिल्मी गीत सीपियां. अगर आप इस समुद्र के किनारे टहलते दस सीपीयां उठाएंगे तो सात सीपियां पाकिस्तानी मिलेंगी.

मजाहिया तौर पर कही गई यह बात यकीनी तौर पर सही है. प्रेरणा, प्रभाव, श्रद्धांजलि जैसे शब्दों के पीछे छुपकर धुनों, बोलों और मौसिकी की तस्करी चलती रही है.

हिंदुस्तानी फिल्म इंडस्ट्री द्वारा पाकिस्तानी गीतों की चोरी पर काफी कुछ लिखा जा चुका है. लेकिन यह समंदर इतना गहरा है कि सब कुछ समेट पाना हमेशा ही मुश्किल रहा है. आज हम कुछ ऐसे ही कम जाने जानेवाले पाकिस्तानी गीतों की चर्चा करेंगे.

पाकिस्तानी गीतों की चोरी का मामला 90 के दशक में आम लोगों के जद में आया. नदीम श्रवण, अनु मलिक और आनंद-मिलिंद जैसे संगीतकारों ने पाकिस्तानी फिल्मों की धुनें उठाकर गीत बनाए और सफलता भी पाई.

मगर धुनों की यह चोरी अचानक ही 90 के दशक में नहीं शुरू हुईं बल्कि यह पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री की स्थापना के साथ ही शुरू हो गई थी.

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1966 में फिलिस्तीन समस्याओं पर आई फिल्म ‘ज़र्क़ा’ में ‘हबीब ज़ालिब’ का लिखा गीत ‘रक़्श ज़ंजीर पहन कर भी किया जाता है’ एक क्रांतिकारी गीत था जिसमें ‘वज़ाहत अत्री’ का संगीत था. यह गीत अदाकारा ‘नीलों’ की व्यक्तिगत समस्याओं से आहत होकर हबीब ने लिखा था जो बाद में फिल्म में लिया गया.

इसी धुन को संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी ने 1974 में आई फिल्म ‘दोस्त’ के लिए इस्तेमाल किया. गाने के बोल बदल कर ‘आ बता दें तुझे के कैसे जिया जाता है’ कर दिए गए. पाकिस्तान में कल्ट के तौर पर स्थापित हो चुके जर्क़ा के गीत की तुलना में इस गीत को खास तवज्ज़ो नहीं मिली.

पंजाबी मूल के होने के कारण निर्देशक सुभाष घई का पाकिस्तानी पंजाबी गीतों से प्रभावित होना लाजिमी है. उन्होंने अपनी फिल्म ‘हीरो’ में रेगिस्तान की आवाज ‘रेशमा’ के मूल गीत ‘चार दिनां दा प्यार ओ रब्बा’ का हिंदीकरण किया तो हिन्दी गीत ‘चार दिनों का प्यार ओ रब्बा’ रेशमा से ही गवाया.

आगे की फिल्मों में भी वह पाकिस्तानी धुनों का प्रयोग तो करते रहे परंतु मूल फनकार का नाम देना भूलते रहे.

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1986 में आई फिल्म कर्मा का गीत ‘ना जइयो परदेश’ सुनें. गाना कविता कृष्णमूर्ति और किशोर कुमार ने गाया है. संगीतकार लक्ष्मी-प्यारे ही हैं.

मूल गीत रेशमा और परवेज़ मेहंदी का गाया ‘गोरिए मैं जाणा परदेश’ से प्रभावित है.

कोई आश्चर्य नहीं की उन्हीं की फिल्म खलनायक का गीत ‘चोली के पीछे क्या है’ भी इस पाकिस्तानी गीत से प्रभावित है.

1985 में एक फिल्म आई ‘अलग-अलग.' इस फिल्म की खास बात यह भी थी कि इस फिल्म के निर्माता राजेश खन्ना खुद थे और संगीतकार आर डी बर्मन.

फिल्म का एक गीत ‘कभी बेबसी ने मारा’ काफी मशहूर रहा था. मशहूर यह भी रहा था कि इस गीत के लिए किशोर कुमार (जो की अपने बकाए की रकम गीत से पहले लेने के लिए प्रसिद्ध थे) ने इस गीत के लिए कोई पैसे नहीं लिए थे.

मगर यह भी धुन, बोल और फ्रेम दर फ्रेम पाकिस्तानी गीत कभी ख्वाहिशों ने लूटा’  की पूरी कॉपी है. अखलाक अहमद द्वारा गाए इस गीत के संगीतकर एम अशरफ थे, जिनके गीतों कि सबसे ज्यादा कॉपी हुई.

1985 मे ही प्रदर्शित हुई फिल्म ‘प्यार झुकता नहीं’ साल कि सबसे सफल फिल्मों में से एक थी. फिल्म के सारे गीत लोकप्रिय हुए थे. फिल्म के संगीतकार लक्ष्मी-प्यारे ही थे.

एक गीत ‘तुमसे मिलकर ना जाने क्यों और भी कुछ याद आता है’  गीतमालाओं पर अनेक दिनों तक नंबर एक पर काबिज रहा था’

यह गीत 1977 में आई पाकिस्तानी फिल्म आईना के गीत ‘मुझे दिल से ना भुलाना; की हू ब हू नकल है. संगीत रॉबिन घोष का था जो पाकिस्तानी फिल्म संगीत के स्तम्भ माने जाते हैं.

मुखड़ों में ही नहीं अंतरों में भी पाकिस्तानी फिल्मों के गीतों के प्रभाव मे गीत बनाए गए. आर्थर नायर पाकिस्तान के किशोर कुमार कहे जाते हैं. क्रिस्तानी समुदाय से आने वाले आर्थर नायर ने 1977 मे आई फिल्म ‘आग’ में मोहम्मद अली के लिए ‘मैं तो जला ऐसा जीवन भर, क्या कोई दीप जलेगा’ गीत गा कर प्रसिद्धि पाई थी. इसके संगीतकार एम अशरफ ही थे-

इस गीत के मुखड़े की धुन को 1986 में आई मुद्दत फिल्म के गीत ‘प्यार हमारा अमर रहेगा’ के अंतरे में इस्तेमाल किया गया. जहां इसके बोल हैं चेहरा कंवल है, बात गजल है,खुशबू जैसी तू चंचल है.

पाकिस्तानी फिल्म संगीत के पुरोधा एम. अशरफ जिनके धुनों की बे-हिसाब नक्ल हुई और उन्होने खुद भी नागिन जैसी धुनो पर हाथ साफ किया, के अनुसार ‘कोई भी संगीतकार खुद ऐसा करना नहीं चाहता. यह तो निर्माताओं की मांग होती है जिस कारण समझौता करना पड़ जाता है.’ बाकी प्रतिस्पर्धा भी एक कारण होती ही है.

कारण जो भी हो. धुनों की इस अदला बदली को महज संयोग या प्रेरणा तो नहीं ही कहा जा सकता. भारतीय संगीत के पुरोधा रवि, सलिल चौधुरी, एस. डी. बर्मन, शंकर जयकिशन हों या पाकिस्तानी संगीत के दिग्गज बाबा चिश्ती, अशरफ, रॉबिन या एम.सुलेमान. जब इन दिग्गजों ने भी धुनों की हेराफेरी की है तो आज के संगीतकारों को क्या दोष दिया जाए.

आखिर में  जाते-जाते यह गीत सुन कर बताएं कि इससे प्रेरित भारतीय गीत कौन सा है?

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