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सत्यजीत रे की यादें: ऊंचे कद के डायरेक्टर की शानदार अंतिम विदाई

कोलकाता शहर ने सत्यजीत रे को बेपनाह इज्जत दी

Animesh Mukharjee | Published On: Apr 23, 2017 07:20 AM IST | Updated On: Apr 23, 2017 07:20 AM IST

सत्यजीत रे की यादें: ऊंचे कद के डायरेक्टर की शानदार अंतिम विदाई

कोलकाता शहर का अपना एक अलग किरदार है. जिसे चाहा, उसे सर पर चढ़ाया, हर कीमत पर. सौरव गांगुली को टीम से निकाले जाने पर इस शहर ने ईडन गार्डन पर टीम इंडिया को भी हूट किया और 'कोरबो लोड़बो जीतबो रे' वाली कोलकाता नाइटराइडर्स को भी.

इसी कोलकाता ने एक आदमी को बेपनाह इज्जत दी. सत्यजीत रे शायद हिंदी सिनेमा के सबसे ऊंचे कद के डायरेक्टर हैं. ये बात इसलिए भी सही है क्योंकि उनका कद 6 फीट 4 इंच का था.

रे ने सिर्फ एक हिंदी फिल्म बनाई 

मार्टिन स्कॉर्सोजी उन्हें कुरोसोवा और बर्गमेन के बराबर रखते हैं. टैगोर के शिष्य रहे सत्यजीत रे एक फिल्म डायरेक्टर होने के साथ-साथ कैलिग्राफर और म्यूजिक कंपोजर भी थे. एकमात्र हिंदी फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ बनाने वाले रे को ऑस्कर अकादमी ने लाइफटाइम अचीवमेंट से सम्मानित किया. मगर रे को जिस अंदाज में कोलकाता शहर ने विदाई दी वो अद्भुत थी.

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कुरोसावा के साथ रे (साभार: टंबलर)

कोलकाता ने दी कुछ ऐसे दी श्रद्धांजलि 

23 अप्रैल 1992 को अपने जन्मदिन से ठीक नौ दिन पहले सत्यजीत रे की दिल के दौरे से मौत हो गई. वो कई दिन से बीमार थे. इस खबर के फैलते ही शहर खामोश हो गया. कोई रोना-धोना कुछ नहीं बस सन्नाटा.

मशहूर लेखक अमिताभ घोष लिखते हैं कि शहर में लोग प्लकार्ड हाथ में लिए रे के घर की तरफ जा रहे थे. बिना कुछ कहे खामोशी से. ऐसा लग रहा था, जैसे पूरे शहर को पता हो कि उन्होंने क्या खो दिया है.

तेज गर्मी थी मगर लाखों लोग कोलकाता की सड़कों गलियों में खामोश खड़े थे. ज्यादातर के हाथ में तख्तियां थीं जिनपर लिखे का मतलब बनता था 'राजा चला गया है, अब सिंहासन खाली ही रहेगा.'

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सत्यजीत रे (तस्वीर: रघु राय)

नेशनल अवार्ड विजेता अभिनेता सौमित्र चैटर्जी उस समय कोलकाता में मंच पर एक नाटक कर रहे थे. सत्यजीत रे के मरने की खबर आई. सौमित्र बिना कोई शब्द बोले स्टेज छोड़कर चले गए.

किसी ने कोई सफाई नहीं दी पब्लिक भी खामोश रही. सामने बैठे लोग भी समझते थे. और भी कई जगहों पर स्टेज, सिनेमा, थिएटर की परफॉर्मेंस चल रही थीं. सब बीच में रोक दी गईं.

अगले दिन कोलकाता के आनंदबाजार पत्रिका में एक भी विज्ञापन नहीं छपा था. ये तरीका था मीडिया संस्थान का अपने चहेते फिल्ममेकर को श्रद्धांजलि देने का. क्या आज किसी और फिल्ममेकर को इस तरह का ट्रिब्यूट मिलना संभव है.

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एडिटिंग मशीन पर (साभार: टंबलर)

पता नहीं था आस्कर इतना भारी होता है 

सत्यजीत की फिल्म में अपू का किरदार निभाने वाले सुभीर रॉय सत्यजीत बाबू को आखिरी बार देखने नर्सिंग होम पहुंचे. कुछ साल के बच्चे से 44 साल के अधेड़ में बदल चुके अपू को किसी ने नहीं पहचाना.

सुभीर रे के घर के बाहर जाकर लाइन में लग गए. बाबू को आखिरी बार देखना सबसे जरूरी था. बताते हैं कि रे के मकान से लेकर मुख्य सड़क तक जो गली जाती थी वो हफ्ते भर तक लोगों के लाए फूलों से भरी रही.

रे के शरीर को 10 घंटे तक जनता के आखिरी दर्शन के लिए रखा गया था. लोग आते और जाते रहे. जब गेट बंद हुआ तब भी 40,000 लोग दरवाजे के बाहर खड़े थे. अपनी मौत के बारे में सत्यजीत रे कहते थे कि वो इसकी परवाह नहीं करते.

उन्हें जब ऑस्कर मिला तो वे बिस्तर से उठने की स्थिति में नहीं थे. ट्रॉफी लेने के बाद अपने डॉक्टर से बोले, पता नहीं था कि ये इतना भारी होता है. उन्हें भारत रत्न भी मिला. रे ने सिर्फ इतनी प्रतिक्रिया दी, 'अवॉर्ड्स का सीजन चल रहा है.'

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अंतिम दर्शन (तस्वीर: आनंदबाजार पत्रिका)

रे अपने मरने पर किसी भी तरह के अंतिम संस्कार को मना कर गए थे. उनकी पत्नी और बेटे ने उन्हें अंतिम प्रणाम किया, 14 बंदूकों की सलामी दी गई और इसके बाद बिजली से चलने वाली भट्टी का दरवाजा बंद हो गया.

पीछे शहर खामोश खड़ा था, हाथ में तख्तियां लिए हुए, 'महाराजा तोमाके सलाम.' रे की मौत से दो हफ्ते पहले उनकी स्पीच ऑस्कर सेरेमनी में दिखाई गई थी, आप भी देखिए.

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