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दौड़ते-दौड़ते सांस फूल गयी ‘रनिंग शादी’ की

एक बिहारी लड़के और पंजाबी लड़की के इश्क की कहानी में काफी मजेदार ड्रामे की गुंजाइश थी

Ravindra Choudhary Updated On: Feb 18, 2017 05:13 PM IST

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दौड़ते-दौड़ते सांस फूल गयी ‘रनिंग शादी’ की

‘रनिंग शादी’ के लिये सबसे अच्छा शब्द है- होते-होते रह गया! फिल्म में काफी कुछ है, जो ‘होते-होते रह गया’ वाली फीलिंग देता है.

एक बिहारी लड़के और पंजाबी लड़की के इश्क की कहानी में काफी मजेदार ड्रामे की गुंजाइश थी, जो होते-होते रह गया.

कहानी यूं है

निम्मी (तापसी पन्नू) के पापा की अमृतसर में शादी-ब्याह के कपड़ों की दुकान है. दुकान पर बिहारी युवक रामभरोसे (अमित साध) सेल्समैन-कम-मुनीम है, जो इंटरनेट के कीड़े सरबजीत उर्फ साइबरजीत (अर्श बाजवा) के साथ रहता है.

निम्मी अपनी हर प्रॉब्लम के लिये भरोसे पर ही भरोसा करती है लेकिन सिर्फ दोस्त की तरह जबकि भरोसे उसे चाहता है.

एक रात भरोसे और साइबर लड़की के साथ भागने वाले लड़के को पिटता देखते हैं. बस, यहीं से भरोसे को ऐसी वेबसाइट बनाने का आइडिया आता है, जो भागकर शादी करने वालों की मदद करे. निम्मी की आर्थिक मदद से वे वेबसाइट बना लेते हैं और भागने वालों की शादी कराने लगते हैं.

उधर, भरोसे के उजाला मामा (बिजेंद्र काला) ने पटना में उसके लिए लड़की देख रखी है. एक दिन निम्मी की बेरुखी से उदास होकर भरोसे मामा को फोन करके बोल देता है कि बात पक्की कर दीजिये. तभी निम्मी भरोसे को धोखे से भगाकर ले जाती है- शादी करने के लिए! यहीं से सारी ‘भसूड़ी’ शुरू होती है. यह शब्द फिल्म में बार-बार आता है.

निम्मी वैसे तो बहुत बोल्ड है. शुरुआती सीन में ही भरोसे को बिंदास बोल देती है कि 'मैंने सेक्स किया है' और बिना किसी गिल्ट के अबॉर्शन भी करा लेती है.

हीरो को भी बात-बात पर ‘फट्टू’ बोलती रहती है. लेकिन अपने घरवालों को अपनी पसंद के बारे में नहीं बताती. यह बात थोड़ी अटपटी लगती है.

सिनेमाटोग्राफर से डायरेक्टर बने अमित रॉय की यह पहली फिल्म है. बेचारे अमित को जितनी मेहनत ‘रनिंग शादी’ बनाने में लगी होगी, उससे दोगुनी मेहनत उन्हें हर सीन से ‘डॉट कॉम’ हटाने में लग गयी होगी. जहां भी ‘डॉटकॉम’ शब्द आता है, वहीं पर किरदारों के होंठ ब्लर हो जाते हैं या बीप आ जाता है. इससे फिल्म में ‘माहौल’ बनने में बाधा पहुंचती है.

एक्टिंग

तापसी और अमित साध की जोड़ी अच्छी है और दोनों ने ठीक-ठाक काम किया है. हालांकि ज्यादातर फनी सिचुएशन और डायलॉग्स ब्रिजेन्द्र काला और पंकज झा के हिस्से में आई हैं और तालियां भी.

फिल्म का म्यूजिक अच्छा है और दिबाकर बैनर्जी की फिल्मों की याद दिलाता रहता है.

कुल मिलाकर, रनिंग शादी का स्टोरी आइडिया वास्तव में बहुत अनूठा है लेकिन फिल्म उतनी अनूठी नहीं बन पाई है. लेकिन फिर भी आप इसे देखते हुए ‘ओके जानू’ की तरह पकते नहीं हैं, यही इस फिल्म का ‘सेविंग प्वॉइन्ट’ है.

चूंकि फिल्म की टैग-लाइन है- ‘भगाएंगे हम, निभाएंगे आप’, इसलिए हम भी आपसे कहते हैं कि आप इस फिल्म के साथ निभा सकते हैं. तो हमारी तरफ से इस शादी को मिलते हैं 2 स्टार.

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