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REVIEW : भारतीय सिनेमा का एक नया प्रयोग है 'सचिन-अ बिलियन ड्रीम्स'

सचिन के फैंस के लिए ये एक जबरदस्त ‘विजुअल ट्रीट’ है

Kumar Sanjay Singh Updated On: May 27, 2017 12:57 AM IST

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REVIEW : भारतीय सिनेमा का एक नया प्रयोग है 'सचिन-अ बिलियन ड्रीम्स'

इंडिया में क्रिकेट केवल खेल भर नहीं है बल्कि यहां क्रिकेट को लेकर एक ऐसा जूनून जहां  धर्म जैसे बड़े मसले भी छोटे नजर आने लगते हैं. इसलिए सचिन तेंदुलकर पर बनी इस फिल्म को हम स्टार्स में नहीं बाटेंगे क्योंकि सचिन फाइव स्टार हैं और फाइव स्टार रहेंगे.

क्रिकेट अगर धर्म है सचिन रमेश तेंदुलकर एक धर्म के अनुयायियों के लिए भगवान हैं जिन्हें ऑनफील्ड और ऑफफील्ड दोनों जगह बड़ी श्रद्धा से पूजा जाता है.

कई खामियां भी हैं

लेकिन ऐसा लगता है कि सचिन के बड़े भक्तों में से एक रहे रवि भागचंड्का जो खुद भी पूर्व क्रिकेटर रह चुके हैं ने अपने भगवान की महिमा को फिल्मी शक्ल  देने से पहले इतिहास की चूकों पर ध्यान नहीं दिया. डॉक्यूमेंट्री में 30 करोड़ खर्च कर उसे फीचर फिल्म की तरह पेश किया जा सकता लेकिन कुछ छूट जाने का एहसास तो बना ही रहता है.

कामयाबी का शिखर, असफलता का दंश

निर्देशक जेम्स अर्स्किन की डॉक्यू  ड्रामा 'सचिन: ए बिलियन ड्रीम्स' में सचिन तेंदुलकर के क्रिकेट करिश्मे से अलग हटकर उन्हें एक व्यक्ति के तौर पर परखने की कोशिश की गयी है, जिसमें असफलता का दंश भी है तो कामयाबी का शिखर भी.

इस जर्नी के बीच सचिन के विशाल व्यक्तित्व को निरपेक्ष तरीके से देखने की कोशिश की गयी है.  फिल्म में सचिन की पूरी जर्नी के भागीदार जिनमें उनके पारिवारिक सदस्य भी हैं साथ ही वो खिलाड़ी भी जिनके साहचर्य में सचिन का कौशल फला -फूला पूरे इन्धनुषी व्यक्तित्व के साथ मौजूद हैं.

सचिन को फिल्म में बांधना मुश्किल

फिल्म में सचिन पूरी खूबियों और खामियों के साथ एक व्यक्ति के रूप में मौजूद हैं लेकिन इस व्यक्तित्व का करिश्मा इतना बड़ा है कि उसे 2 घंटे 19 मिनट की फिल्म में समेत पाना मुमकिन नहीं है.

बहरहाल सचिन: ए बिलियन ड्रीम्स एक फिल्म से ज्यादा एक कोलाज है जिसे दस हजार घंटे की फुटेज से चुनकर तैयार किया गया है. रवि भागचंड्का के दिमाग में ये आइडिया 2012 में ही आया था जिसे परदे पर उतरने में 5 साल का लंबा समय लग गया.

'सचिन-सचिन' एक मंत्र है

रवि भागचंड्का की मानें तो सचिन को लेकर लोगों की अपनी-अपनी अलग-अलग राय है.  ये फिल्म सचिन को लेकर मेरी निजी राय है. फिल्म में सचिन के क्रिकेट जीवन के कई दिलचस्प घटनाओं मसलन वेंकटेश प्रसाद और आमिर सोहेल का किस्सा, सचिन और शेन वार्न की टक्कर, पिता के निधन  के बाद दोबारा वर्ल्ड कप टीम ज्वाइन करना, शारजाह कप, सौरव गांगुली का हवा में टी शर्ट घुमाना, 2003 में फिक्सिंग कॉन्ट्रोवर्सी के बाद द्रविड़ और लक्ष्मण के बीच बड़ी साझेदारी की बदौलत आस्ट्रेलिया को हराना और साथ ही 2011 का वर्ल्ड कप जीतना आदि के जरिये रोमांच बनाए रखने की पूरी कोशिश की गई है.

भारतीय सिनेमा का नया प्रयोग

विनोद कांबली और अंजलि तेंदुलकर प्रकरण फिल्म में अतिरिक्त आकर्षण जोड़ते हैं. ये सब ऐसी घटनाएं हैं जो क्रिकेट देखने और समझने वाले हर दर्शक को मुंहजुबानी याद हैं लेकिन आज की पीढ़ी के लिए सचिन के इस करिश्मे से अभिभूत होने के पूरे क्षण फिल्म में मौजूद है.

ये फिल्म भारतीय सिनेमा में एक नया प्रयोग है जिसके अपने जोखिम भी हैं लेकिन निर्माता की मानें तो सचिन रीयल लाइफ के बाहुबली हैं, उन्होंने इस फिल्म के जरिये सचिन तेंदुलकर के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की है. ऐसे में फायदे या नुकसान  का सवाल ही नहीं उठता.

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