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सरकार 3 रिव्यू: अकेले राम गोपाल वर्मा ले डूबे सबको

राम गोपाल वर्मा की फिल्म सरकार 3 रिलीज हो गई है, अमिताभ, मनोज बाजपेयी और दूसरे कलाकारों को रामू साध नहीं पाए

Kumar Sanjay Singh | Published On: May 12, 2017 11:22 AM IST | Updated On: May 12, 2017 11:22 AM IST

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सरकार 3 रिव्यू: अकेले राम गोपाल वर्मा ले डूबे सबको

राम गोपाल वर्मा के गैर संजीदा ट्विट्स ने उनके बारे में लोगों के बीच एक सस्ती सी राय बना दी है. उनके निर्देशन में बनी 'सरकार 3' देखने के बाद रामगोपाल वर्मा की निजी शख्सियत को समझने में थोड़ी और आसानी होगी.

पहली दोनों फिल्मों से कमजोर

'सरकार 3' पहले की दोनों फ्रेंचाइजी के मुकाबले थोड़ी कमजोर नजर आती है क्योंकि इस फिल्म में काफी कुछ पहले के मुकाबले बदला हुआ है, जिसमें सबसे बड़ा बदलाव सरकार बने अमिताभ बच्चन की आवाज है.

'आवाज' की गलती

बिग बी ने अपनी आवाज का गियर इससे पहले 'अग्निपथ' के लिए बदला था और वो अनुभव किसी के लिए सुखद साबित नहीं हुआ शायद फिल्म की चार रीलों के बाद बिग बी और रामू दोनों को ये बातें समझ में आ गयी और बच्चन साहब अपनी आवाज में वापस लौट आए.

फिल्म पर रामू की जबरदस्त पकड़

'सरकार 3' में सबसे बड़ा बदलाव ये आया कि अब सुभाष नागरे हथियार भी उठा लेता है जबकि पहले उनकी जुबान ही हथियार से ज्यादा खतरनाक दिखाई देती थी. इन बदलावों के बीच जो कुछ नहीं बदला वो है फिल्म पर निर्देशक की पकड़. पूरी फिल्म पर निर्देशक की जबरदस्त पकड़ दिखाई देती है. चुस्त एडिटिंग ने उनका काम और आसान कर दिया है.

कमजोर है कहानी

कहानी की बात करें तो ये इसका सबसे कमजोर पहलू है. रहस्य रोमांच से भरी इस कहानी में किरदारों का मसखरापन फिल्म की संजीदगी को कम कर देता है. कहानी के नाम पर फिल्म में जो कुछ है वो ये है कि सरकार का पोता शिवाजी नागरे वापसी करता है और सरकार के काम करने के स्टाइल पर पैनी नजर रखता है.

ट्विस्ट एंड टर्न से भरी स्टोरी

शिवाजी की गर्लफ्रेंड अनु अपने पिता की मृत्यु का बदला सरकार से लेना चाहती है और उसके लिए शिवाजी की मदद लेना चाहती है. सरकार के काफी करीबी गोकुल और गोरख कुछ ऐसा कर जाते हैं, जिसकी वजह से कहानी में बहुत सारे ट्विस्ट टर्न्स आते हैं, साथ ही नेता देशपांडे और बिजनेसमैन माइकल वाल्या की एंट्री होती है. वाल्या सरकार को इसलिए खत्म करना चाहता है क्योंकि वो उसकी राह का रोड़ा साबित हो रहे हैं.

अति आत्मविश्वास के मारे रामू

लेकिन सरकार तो सरकार ठहरे. वाल्या अपने इसी मंसूबे के साथ मारा जाता है. कहानी को लेकर रामू अति आत्मविश्वास का शिकार नजर आये. शायद उन्हें लगा हो बिग बी जैसे बडे स्टार की शख्सियत इस कमी को ढक लेगी लेकिन हुआ इसका उलटा.

एक्टिंग के साथ नहीं हुआ न्याय

कमजोर स्क्रिप्ट के कारण खुद बिग बी कई जगह लाचार और बेबस नजर आए, जिसे उन्होंने बर्फ जैसी ठंडी खामोशी से ढकने की कोशिश जरूर की है. फिल्म की कहानी के ट्विस्ट और टर्न ऐसे हैं कि कभी-कभी आपको वेदप्रकाश शर्मा मार्का नॉवेल की याद आएगी.

कुछ किरदार तो इतने लाउड नजर आते हैं कि ऐसा लगता है वो फिल्म में नहीं बल्कि रंगमंच पर खड़े है. 'सरकार 3' में मुख्य किरदार यानि सुभाष नागरे की गरिमा के न्याय नहीं किया गया. सुड़क-सुड़ककर चाय पीता, बेतरीब बालों और बगैर फ्रेम के चश्मे में नागरे अपनी आंखों में सत्ता का लालच छुपा नहीं पाता हालांकि बीच-बीच में प्रजातंत्र की दुहाई भी देता है.

मनोज बाजपेयी ने करवाई फजीहत

अगर नागरे की मंशा समझ में आ ही जाए तो फिर राजनीति कैसी? मनोज बाजपेयी ने उभरते हुए नेता देशपांडे के रोल में अपनी खूब फजीहत करवाई है. ऐसा लगता है कि रामू अपने इस शार्गिद से निजी खुन्नस को अब तक भूल नहीं पाए और मनोज बाजपेयी अपने मेंटॉर के पुराने एहसान के नीचे कुचल गए.

मनोज बाजपेयी इससे कहीं ज्यादा के हकदार थे. इसी से मिलता-जुलता किरदार उन्होंने प्रकाश झा की फिल्म 'राजनीति ' में निभाया था और भारी भरकम स्टारकास्ट के बावजूद वो फिल्म का सारा क्रेडिट ले गए थे. सवाल रोल का नहीं निर्देशक की नीयत का है. बाजपेयी को फिल्म में पूरी तरह से जाया किया गया है.

अमित साध रहे नाकाम

शिवाजी नागरे का किरदार अमित साध के एक्टिंग कैलिबर से कहीं ज्यादा बड़ा था हालांकि उन्होंने इस किरदार का बोझ संभालने की पूरी कोशिश की लेकिन ज्यादा बोझ के कारण एक्सपोज गए.

फीकी हैं यामी गौतम

यामी गौतम से ज्यादा तालिया तो वाल्या यानि जैकी श्रॉफ की माशूका बटोर ले गयी. एक्टिंग की तो छोड़िये यामी गलैमर का तड़का भी नहीं लगा पाई. रोनित रॉय ने रुटीन रोल में अपना काम बखूबी किया. जैकी श्रॉफ को फिल्म के मेन विलेन के रोल में पेश किया गया है लेकिन ये विलेन डराता कम हंसाता ज्यादा है. निर्देशक ने उनके किरदार को गढ़ने से ज्यादा उन्हें जवान दिखाने में अपनी ऊर्जा खर्च की है. बावजूद इसके जैकी श्रॉफ फिल्म में असरदार लगे हैं.

बस एडिटिंग कमाल की है

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसकी एडिटिंग है. हालांकि शुरुआत में किरदारों को स्टैब्लिश करने में कुछ ज्यादा समय लिया गया है. बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म के मुताबिक भी है लेकिन कभी-कभी ज्यादा लाउड हो जाता है. बतौर निर्देशक रामगोपाल वर्मा में अभी काफी संभावनाएं बाकी हैं, बशर्ते वो अपनी निजी सोच को काम पर हावी ना होने दें. वैसे भी सरकार व्यक्ति से ज्यादा एक सोच ही तो है.

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