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Review पार्टीशन: भारत के बंटवारे की कहानी को आप मिस नहीं कर सकते

गुरिंदर चड्ढा की ये फिल्म पूरी तरह से कसी हुई और मनोरंजक है

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Abhishek Srivastava Updated On: Aug 17, 2017 03:44 PM IST

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Review पार्टीशन: भारत के बंटवारे की कहानी को आप मिस नहीं कर सकते
निर्देशक: गुरिंदर चड्ढा
कलाकार: ह्यू बानविल, हुमा कुरैशी, डेंजिल स्मिथ, तनवीर घनी, नीरज काबि

गुरिंदर चड्ढा की पार्टीशन - 1947 एक महत्वपूर्ण फिल्म है इस बात में कोई शक नहीं है. इस फिल्म को देखकर बेहद आश्चर्य होता है कि फिल्म ने जिस मुद्दे को छुआ है उसको उठाने में इतने साल लग गये. ताज्जुब और भी होता है जब इस बात का इल्म होता है कि इसको बनाने वाली गुरिंदर चड्ढा है जिनका बेस बालीवुड नहीं है बल्कि वो लंदन से काम करती हैं.

अभी तनिक और रुकिये आश्चर्यचकित होने का सिलसिला अभी खत्म नहीं हुआ है. इस फिल्म को बनाने वाले हिंदुस्तानी नहीं बल्कि यूरोप की मशहूर और प्रतिष्ठित प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी पाथे है जिसको साथ मिला है बीबीसी फिल्मस और ब्रिटिश फिल्म इंस्टीट्यूट का. ये अफसो‍सजनक और शर्मनाक बात है कि देश के विभाजन के पहले कौन कौन सी ताकतें काम कर रही थीं और इसमें किस तरह की राजनीति हुई थी, इस बात को कहने की जहमत बालीवुड के किसी फिल्ममेकर ने पहले नहीं उठाई.

पार्टीशन - 1947 की कहानी का दायरा बेहद ही छोटा है. ये फिल्म शुरू तब होती है जब लार्ड माउंटबेटन हिंदुस्तान आते हैं और खत्म होती है जब बंटवारे की विभीषिका दोनों देशों को जला देती है. इस बात का इल्म बेहद ही कम लोगों को होगा कि जब देश का बंटवारा हिंदुस्तान और पाकिस्तान में हुआ था तब सीरिल रैडक्लिफ ने दिल्ली आकर महज एक लाइन नहीं खींची थी.

लाइन खींचने के पहले भी राजनीति हुई थी और इसमें उस वक्त विन्सटन चर्चिल और तबके ब्रितानी प्रधानमंत्री क्लिमेंट एटली भी इसमें मिले हुये थे. विभाजान का जो प्लान सीरिल रैडक्लिफ को मिला था उसे चर्चिल ने दो साल पहले ही तैयार कर लिया था यानि की कम शब्दों में कहे तो विभीजन के पीछे कुछ लोगों की मिली भगत थी और उन्हें अपना उल्लू सीधा करना था. उन्हें इस बात का पता नहीं था कि इसके दूरगामी परिणाम कई पीढ़ियों को झेलना पडेगा. गुरिंदर चड्ढा की ये फिल्म इस लिहाजे से एक महत्त्वपूर्ण फिल्म बन जाती है.

इस फिल्म में कुछ नामचीन ब्रिटिश कलाकारों की फौज है. लार्ड माउंटबैटन की भूमिका में ह्यू बानविल है जो इसके पहले अपने मशहूर टीवी सीरीज डांटन ऐबी में राबर्ट क्राली की भूमिका निभाकर पूरी दुनिया में मशहूर हो चुके है. गिलिएन एंडरसन उनकी पत्नी एडविना माउंटबैटन रोल में है और उनके सुप्रसिद्ध सीरीज द एक्स फाईल्स को भला कोई कैसे भूल सकता है. जिन्ना के रोल में डेंजिल स्मिथ, नेहरू के रोल में तनवीर घनी और गांधी के रोल में नीरज काबि पूरी तरह से सटीक बैठे है.

कहानी शुरू होती है लार्ड माउंटबेटन के हिंदुस्तान आने से जहां पर खानसामो की पूरी फौज है उनकी और उनकी पत्नी की खातिरदारी के लिये. वही पर जीत यानि की मनीष दयाल और आलिया यानि की हुमा कुरैशी उनके लिये काम करते है. भले ही फिल्म में इस बात को ना  बताया गया हो लेकिन कहानी इन दोनों की ही वजह से आगे बढ़ती रहती है. माउंटबैटन की परेशानी, सीरिल रैडक्लिफ की तकलीफ, ब्रिटिश सरकार की दखलंदाजी, जिन्ना की जिद और गांधी  का घुटने टेकना ये सब कुछ फिल्म में बताया गया है और फिल्म सिले सिलेवार तरीके से इन्ही सब चीजों की मदद से आगे बढ़ती है.

विभाजन के प्लान की पृष्ठभूमि में इन दोनों की कहानी नेपथ्य में ही रहती है लेकिन बदस्तूर चलती रहती है. सभी ने फिल्म में शानदार काम किया है और अपने सटीक अभिनय से बताने में सफल रहे है कि अगर किसी का पुरे प्रकरण में भारी नुकसान हुआ था तो वो दोनों देशों की जनता ही थी. जान मान की हानि दोनों तरफ के लोगों को हुई थी.

इस फिल्म में एक और कमाल बात ये भी है कि लोकेशन्स का ज्यादा इस्तेमाल नहीं किया गया है इस फिल्म में. जो कुछ भी है वो माउंटबैटन रेसीडेंस की चारदीवारी में ही होता है. उस लिहाज से ये फिल्म डायलाग्स से भरी पडी है और जो लोग एक्शन यानि की इस बात में विश्वास करते है की हमेशा पर्दे पर कुछ ना कुछ होते रहना चाहिये तो उनको इस फिल्म से निराशा हो सकती है.

लेकिन इस फिल्म से लोग बोर होंगे,  इस बात की मुझे कम ही उम्मीद है. इस फिल्म की विजय इसकी सिंप्लिसिटी में है, कुछ भी फिल्म में ओवर द टाप नहीं है और इसीलिये लगता है कि जो घटनाक्रम हमारे देश में आजादी मिलने के ठीक पहले चारदीवारी के अंदर हुई थी हम उन्हीं को दोबारा देख रहे है.

ये फिल्म नरेंद्र सिंह सरिला और डामिनीक लापियर की किताबों पर आधारित है और 104 मिनट की ये फिल्म आपको बांध कर रखती है. यहां पर दाद देनी पड़ेगी गुरिंदर की जो बेंड इट लाईक बेक्हम से बिल्कुल हट कर इस तरह के विषय वस्तु पर भी उनको महारत हासिल है इस बात को सिद्ध करती है.

सही मायने में ये फिल्म गुरिंदर के डायरेक्शन के गुणों की विजय है. विभाजन के दौरान गुरिंदर के परिवार को भी झेलना पडा था और इस फिल्म का जन्म उसी पीडा में छुपा हुआ है. ये फिल्म आपको बतायेगी की राजनीति की वजह से कैसे एक देश दो में बट गया और इसके परिणाम कितने भयावह थे. अगर आपको इतिहास में रंचमात्र भी दिलचस्पी है तो आप पार्टीशन - 1947 को एक बार जरूर देंखे.

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