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गन्स एंड थाइज: अंडरवर्ल्ड का थ्रिल, वेब सीरीज की आजादी और अंडरवर्ल्ड के रामू

अपनी वेब सीरीज गन्स एंड थाइज के जरिए डिजिटल इंडस्ट्री में एंट्री ले रहे हैं रामगोपाल वर्मा.

Seema Guha Updated On: May 31, 2017 03:56 PM IST

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गन्स एंड थाइज: अंडरवर्ल्ड का थ्रिल, वेब सीरीज की आजादी और अंडरवर्ल्ड के रामू

रामगोपाल वर्मा ने अंडरवर्ल्ड पर कई बेहद कामयाब फिल्में बनाई हैं. सत्या, कंपनी, सरकार सीरीज, D. वर्मा को गैंगस्टर की दुनिया में रहस्य और तिलिस्म नजर आता है. उनकी नजर में आम परिवारों की कहानियां उबाऊ होती हैं.

अब वो डिजिटल दुनिया के लिए फिल्में बनाने जा रहे हैं. लेकिन यहां भी वो मुंबई माफिया पर आधारित कहानियों पर ही काम करेंगे. वो डिजिटल स्क्रीन के लिए अंडरवर्ल्ड की सबसे चर्चित दुश्मनियों की कहानियों को बयां करेंगे.

मसलन अस्सी के दशक में हाजी मस्तान और करीम लाला की दुश्मनी. उनकी वेब सीरीज 'गन्स ऐंड थाइज' उन लड़ाइयों पर आधारित है जिसने मुंबई के अंडरवर्ल्ड को तबाह कर दिया.

फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में रामगोपाल वर्मा ने कहा कि वो अपनी वेब सीरीज में बॉलीवुड सितारों के अंडरवर्ल्ड कनेक्शन को भी दिखाएंगे. उनकी ये वेब सीरीज दस-दस एपिसोड के चार सीजन में आएगी.

क्या आपने अपनी कहानियों को और बोल्ड बनाने के लिए बड़े पर्दे की जगह डिजिटल माध्यम चुना?

फिल्मकार के तौर पर मेरा काम कहानी कहना है. इसके बाद हमारी कोशिश कहानी को बेहद असरदार तरीके से कहने की होती है. बड़े पर्दे के लिए फिल्में बनाने में कई पाबंदियों के दायरे में काम करना पड़ता है. कई बार सेंसर बोर्ड की बंदिशें होती हैं, तो कई बार हमें दर्शकों का खयाल रखना पड़ता है. इसके बाद कानूनी और कारोबारी पहलुओं का ध्यान भी रखना पड़ता है. और भी कई बातें होती हैं.

लेकिन जब आप वेब पर कहानी बता रहे होते हो, तो आप सिर्फ एक आदमी को कहानी सुनाते हो. तब आपको सोचना पड़ता है कि वो एक शख्स आपकी कहानी में दिलचस्पी ले रहा है या नहीं. क्या उसे इस बात का अंदाजा है कि वो क्या देखने वाला है? आप जितने असरदार तरीके से उसे अपनी कहानी सुना सकें, उतना ही अच्छा.

मुझे अंडरवर्ल्ड के बारे में काफी जानकारी है. इससे मुझे काफी तसल्ली मिलेगी. जब मैं वेब पर अपने तरीके से कहानी सुना सकूंगा. मुझे ये फिक्र नहीं करनी होगी कि लोग इसे देखकर कैसी प्रतिक्रिया देंगे. अगर आप भाषा या तस्वीरों के हवाले से भी देखेंगे, तो भी इसे एक खास तरीके से किया जाता है. इसे हल्का करने के पेश करने से कहानी से नाइंसाफी हो जाती है.

पहली बार हमने स्क्रीन पर न्यूड तस्वीरें, शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन में देखी थीं. ये बात भी 25 साल पुरानी हो गई. ये एक खास संदर्भ में दिखाई गई थी. पहली बार आपने स्क्रीन पर गाली शायद 1998 की फिल्म सत्या में सुनी होगी. ये भी कहानी को ध्यान में रखकर शामिल की गई थी. हम जब ऐसा करते हैं तो एक खास दुनिया के किरदारों को जीवंत बनाने के लिए करते हैं. ये नंगी तस्वीरें, ये गालियां उस दुनिया का अटूट हिस्सा होती हैं.

जो भी मेरी सीरीज 'गन्स ऐंड थाइज' देखेगा, इसके नाम से ही उसे समझ में आएगा कि आखिर इसमें उसे क्या देखने को मिलने वाला है. हर इंसान अपनी पसंद-नापसंद के हिसाब से तय करेगा कि उसे ये देखना है या नहीं. आजादी यही तो है. अपनी पसंद के हिसाब से काम करना.

आपने पहली बार कल्पनाशीलता को कई पाबंदियों से आजाद किया है. महिलाओं की न्यूड तस्वीरें अभी तो भारत की वेब सीरीज में भी नहीं दिखती. आपने इस मुद्दे पर कैसे काम किया? आपके कलाकारों को इसके लिए क्या तैयारी करनी पड़ी? आपने उन्हें कैसे तैयार किया?

जब मैं कलाकारों से मिला, मैंने उन्हें साफ तौर पर अपने इरादों के बारे में बता दिया. पहली बात तो ये कि वेब सीरीज डिजिटल दुनिया के लिए है. ये किसी खास इलाके के लिए नहीं होती. डिजिटल वर्ल्ड अलग ही दुनिया है. मैं इस पर कोलंबिया के ड्रग माफिया पर बन रही सीरीज नार्कोज यहां बैठकर देख सकता हूं. दक्षिण भारत में भी लोग इसे सब-टाइटिल के साथ देख सकते हैं.

जब आप डिजिटल दुनिया के लिए काम कर रहे हैं. वेब सीरीज बना रहे हैं, तब आपको सिनेमा के नजरिए से नहीं सोचना पड़ता. तब आपको सिर्फ एक खास तबके या इलाके के बारे में नहीं सोचना होता. हो सकता है कि आपको 500 लोग कोलंबिया में देख रहे हों. वहीं बैंगलोर में सिर्फ 5 लोग आपको देख रहे हैं.

डिजिटल दुनिया में ऐसा ही हो रहा है. मैंने ये बात अपने कलाकारों को बताई. जो लोग शूटिंग में शामिल थे, उन्हें भी ये बात समझाई. उन्हें मेरी बात समझ में आई. उन्हें मुझ पर पूरा ऐतबार था.

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हम 90 के दशक में सुना करते थे कि बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के बीच गहरा नाता है. आप आज अपनी वेब सीरीज में इस बात के जरिए दर्शकों को कैसे जोड़ेंगे?

मुझे नहीं लगता कि आज अंडरवर्ल्ड में लोगों की इतनी दिलचस्पी है. आज अंडरवर्ल्ड हाशिए पर जा चुका है. ऐसा 2005 में ही हो चुका है. मिसाल के तौर पर अमेरिका में 1920 के दशक में माफिया ने पांव पसारने शुरू किए थे. 1956 का दौर आते-आते अमेरिका में माफिया का दौर खत्म हो चुका था. गॉडफादर फिल्में भी सत्तर के दशक में बनी थीं. यानी कहानी अपने दौर के हिसाब से ही चलती है.

जब मैंने सत्या बनाई थी, तब लोग पूछते थे कि आखिर मुझे अंडरवर्ल्ड की इतनी समझ कैसे है? मैंने किरदारों को इतने सच्चे तरीके से कैसे पेश किया? सवाल ये है कि उन्हें क्या पता कि ये सच्चे किरदार हैं? असल में उस वक्त वो फिल्म के सीन से जज्बाती जुड़ाव महसूस कर रहे थे. इसी वजह से सत्या फिल्म और उसके किरदार उन्हें असली लगे. हमने वॉयस ओवर के जरिए अंडरवर्ल्ड के मुंबई में बढ़ते दखल के बारे में बताया था.

1995 से 2005 के बीच मुंबई में अंडरवर्ल्ड के जुर्म बहुत बढ़ गए थे. इसकी वजह ये थी कि ‘डी’ कंपनी में फूट के बाद कई सारे गैंग बाजार में अपना दखल बढ़ाना चाहते थे. जैसे कोई कंपनी बिखरती है तो इसके तमाम साझीदार बाजार में अपना-अपना हिस्सा बढ़ाने लगते हैं. अंडरवर्ल्ड में भी वैसा ही हो रहा था. इसी से नए हालात बनते हैं. नए किरदार सामने आते हैं. नयी तस्वीर नजर आती है.

एक और बात, हमेशा से ये सोचा जाना कि अंडरवर्ल्ड और बॉलीवुड के बीच कनेक्शन है, गलत था. अंडरवर्ल्ड ने कभी भी फिल्म इंडस्ट्री में पैसा नहीं लगाया. अगर अंडरवर्ल्ड को पैसा ही लगाना होता तो वो फिर काहे का अंडरवर्ल्ड? अक्सर ऐसी बातें पब्लिसिटी के लिए उड़ाई जाती थीं. लोगों को इसमें लुत्फ आता था. इसके जरिए लोग बड़े सितारों और निर्माताओं को डराते थे. वो फोन कॉल करके दोस्तों की मदद करते थे.

अंडरवर्ल्ड उस वक्त सुर्खियों में रहना चाहता था. उन्हें पब्लिसिटी पसंद थी. लेकिन जब एनकाउंटर करने वालों ने क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट बनाई तो वो गैंगस्टरों के पीछे पड़ गई. 2004 तक ज्यादातर गैंगस्टर मारे जा चुके थे. बड़े माफिया की ताकत कमजोर हो गई थी. 2005 में एनकाउंटर स्क्वाड को ही खत्म कर दिया. मतलब उस वक्त तक अंडरवर्ल्ड की ताकत पूरी तरह से खत्म हो चुकी थी.

आपने आम तौर पर अपराध पर आधारित फिल्में ही बनाई हैं. क्या आपको कभी धमकियां मिली हैं? आप जिन कहानियों को लेकर चलते हैं, उनमें ये जोखिम तो रहता है न?

अगर मैं अब तक जिंदा हूं, इसका तो यही मतलब है कि मुझे कोई खतरा नहीं था. अंडरवर्ल्ड को मेरे फिल्म बनाने से क्या दिक्कत होगी भला? अंडरवर्ल्ड तो गैरकानूनी कारोबार के संगठन हैं. वो कोई आतंकवादी थोड़े हैं, जो विचारधारा की लडाई लड़ रहे हैं. इसीलिए वो आमतौर पर फिल्में बनाने पर ऐतराज नहीं जताते. अगर कोई बात गलत दिखाई जाती है तो वो उसका विरोध करते हैं.

इसके अलावा अंडरवर्ल्ड को फिल्मों से आमतौर पर कोई ऐतराज होता नहीं. जैसे मैं किसी कारोबारी पर फिल्म बनाऊंगा तो वो मुझसे खफा नहीं होगा. यही अंडरवर्ल्ड की फिल्मों के साथ भी होता है.

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आपने अपनी वेब सीरीज के लिए नए कलाकार ही क्यों चुने हैं?

मैं अपनी वेब सीरीज में सच्चाई को एकदम करीब से दिखाना चाहता था. मुझे लगा कि मैं अगर नामी कलाकारों के साथ ये काम करूंगा, तो लोगों को उन्हें देखते ही लगेगा कि वो कोई रोल निभा रहे हैं. लेकिन अनजान कलाकार एक दम सच्चे लगेंगे. ऐसा तजुर्बा मैंने सत्या फिल्म में किया था. अगर मैं उस वक्त सत्या में नामी कलाकारो को लेता, तो उसे इतनी कामयाबी नहीं मिलती.

क्या आपको लगता है कि आज के दौर में अपनी बात खुलकर कहने से दिक्कत हो जाती है? आप ट्रॉलिंग के शिकार हो जाते हैं? (रामगोपाल वर्मा ने हाल ही में ट्विटर को अलविदा कहा था)

मुझे लगता है कि सोशल मीडिया सिर्फ शोर है. इसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लेना चाहिए. हम सबको संविधान के मुताबिक बोलने की आजादी है. सोशल मीडिया के जरिए आप चीख सकते हैं. लेकिन किसी ने अगर इस चीख को गंभीरता से लिया, तो वो आपको ब्लॉक कर सकता है. अनफॉलो कर सकता है. सोशल मीडिया को गंभीरता से लेना गलत है. ये दीवार पर बने चित्र जैसा है.

हमारी फिल्मों में अंडरवर्ल्ड और सेक्स को इतनी अहमियत क्यों दी जाती है?

ताकत और सेक्स कुदरत में सबसे ज्यादा असरदार चीजें हैं. जब भी लोग ताकतवर होते हैं, वो वही काम करते हैं, जिसे वो दूसरों को करने से मना करते हैं. मैंने इसीलिए अपनी सीरीज का नाम गन्स ऐंड थाइज रखा है. क्योंकि ये नाम ताकत और सेक्स का मुजाहिरा करता है. ये राजनीति और अपराध के अहम तत्व हैं.

आपके हिसाब से वेब सीरीज के लिए डिजिटल दुनिया में कितनी गुंजाइश है?

डिजिटल दुनिया ही भविष्य है. इसमें कोई शक नहीं. आप मिसाल के तौर पर नेटफ्लिक्स को ही लीजिए. इसकी नार्कोज और हाउस ऑफ कार्ड्स जैसी सीरीज बेहद लोकप्रिय हो रही हैं. आज जब मैं लोगों से मिलता हूं, वो पूछते हैं कि मैं कौन सी सीरीज देख रहा हूं. वो ये नहीं पूछते कि मैं कौन सी फिल्म देख रहा हूं. ये चलन तेजी से फैल रहा है.

हम यहां दो घंटे की फिल्म बनाने से डरते हैं. वहीं लोग लगातार बारह घंटे तक वेब पर नार्कोज़ देखते रहते हैं. मतलब उसका कंटेंट बेहतरीन है. दिलचस्प है. जब आप वेब सीरीज देख रहे होते हैं, तो आपकी सोच एकदम बदल जाती है. आप फर्स्ट हाफ, इंटरवल और सेकेंड हाफ में बांटकर नहीं देखते. आप कहानी को अपने तरीके से सुना सकते हैं. आपको जैसे भी दिलचस्प लगे उस तरह कहानी बुन सकते हैं.

आप वेब सीरीज का निर्देशन कैसे करते हैं?

रिसर्च के दौरान मेरी बात पुराने पुलिस अफसरों से हुई, गैंगस्टरों से हुई. कुछ दलालों से भी मुलाकात हुई. मुझे लगता था कि इतनी जानकारी एक फिल्म में समेटना मुश्किल है. फिल्में अभी भी पुराने तरीके से ही बनाई जा रही हैं. मैं जो भी दिखाता हूं वो एकदम सच्चा है. मैंने पिछले कुछ सालों में जो भी सुना है, वही बताता हूं. मैं अपने सूत्रों के नाम छुपाने के लिए किरदारों के नाम भर बदल देता हूं.

मैंने गैंगस्टरों के साथ काफी वक्त बिताया है. कई बार इसमें जज्बात भी शामिल हो जाते हैं. मैं समझने की कोशिश करता हूं कि जब कोई अपराधी पहली बार किसी को गोली मारता है, तो उसे कैसा महसूस होता है. मैं हर घटना के जज्बात और मनोवैज्ञानिक पहलू को तलाशने की कोशिश करता हूं. अंडरवर्ल्ड और अपराध की कहानियों में मेरी जबरदस्त दिलचस्पी है. मुझे आम परिवारों के किस्से बोर करते हैं. मैं अंडरवर्ल्ड का शैदाई हूं.

तो क्या आप बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के रिश्ते को भी दिखाएंगे?

बिल्कुल. लेकिन मैं अभी इसका खुलासा नहीं करूंगा.

आखिर में, सरकार-3 के साथ क्या ऐसा हुआ कि फिल्म पिट गई?

किसी चीज का पोस्टमार्टम करने से कुछ हासिल नहीं होगा. आखिर में लोग अपनी सोची हुई बात पर ही यकीन करेंगे. इसलिए इस बात की चर्चा करना ही बेकार है.

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