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Review मुन्ना माइकल : साबिर और टाइगर, काठ की हांड़ी बार-बार नहीं चढ़ती

लगता है ये फिल्म राइटर नहीं, प्रोड्यूसर ने लिखी है.

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Abhishek Srivastava Updated On: Jul 22, 2017 02:06 PM IST

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Review मुन्ना माइकल : साबिर और टाइगर, काठ की हांड़ी बार-बार नहीं चढ़ती

कलाकार - टाइगर श्राफ, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, निधि अग्रवाल

निर्देशक - साबिर खान

अमूमन हिंदी फिल्मों की प्रेस स्क्रीनिंग गुरुवार को हो जाती है लेकिन कई फिल्में ऐसी भी होती हैं जो अपनी स्क्रीनिंग शुक्रवार को रखती है. इसके पीछे की वजह क्या हो सकती है इस पर ज्यादा रोशनी डालने की जरुरत नही होनी चाहिए.

कम शब्दों में कहें तो इसका मतलब ये होता है कि निर्माता को अपनी फिल्म पर खुद ही भरोसा नही होता है और मुन्ना माइकल निर्माता के इस डर पर पूरी तरह से खरी उतरती है. फिल्म से अगर नवाजुद्दीन सिद्दीकी के अभिनय और टाइगर श्रॉफ के डांसिंग स्किल को निकाल दे तो इसमें देखने के लिए कुछ भी नही है. यही दो चीजें हैं जिसकी वजह से आप फिल्म देखने के लिए रुक जाते है वर्ना ये फिल्म सत्तर की उन बकवास कमर्शियल फिल्मों की याद दिलाती है जिनका काम ही था- माथे में दर्द ले आना.

स्टीरियोटाइप कहानी के स्टीरियोटाइप्ड कैरेक्टर

फिल्म की कहानी मुन्ना यानी कि टाइगर श्रॉफ के बारे में है. उसके पिता माइकल के रोल में हैं रोनित राय. माइकल एक फेल्ड आर्टिस्ट है फिल्मों में. मुन्ना को नाचने की सनक है और माइकल जैक्सन की लगभग पूजा करता है. मुन्ना में नाचने के गुर इस तरह से भरे है कि वो लोकल लेवल पर क्लब के सारे डांस कॉम्पटिशन में अपने दोस्तों के साथ मिलकर फतह हासिल कर लेता है और इसकी वजह से सारे क्लब में उसकी एंट्री बंद हो जाती है.

मुन्ना को मुंबई छोड़कर दिल्ली रुख करना पड़ता है और वहां पर एक क्लब में एक हादसे की वजह से उसकी मुलाकात होती है महेंद्र फौजी, जिसका रोल नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने किया है. महेंद्र दिल्ली का एक लोकल लेवल का हरयाणवी गुंडा है जिसका काम है अवैध तरीके से जमीन हड़पना. महेंद्र इसी शर्त पर मुन्ना को छोड़ता है कि वो उसे नाच के गुर सिखायेगा.

 

एक्शन सीक्वेंस में टाइगर.

एक्शन सीक्वेंस में टाइगर.

नाच की सनक महेंद्र को इसलिये है क्योंकि वो एक क्लब डांसर दीपिका शर्मा को लेकर एकतरफा प्यार में पागल है. दीपिका का किरदार फिल्म में नवोदित निधि अग्रवाल ने निभाया है. किस्मत करवट लेती है और मुन्ना भी दीपिका के प्यार में पड़ जाता है. आखिर में सभी परतों से पर्दा उठता है और कहानी कमर्शियल फिल्मों के ग्रामर पर खरी उतरती है.

इस फिल्म के स्क्रिप्ट को हम एक कन्वीनियंट स्क्रिप्ट भी कह सकते हैं यानी कि सब कुछ फिल्म में मसाला डालने के हिसाब से लिखा गया है. फिल्म के अगले मिनट में क्या होने वाला है, ये आप फौरन भांप सकते हैं और अगर बात यही है तो फिर फिल्म में मजा कैसा.

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एक्टिंग का जिम्मा बस नवाज के सिर

टाइगर श्रॉफ अभिनय की भाव भंगिमाएं के हिसाब से एक लिमिटेड एक्टर हैं, इसमें कोई शक नही है और उनकी सबसे बड़ी काबलियत यही है कि अपने शानदार एक्शन और नाचने के अंदाजा से अपने बाकी ऐब को छुपा लेते हैं. नवाज इस फिल्म में भी फॉर्म में हैं और फिल्म देखने की सबसे बड़ी वजह वही है लेकिन इस बात को भी हम इग्नोर नही कर सकते है कि नवाज की वो चीजें फिल्म में नही दिखाई देंगी, जिसके लिए वो जाने जाते हैं. आपको लगेगा कि आप कुछ ना कुछ मिस कर रहे हैं.

निधि अग्रवाल की ये पहली फिल्म है और उनका अभिनय भी औसत दर्जे का है. टाइगर ने कुछ समय पहले जो अपनी फिल्मों में अभिनेत्रियों के लिए बात कही थी कि वो महज पैडिंग का काम करती है उनकी फिल्मों में- मुन्ना माईकल में भी ये सच्चाई झलकती है.

फिल्म के डायरेक्टर ही है इसके विलेन

इस फिल्म का खलनायक कोई है तो वो निश्चित रुप से फिल्म के निर्देशक साबिर खान हैं. उनकी पिछली फिल्म बागी में जो उनकी मेहनत नजर आई थी वो मेहनत इस फिल्म में पूरी तरह से गायब है. आप महज नवाज और टाइगर के नाचने के गुर पर पूरी फिल्म खींच नही सकते हैं. अगर एक अच्छी कहानी ना हो तो ये चीजें फिल्म में महज प्रॉप बनकर रह जाती हैं.

अटपटी चीजों की तो फिल्म में भरमार है. रोनित राय के करियर का ये सबसे बेहूदा अभिनय, इस बात में कोई शक नही होना चाहिए. लगता है कि स्टीरियोटाइप्ड शब्द उन्होंने सुना नही है.

डांस तो है लेकिन गाने साथ छोड़ देते हैं

फिल्म में अगर डांस है तो गाने भला दूर थोड़े ही रह सकते हैं. फिल्म में जब टाइगर, नवाज को निधि से दूर भगाकर जब कन्याकुमारी भेज देते हैं उसी सीक्वेंस को देखकर मजा आता है लेकिन फिल्म मे एक भी ऐसा गाना नही है जिसे सुनकर आपके पांव थिरके. ये फिल्म टाइगर और साबिर के लिये एक सबक होना चाहिये की काठ की हांडी बार बार नही चढ़ती है.

मुन्ना माइकल को बनाने के पीछे सिर्फ एक ही वजह रही होगी कि अगर आजकल हिंदुस्तान में नवाज के अभिनय और टाइगर के डांस की चर्चा होती है तो दर्शकों को वही परोसा जाए बाकी सब कुछ चुल्हे में जाए.

साबिर को समझना चाहिए कि इतने सालों के बाद दर्शकों का टेस्ट अब बदल चुका है और अगर आप कमर्शियल फिल्म परोस रहे हैं तो उसमें भी आपको कुछ अलग करना पड़ेगा. ये फिल्म विमी दत्ता की कलम से नही निकली है ये फिल्म निर्माता की कलम से निकली है.

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