विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

मदर्स डे 2017: उनकी कहानी जो सिने'माँ' हैं

हिंदी फिल्म के किरदार एक स्थिर परिपाटी के अनुसार ही लिखे जाते रहे हैं, माँ का किरदार भी इसी का उदाहरण है

Satya Vyas Updated On: May 13, 2017 12:47 PM IST

0
मदर्स डे 2017: उनकी कहानी जो सिने'माँ' हैं

मूलभूत अवधारणा अक्सर बोलचाल की भाषा में घिस जाती हैं. ऐसी ही एक अवधारणा यह भी है कि फिल्में समाज का आईना होती हैं. क्योंकि फिल्में समाज को ही दर्शाती हुई बनाई जाती हैं इसलिए भी इसके किरदार अक्सर हमारे आसपास के ही होते हैं.

फिल्मों की अवधारणा के अनुसार माँ दो तरह की होती हैं. पहली मृदु-असहाय और दूसरी कठोर और सशक्त.

बोलती फिल्मों की शुरुआत 30 के दशक से मानी जाती रही है. वो दौर चूंकि फिल्मों की बाल्यावस्था थी इसलिए उम्रदराज महिला किरदारों का फिल्म जैसे निकृष्ट समझे जाने वाले उद्योग में काम करना मुश्किल ही था.

यही कारण है कि पचास का दशक आते-आते चालीस के दशक की अभिनेत्रियों ने ही माँ की भूमिकाओं के लिए हामी भरनी शुरू कर दी थी.

50 का दशक और माँ

इस वक्त के माँ के किरदारों  में सबसे ज्यादा प्रभाव 'अमीर बानू' ने छोड़ा. अमीर बानू 40 के दशक की अदाकारा थीं और उन्हें शारदा (1942), रतन(1944) जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता है.

मगर यादगार भूमिकाएं उन्होने माँ के रूप में ही कीं. चोरी-चोरी, आर-पार, और आन जैसी फिल्मों में उनके किरदार मील का पत्थर साबित हुए.

महबूब खान की 'आन' में अपने बेटे की कुर्बानी देती माँ का किरदार उन्हें एक ही साथ मृदु और सशक्त भूमिकाओं में खड़ा करता है.

ये भी पढ़ें: नीतू सिंह को मिल गई रणबीर कपूर की दुल्हनिया

60 का दशक और माँ

साठ का दशक आते-आते फिल्मोद्योग में भूमिकायें विविध हुईं तो दर्शक किरदार भी अलग ढूंढने लगे. इस दौर में सबल माँ की भूमिकाओं के लिए 'दुर्गा खोटे' सर्वोपरि रहीं.

पृथ्वीराज कपूर और पी जयराज के साथ पिछली जोड़ियां भी सहायक साबित हुईं. के आसिफ ने अकबर की भूमिका के लिए पृथ्वीराज कपूर को चुना तो जोधा की भूमिका के लिए दुर्गा खोटे ही पहली पसंद रहीं.

दिलीप कुमार और मधुबाला का चुनाव तो बाद में हुआ. जोधाबाई की भूमिका फिल्म इतिहास में दर्ज  हुई.

इसी दशक में उन फिल्मों में जहां माँ के कोमल, असहाय किरदारों की जरूरत हुई तो उसे पूरा किया 'मुमताज बेगम' ने.

मुमताज बेगम को साठ के दशक में धर्मेंद्र, राजेंद्र कुमार, मनोज कुमार जैसे अभिनेताओं की गरीब माँ की भूमिकाओं के लिए ट्रेडमार्क माँ माना गया.

मुस्लिम पृष्ठभूमि की फिल्मों में माँ के किरदारों में तो उनका जोड़ ही नहीं था.

70 का दशक और माँ

सत्तर के दशक की फिल्में माँ के किरदारों के लिए स्वर्ण काल कही जा सकती हैं. निरूपा राय, सुलोचना, अचला सचदेव जैसी अभिनेत्रियां इस दशक के लगभग हर फिल्म का हिस्सा होती थीं .

मृदु और असहाय मॉं की भूमिका में निरूपा राय पहली पसंद हुआ करतीं थीं. उनकी अदाकारी, आवाज और संवाद का सलीका उन्हें असहाय मॉं की भूमिकाओं के लिए ठेठ बना देता था.

आलम यह भी था कि फिल्मी जबान में लोग उन्हें अमिताभ की माँ तक कहने लगे थे.

ये भी पढ़ें: किसे डेट कर रही हैं प्रियंका चोपड़ा, देखिए क्या मिला जवाब

सशक्त और कठोर भूमिकाओं में ललिता पवार समां जाती थी. उन्हें दरअसल क्रूर किरदार ज्यादा मिलीं मगर जो भी किरदार मिले उसे उन्होंने ऐसा निभाया कि सास का पर्याय बन गईं.

सास भी कभी बहू थी, गोपी, मन की आंखे जैसी फिल्मों मे उनके किरदार जीवंत और यादगार रहे.

80 का दशक और माँ

अस्सी का दशक आते आते सशक्त माँओं के किरदार ठकुराइनों तक सीमित हो गए और इन किरदारों के लिए पहली पसंद बनीं सुषमा सेठ.

सुषमा सेठ का व्यक्तित्व ऐसे किरदारों के लिए उपयुक्त था. उन्होने इस दौर में ऋषि कपूर, विनोद खन्ना, राजेश खन्ना जैसे टॉप के हीरो की माँ की भूमिकाएं अदा कीं.

जिस तरह निरूपा राय को अमिताभ बच्चन की माँ का खिताब दिया गया था उसी तरह सुषमा सेठ को ऋषि कपूर की फिल्मी माँ तक कहा गया.

अस्सी के दशक में मृदु और असहाय भूमिका निभाने का दारोमदार आशालता का था.

गरीब, विधवा, अपने दम पर बच्चों को बड़ा करती माँ की भूमिकाओं को आशालता ने बखूबी निभाया.

फिल्म अंकुश में उनपर फिल्माया गीत,  'इतनी शक्ति हमे देना दाता' तो आज कई विद्यालयों में बतौर प्रार्थना गाया जाता है.

90 का दशक और माँ

नब्बे का दशक आते-आते फिल्मी माँएं थोड़ी चपल हुईं. कहानी जब शहरी होने लगी तो किरदार भी उसी तरह गढ़े जाने लगे जाने.

दृढ़ और सशक्त भूमिकाओं में रीमा लागू उभर कर आयीं. 'मैंने प्यार किया' की साथिन माँ हो या 'वास्तव' की कठोर माँ या फिर 'ये दिल्लगी' की मालिकाना माँ, रीमा लागू की इन भूमिकाओं का कोई सानी नहीं था.

उन्होंने नए जमाने की माँ की भूमिकाओं को खूब चरितार्थ किया.

इस दशक मे जब कोमल हृदय और असहाय माँ की भूमिकाओं की जरूरत हुई तो उसे पूरा किया फरीदा जलाल ने.

'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' की हंसमुख माँ हो या फिर 'दुलारा' और 'ऐलान' की असहाय माँ, फरीदा ने सभी किरदारों में जान डाल दी.

दो हजार का दशक और माँ

इस दशक के आते-आते माँएं फिल्मी कहानियों में बस सहायक किरदारों के लिए रह गईं.

यही कारण है की इस दशक में कोई अदाकारा चर्चित रूप से सामने नही आ पायी.

गंभीर माँ की भूमिका मे डिंपल कपाड़िया, सुहासिनी मुले और मृदु भूमिकाओं में नीना कुलकर्णी और स्मिता जयकर कुछ छाप छोड़ने में सफल रहीं.

हिंदी फिल्म के किरदार एक स्थिर परिपाटी के अनुसार ही लिखे जाते रहे हैं. माँ का किरदार भी उसी का उदाहरण है.

अस्सी साल के फिल्मी इतिहास में उपरोक्त नाम महज गिनती के हैं.

दर्शक वर्ग इन किरदारों को जीवंत करने के लिए इनके अलावा नरगिस, लीला मिश्रा, दीना पाठक, सुलोचना, अचला सचदेव, सुलभा, सुलभा देशपांडे जैसी महिला कलाकारों का हमेशा ऋणी रहेगा.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi