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जब कोई इलू-इलू कहता है तो हंस देती हूं: मनीषा कोईराला

मनीषा कोईराला की फिल्म डियर माया शुक्रवार को रिलीज हुई है

Runa Ashish | Published On: Jun 03, 2017 10:03 AM IST | Updated On: Jun 03, 2017 12:41 PM IST

जब कोई इलू-इलू कहता है तो हंस देती हूं: मनीषा कोईराला

मनीषा कोईराला जितनी खूबसूरत अभिनेत्री हैं उससे भी ज्यादा जीवट महिला हैं. मौत से लड़ कर आना और मौत से भी जीत जाना इतना आसान नहीं है. लेकिन जिंदगी कभी नहीं रुकती तो मनीषा कैसे रुक जातीं. डियर माया के साथ वो पर्दे पर वापसी कर रही हैं. उनसे बातचीत की फ़र्स्टपोस्ट संवाददाता रूना आशीष ने

आपके फैंस को आप पर फख्र है. अपनी फिल्म 'डियर माया' के बारे में कुछ बताएं?

एक महिला है माया देवी, जो एक घाटी में रहती है. बीस से तीस साल तक वो अपने घर में बंद रहती है. उसके पड़ोस में दो लड़कियां होती हैं. ये दोनों लड़कियां माया को देख कर परेशान हो जाती हैं कि कैसे कोई बीस साल तक अपने घर में बंद रह सकता है. उनकी इच्छा होती है कि हम इसे कैसे बदलें. वो  माया को झूठा लव लेटर भेज देती हैं. इन खतों को पढ़कर माया को लगता है कि सचमुच मुझे कोई प्यार करता है. वो भरोसा करती है और अपना घरबार बेचकर अपने प्यार की खोज मे निकल जाती है. अब लेटर लिखने वाली लड़कियों को अपराधबोध होता है कि उन्होंने एक औरत की जिंदगी को तबाह कर दिया. ये लड़कियां पांच-छह साल बाद भी इससे उबर नहीं पाती हैं. ये एक सफर है उन लड़कियों का लड़की से महिला बनने तक का.

Dear Maya2

आपको अपने आप और माया में कोई समानता लगी?

नहीं, ऐसे कोई समानता तो नहीं है. हां, मैंने कई साल लोगों के बीच नहीं गुजारे. मैं सिर्फ अपने चंद दोस्तों और घरवालों के साथ थी तो सिर्फ इतनी ही समानता लोगों को लग सकती है क्योंकि माया ने भी अपने आप को 20 साल तक बंद करके रखा है. उसे लगता है कि बाहरी दुनिया बहुत खतरनाक जगह है. उसे बाहर की दुनिया से डर भी लगता है. इस मामले में मुझे कोई समानता नहीं लगती है.

जब आप कैंसर से जूझ रही थीं तो इंडस्ट्री से कोई आपके पास आया था.. या किसी ने मदद की हो?

मुझे फिल्म इंडस्ट्री से किसी ने मदद नहीं की कोई नहीं आया और सच कहूं तो मैंने ऐसे किसी से मदद के बारे में सोचा भी नहीं. मैं जिस स्थिति में थी वहां मुझे अकेलापन ही चाहिए था. मैं अपने आप के साथ में थी. मेरे पास कोई फोन भी आते थे तो मैं मम्मी-पापा को फोन दे देती थी. मैंने किसी का फोन लिया ही नहीं. क्योंकि उस समय मेरा एक ही ध्येय था कि मुझे ठीक होना है. मैं तो किताबें पढ़ रही थी कि कौन ठीक हो गया है या किस वजह से ठीक हो गया है. क्रिकेटर युवराज सिंह ने क्या किया या फिर लीजा रे ने क्या किया था. मैंने तो लीजा को मैसेज भी किया था. लोगों ने फेसबुक या ट्विटर के जरिए भी सहायता की. कई लोगों ने सलाह दी. ये वो लोग थे जो कैंसर से लड़ कर उस पर फतह पा चुके थे.

जब कीमोथेरपी में आपके बाल चले गए तो एक अभिनेत्री होने के नाते कैसा लगा अपने आपको ऐसे देखना?

बहुत मुश्किल था. मुझे एक चीज बिल्कुल नहीं पसंद वो ये कि मैं किसी की रहम का पात्र बन जाऊं. मैं अपने आप को शीशे में देखती थी और बोलती थी कि तुम इससे बाहर जरूर निकलोगी. मैं रोज ये बात दोहराती थी. ये मेरा मंत्र बन गया था.

Dear Maya

आप आने वाले दिनों में बॉम्बे टॉकीज फिल्म भी कर रही हैं. उसके बारे में बताएं?

मेरा इस फिल्म में एक पार्ट ही है. बॉम्बे टाकीज में मेरा भाग दिबाकर बैनर्जी निर्देशित कर रहे हैं. वैसे मैं दिबाकर के काम को अच्छे से जानती हूं. मैंने तो एक बार दुबई फिल्म फेस्टिवल में दिबाकर की फिल्म खोसला का घोंसला को जज भी किया था. इससे ज्यादा जानना है तो फिल्म का इंतजार कीजिए.

आप संजय दत्त का बायोपिक में नर्गिस का रोल कर रही हैं. आप कभी नर्गिस जी से मिलीं थीं?

नहीं, मैं नर्गिसजी से कभी नहीं मिली थी. एक वाकया बताती हूं जब नर्गिसजी न्यूयॉर्क में थीं तो मेरे दादीजी भी न्यूयॉर्क में ही थे. उन्हें भी कैंसर था. तो वो आपस में नोट्स की अदलाबदली करते थे. वो दादाजी को कहती थी कि बीपी (बिस्वेश्वर प्रसाद कोईराला) तुम्हें जिंदा रहना चाहिए क्योंकि आपके देश को आपकी जरूरत है. नर्गिसजी भी जीना चाहती थी क्योंकि उन्हें भारत में वापस आ कर अपने बेटे की फिल्म रॉकी देखनी थी. वो हमेशा संजय को फिल्मों में देखना चाहती थी. वो हमेशा कहती थी कि मुझे जिंदा रहना होगा. मुझे मेरे बेटे की फिल्म देखनी है.

अब आगे क्या इरादा है?

मैं अपने इस साल के काम से बहुत खुश हूं लेकिन मैं थोड़ी सी लालची भी हूं. मैं तो और काम करना चाहूंगी. अभी तो राजू हिरानी सर की फिल्म में स्पेशल अपीयरेंस है. मैं तो उनके साथ बड़े रोल वाली फिल्म करना चाहूंगी.

अगर आपको कोई आ कर इलू इलू कहता है तो आप क्या महसूस करती हैं?

मैं हंस देती हूं और क्या.

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