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मणि रत्नम: जिनकी फिल्मों में दिखता है 'आइडिया ऑफ इंडिया'

मणि रत्नम आज 62 साल के हो गए हैं

Avinash Dwivedi Updated On: Jun 02, 2017 07:21 AM IST

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मणि रत्नम: जिनकी फिल्मों में दिखता है 'आइडिया ऑफ इंडिया'

भारत की आजादी के पचास साल पूरे होने वाले थे. पत्रकार, लेखक, समाजविज्ञानी और कलाकार सभी अलग-अलग ढंग से आजादी की समीक्षा में लगे हुए थे. दशकों पहले से ही समीक्षा के लिए प्रयास शुरू हो गए थे.

खासकर राजीव गांधी की सरकार के जाने के बाद एक बार फिर से भारत के कई टुकड़ों में बंट जाने के कयास लग रहे थे. उस वक्त कुछ राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक और 'संडे' जैसी पत्रिकाओं में इस विचार के इर्द-गिर्द लेख छप रहे थे.

इसी दौर में आजादी के बाद बने नए तरह के भारत की समीक्षा के लिए समाजविज्ञानी सुनील खिलनानी आजादी के पचासवीं वर्षगांठ के लिए 'आइडिया ऑफ इंडिया' नाम की किताब लिख रहे थे. इसमें नए भारत के तमाम पहलुओं को उकेरते हुए इस बात को समझाने का प्रयास किया गया था कि आखिर वो क्या चीज है, जो तमाम विविधताओं के बावजूद भी भारत को संगठित करती है.

भारत आज भी संगठित है और 90 के दशक में तमाम विरोधाभासों के रहते भी संगठित था. जबकि वहीं भारत से ही विभाजित होकर बना पड़ोसी देश पाकिस्तान इन पचास वर्षों में एक बार फिर विभाजित होकर अपना आधा प्रदेश खो चुका था. हालांकि ऐसा भी नहीं था कि भारत में उस वक्त लोकतंत्र की राहें आसान थीं. इन पचास वर्षों में भारतीय लोकतंत्र के सामने अलगाववाद, आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी समस्याएं उठ खड़ी हुई थीं. साथ ही सांप्रदायिकता और भी भयानक रूप धारण करती जा रही थी.

ऐसे में भारत की एकता के कारण ढूंढ़ने वाले पत्रकारोंं, लेखकों, समाजविज्ञानियों और कलाकारों के बीच एक फिल्मकार भी भारत की तमाम समस्याओं को बारीकी से उकेरने का प्रयास अपनी फिल्मों में कर रहा था, जिसका नाम था मणि रत्नम. अपने नाम के अनुरूप ही रत्नों में मणि ये फिल्मकार आजादी के पचासवें दशक के करीब तीन फिल्मों के साथ सामने आया - 'रोजा', 'बॉम्बे' और 'दिल से'.

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बड़े मुद्दों पर बड़ी फिल्में

इन तीन फिल्मों के बैकग्राउंड में तीन अलग-अलग समस्याएं थीं - 'आतंकवाद', 'सांप्रदायिकता' और 'अलगाववाद'. बहुत गहराई से इन मुद्दों का प्रभाव दर्शाने के लिए इस फिल्मकार ने इन्हें फिल्म की कहानी में ही गहराई से पिरो दिया था. साथ ही ये फिल्मकार इन समस्याओं के राजनैतिक-आर्थिक नुकसान की बजाए सामाजिक और भावनात्मक नुकसान अपनी फिल्मों में दर्ज कर रहा था. यानी बेहद मानवीय पहलू.

इसमें भी ध्यान देने वाली बात ये है कि ये फिल्में बनाने वाले फिल्मकार मणि रत्नम तमिल हैं. और साथ ही राष्ट्रीय मुद्दों पर बनने वाली ये फिल्में भी तमिल में ही बनी थीं, जिन्हें बाद में हिंदी में डब किया गया.

मतलब एक तमिल फिल्मकार राष्ट्रीय मुद्दों पर फिल्म बना रहा था. उसका कहना था कि फिल्मों के लिए भाषा कोई रुकावट नहीं होती और वाकई उसका सिनेमा (खासकर गीत) भाषाओं के पार चला गया. सारा देश ही नहीं दुनिया ने भी उसकी फिल्में देखीं. और लोगों ने बस उसकी फिल्में ही नहीं देखीं बल्कि उसकी दृष्टि से प्रभावित भी हुए, उससे सीखा भी.

कुल मिला जो बात समझ आनी चाहिए वो ये कि भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा माने जा रहे जिन खतरनाक मुद्दों के इर्द-गिर्द उस वक्त के तमाम विश्लेषक देश के बंटवारे की बात कर थे, उसी वक्त उन्ही 'खतरनाक' मुद्दों पर फिल्म बनाकर ये फिल्मकार देश को जोड़ने का काम कर रहा था, वो भी चेन्नई में बैठकर. अब आप ही कहें कि क्या भारत में किसी भी वक्त में 'आइडिया ऑफ इंडिया' का इससे बेहतरीन कोई उदाहरण क्या ही होगा?

नए मानक गढ़ने वाला निर्देशक

मणि रत्नम जीनियस डायरेक्टर तो हैं ही अपनी फिल्मों में तमाम 'टैबू' भी तोड़ने में भी जुटे रहते हैं. उन्होंने ही ऑनस्क्रीन सबसे पहले अपने सिनेमा बॉम्बे में हिंदू-मुस्लिम शादी दिखाई. साउथ की फिल्मों की जिन कमियों का उदाहरण अक्सर दिया जाता था, मणि रत्नम के सिनेमा ने उन्हें नहीं दोहराया. मणि की फिल्मों में हीरो स्टॉकर नहीं होता, समझदार होता है और महिलाओं से इंंसानों सा बर्ताव करता दिखता है.

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मणि रत्नम फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर के बेटे थे. पर इसका उन्हें फायदा मिला हो, ऐसा नहीं है. उन्हें नुकसान भी हुआ. इस धंधे में परिवार के कई सदस्यों के होने के चलते अक्सर परिवार में फिल्मों को कोई खास तवज्जो नहीं दी जाती थी और इन्हें 'वेस्ट ऑफ टाइम' माना जाता था. ऐसे में अपने शुरुआती और स्कूली दिनों में ना ही मणि रत्नम को सिनेमा देखने दिया जाता था, ना ही वो खुद देखते थे. बता दें कि मणि रत्नम की स्कूलिंग बेसेंट थियोसॉफिकल स्कूल, अड्यार में हुई थी.

फिर मद्रास यूनिवर्सिटी के रामकृष्ण मिशन विवेकानंद कॉलेज से उन्होंने कॉमर्स में ग्रेजुएशन किया. कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही एक दौर ऐसा आया जब मणि रत्नम को सिनेमा का चस्का लग गया. ऐसे में मणि ने कई फिल्में देखीं और कुछ उनको बेहद पसंद आईं. शिवाजी गणेशन और नागेश की सारी फिल्में मणि रत्नम पसंद किया करते थे. के. बालाचंदर और गुरुदत्त की फिल्मों की मणि रत्नम अब भी अक्सर तारीफ करते हैं.

इसके बाद मुंबई यूनिवर्सिटी से एमबीए करने के बाद वो 1977 में मद्रास में ही एक फर्म में मैनेजमेंट कंसल्टेंट के रूप में काम करने लगे. कुछ दिन काम करने के बाद नौकरी उन्हें बोर करने लगी. वो कुछ और करना चाहते थे, ऐसे में उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर फिल्में बनाने का निश्चय किया.

'पल्लवी अनु पल्लवी' से शुरुआत

मणि रत्नम ने अपनी पहली फिल्म बनाने से पहले ढंग से कभी किसी को असिस्ट भी नहीं किया था. पर फिर भी उन्हें खुद पर इतना विश्वास था कि उन्होंने बालू महेंद्र को अपनी फिल्म में सिनेमैटोग्राफी के लिए अप्रोच किया. बालू महेंद्र स्थापित नाम थे. यूं ही तैयार तो नहीं होने वाले थे. पर स्क्रिप्ट पसंद आने पर फिल्म में सिनेमैटोग्राफी के लिए तैयार हो गए. और इस तरह से मणि रत्नम की पहली फिल्म रिलीज हुई. जिसका नाम था, पल्लवी अनु पल्लवी. फिल्म तो हिट नहीं रही पर मणि रत्नम का खाता खुल गया.

आज मणि रत्नम की फिल्मों की बात आने पर उत्तर भारतीय 'रोजा', 'बॉम्बे', 'दिल से', 'युवा', 'गुरू' और 'रावण' के बारे में ही जानते हैं. यानि वो फिल्में जो तमिल के साथ-साथ हिंदी में भी आईं. पर हम शायद ही मणि रत्नम की फिल्मों 'थलपथी', 'नायकन', 'पागल निलवू', 'मौनरंगम्' और 'अंजली' के बारे में जानते हैं जो कि मणि रत्नम की मशहूर तमिल फिल्में हैं.

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हम जब हिंदी फिल्मों के जरिए मणि रत्नम को जानते हैं तो सोचते हैं कि मणिरत्नम मतलब सफलता की शत-प्रतिशत गारंटी. ऐसा नहीं है. मणि रत्नम ने अपनी शुरुआती जिंदगी में बहुत सी असफलताएं झेली हैं. उनकी फिल्में भी फ्लॉप हुई हैं और इसके चलते हुए विवादों में उनको कोर्ट तक जाना पड़ा है.

फिर मणि रत्नम ने ऐसी सफलताएं भी देखी हैं कि उनकी फिल्मों (नायकन और अंजली) को भारत की ओर से ऑस्कर की आधिकारिक एंट्री के रूप में भेजा गया. या उन्होंने अपनी 6 फिल्मों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीता.

मणि ने दिए कई बड़े नाम

मणि रत्नम के साथ एक बात ये भी है कि वो आदर्श गढ़ने का प्रयास कभी नहीं करते हैं वो कलात्मकता में नैतिकता का अतिरिक्त प्रवेश वर्जित ही रखते हैं. उन्होंने अपने नाम के साथ-साथ बॉलीवुड में तीन बड़े नाम बनाने में बहुत योगदान दिया है, एआर रहमान, अरविंद स्वामी और गुलजार. एआर रहमान को ब्रेक दिया और आज तक साथ बने हुए हैं, गुलजार को नए दौर में प्लेटफॉर्म दिया, जहां उनके गीतों के लिए सही ऑडियंस थी और अरविंद स्वामी को दिया एक वृहत्तर दर्शक समूह.

मणि रत्नम ने दो बार फिल्मों के प्लॉट किसी मिथकीय कहानी से चुने हैं. पहली 'थलपथी', जिसमें महाभारत के आधार पर कर्ण, दुर्योधन और अर्जुन के किरदारों को वर्तमान में ढाला गया है. और वहीं सीताहरण के प्रसंग को लेकर बनाई गई फिल्म ऐश्वर्या राय और अभिषेक बच्चन स्टारर फिल्म 'रावण' उनकी ऐसी दूसरी फिल्म थी.

अलवरपेट के अपने ऑफिस मद्रास टॉकीज में बैठे मणि रत्नम के काम करने का अंदाज बिल्कुल अनोखा है. वो कभी भी अपने सोचे गए किरदार को एक्टर के ऊपर हावी नहीं होने देते बल्कि किरदार बारीकियों के साथ एक्टर को सुनाते हैं, उससे बातचीत करते हैं और फिर एक किरदार जो दोनों के मेल से निकलता है. उसे फिल्म में दर्शाते हैं.

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रहमान के साथ भी उनका काम करने का अलग अंदाज है. कभी इल्लैयाराजा के साथ हारमोनियम पर बैठकर कई-कई धुनें सुनने वाले मणि रत्नम, रहमान से डेमो गाने की अपेक्षा करते हैं जिसपर मुश्किल से 50 परसेंट काम और होना हो, माने बस दो चीजें बाकी हों. पहली गाने को किसी स्तरीय सिंगर से गवाना और दूसरी उसका वीडियो तैयार करना.

'हर कहानी कुछ कहती है'

इसके अलावा किस्सों के धनी मणि रत्नम कभी विचारों से खाली नहीं होते और लगातार अपने दिमाग में चलने वाली कहानियों को नोट करते रहते हैं. मणि रत्नम कहते हैं, 'इन्हीं में से कुछ कहानियां, फिल्में बन जाती हैं.' मणि शायद ही कभी विदेशी जगहों का शूटिंग में प्रयोग करते हैं. गुरू को छोड़ दें तो उनकी किसी भी फिल्म का कोई भी सीन विदेश में शूट नहीं किया गया है.

मणि रत्नम के बारे में कहा जाता है कि वो आर्ट और कमर्शियल सिनेमा का बेहतरीन मिश्रण अपनी फिल्मों में तैयार करते हैं. इसलिए उनकी फिल्में क्रिटिक भी सराहते हैं और बॉक्स ऑफिस पर भी वो बेहतरीन कमाई करती हैं. मणि रत्नम आज 62 साल के हो गए हैं, ऐसे में उन्हें और बेहतरीन काम करने के लिए लंबी उम्र की शुभकामनाएं.

नोट: सभी तस्वीरें साभार 'IMDb वेबसाइट'

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