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ललिता पवार बर्थडे स्पेशल: क्योंकि सास भी कभी बहू थी

ललिता पवार का जीवन पुरुष प्रधान समाज में एक औरत के असीमित जिजीविषा की कहानी है.

Raajkumar Keswani | Published On: Apr 18, 2017 07:51 AM IST | Updated On: Apr 18, 2017 08:17 AM IST

ललिता पवार बर्थडे स्पेशल: क्योंकि सास भी कभी बहू थी

इस 18 अप्रैल को पूरे 101 बरस हो गए हैं, जब  हिंदुस्तानी समाज में प्रचलित सास-बहू की कथाओं की ‘क्रूर सास’ को फिल्मी पर्दे पर छवि देने वाली अभिनेत्री ललिता पवार का जन्म हुआ था.

फिल्मों में अक्सर घर में नई-नई आई, सुकुमारी बहू पर जुल्म ढाती ‘सास’ के किरदार निभाती ललिता पवार एक दौर की प्रसिद्ध नायिका थीं. एक ऐसी नायिका जो ‘मस्तीखोर माशूका’ (1932) जैसी काफी ‘हॉट’ किस्म की फिल्मों में दिखाई देती थी.

ललिता पवार का जन्म हुआ था 18 अप्रैल 1916 को नासिक के एक धनी व्यापारी लक्ष्मणराव सगुन के घर. उनका जन्म स्थान इंदौर माना जाता है.

पैदाइश के वक्त नाम रखा गया अंबा. उस दौर में लड़कियों को स्कूल भेजना जरा ठीक नहीं समझा जाता था, लिहाजा अंबा के नसीब में कभी स्कूल जाना नसीब न हुआ. थोड़ा-बहुत जो पढ़ा तो वह भी घर पर.

बतौर बाल कलाकार शुरू की फिल्में 

अंबा अभी 11 बरस की ही थी कि उसे पिता और छोटे भाई शांताराम के साथ पुणे जाना का मौका मिला. यहां आर्यन फिल्म कंपनी के स्टूडियो में एक फिल्म की शूटिंग देखने पहुंची अंबा पर नजर पड़ी निदेशक नाना साहेब सरपोतदार की. उन्होंने अंबा को फिल्मों में बाल भूमिकाएं करने का आफर दिया. काफी ना-नुकुर के बाद पिता लक्ष्मणराव मान गए.

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नतीजतन, कंपनी ने अंबा को फिल्मी नाम ललिता सगुन देकर, 18 रुपए की मासिक पगार पर नौकरी दे दी. बतौर बाल कलाकार ललिता सगुन की पहली फिल्म एक मूक फिल्म थी. 1927 में रिलीज हुई इस फिल्म का नाम था ‘पतित उद्धार’.

ललिता ने इस कंपनी के लिए तकरीबन 20 फिल्मों में काम करने के बाद नौकरी छोड़ बाहर की फिल्मों में भी काम करना शुरू कर दिया. 1931 में ‘आलम आरा’ के रिलीज के साथ फिल्मों को आवाज मिल गई थी. बोलती फिल्मों के उस शुरूआती दौर में कलाकारों को अपने गीत खुद गाने की बाध्यता थी.

ललिता सगुन से यूं बनी ललिता पवार 

ललिता पवार खासी अच्छी गायिका थीं, सो इसका उन्हें लाभ मिला. 1935 की फिल्म ‘हिम्मते मर्दां’ में उनका गाया ‘नील आभा में प्यारा गुलाब रहे, मेरे दिल में प्यारा गुलाब रहे’ उस वक्त काफी लोकप्रिय हुआ था.

पुणे से मुंबई आने के बाद ललिता जी ने ‘मस्तीखोर माशूक’ (1932), ‘भवानी तलवार’(1932), ‘कैलाश’(1932), ‘प्यारी कटार’(1933), ‘जलता जिगर’(1933), ‘नेक दोस्त’(1934) और कातिल कटार’(1935) जैसी फिल्मों में प्रमुख भूमिकाएं निभाकर काफी शोहरत हासिल की.

lalita pawar

इन फिल्मों में से एक ‘कैलाश’ की प्रोड्यूसर भी खुद ललिता पवार ही थीं. इस फिल्म के बाद उन्होंने एक और फिल्म का निर्माण किया, नाम था ‘दुनिया क्या है?’. यह फिल्म महान लेखक लेव टाल्स्टाय के उपन्यास ‘रिजरेक्शन’ (पुनरुत्थान’) पर आधारित थी.

गणपतराव पवार से शादी के बाद ललिता सगुन का नाम बदलकर ललिता पवार हो चुका था. कामयाबी का सफर लगातार जारी था कि एक दिन किसी मेहरबां की नजर लग गई.

यूं खत्म हुआ हीरोइन वाला करियर 

बात 1942 की है. फिल्म ‘जंग-ए-आजादी’ के एक सीन की शूटिंग के दौरान एक दुर्घटना की वजह से उनकी एक आंख में चोट लग गई और उनका हीरोइन वाला कैरियर हमेशा के लिए खत्म हो गया.

प्रसिद्ध अभिनेता भगवान दादा, जो उन दिनों मास्टर भगवान के नाम के साथ मुख्य भूमिकाएं निभाते थे, को इस दृश्य में ललिता पवार को एक थप्पड़ मारना था. उन्होंने थप्पड़ इतनी जोर का मारा कि ललिता जी गिर पड़ीं और कान से खून बहने लगा.

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फौरन सेट पर ही डाक्टर को तलब किया गया और इलाज शुरू हो गया. इसी इलाज के दौरान डाक्टर द्वारा दी गई किसी गलत दवा के नतीजे में ललिता पवार के शरीर के दाहिने भाग को लकवा मार गया. इसी लकवे की वजह से उनकी दाहिनी आंख पूरी तरह सिकुड़ गई और उनकी शक्लो-सूरत हमेशा के लिए बिगड़ कर रह गई.

हौसले की नई उड़ान 

lalita pawar

इस घटना के बाद ललिता पवार को काम मिलना बंद हो गया. अगले कई साल तक अपनी सेहत और अपने हौसले को फिर से हासिल करने की कोशिश में जुटी रहीं. और आखिर 1948 में अपनी एक मूंदी आंख के साथ निदेशक एस.एम. यूसुफ़ की फिल्म ‘गृहस्थी’ से एक बार फिर वापसी की.

32 साल की उम्र में ही वे हीरोइन से चरित्र अभिनेत्री की श्रेणी में आ गईं. मगर उन्होंने कभी इस बात का गिला न किया और इसी खलनायिका वाले किरदार को अपने अभिनय के दम से एकदम नई ऊंचाई दे दी.

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जालिम सास की भूमिकाओं को इस तरह निभाया कि घर-घर में होते झगड़े-टंटे में बहुएं सास को ललिता पवार कहकर बुलाती थीं.

लेकिन जब अवसर मिला तो इसी जालिम सास ने ‘अनाड़ी’ (1959) में दयावान मिसेज डीसा, ‘मेम दीदी’ (1961) की मिसेज राय और कौन भूल सकता है ‘श्री 420’ (1955) की गंगा माई ‘केले वाली बाई’ को.

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ललिता पवार की जीवन कथा एक ऐसी कथा है, एक औरत के अदम्य साहस और असीमित जिजीविषा की कहानी है, जिसने पुरुष प्रधान समाज में अपने हौसलों के सहारे कभी हार नहीं मानी.

दर्दनाक अंत 

पहले पति गणपतराव ने धोखा दिया और ललिता पवार की छोटी बहन से अफेयर शुरू किया तो ललिता ने अदालत में तलाक का केस लगाकर मुक्ति पाई. बाद में उन्होंने निर्माता राजप्रकाश गुप्ता से विवाह कर लिया.

24 फरवरी 1998 को 700 फिल्मों में अपने अभिनय के जौहर दिखाने वाली इस अभिनेत्री ने पुणे में अपने छोटे से बंगले ‘आरोही’ में अकेले ही पड़े-पड़े आंखें मूंद लीं. उस समय उनके पति राजप्रकाश अस्पताल में भर्ती थे और बेटा अपने परिवार के साथ मुंबई में था.

उनकी मौत की खबर तीन दिन बाद मिली जब बेटे ने फोन किया और किसी ने उठाया नहीं. घर का दरवाजा तोड़ने पर पुलिस को ललिता पवार की तीन दिन पुरानी लाश मिली.

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