विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

जय माता दी: हर मर्ज की दवा है मां

अगर गैरकानूनी ढंग से परेशानियां थोपी जाएं तो 'जय माता दी' स्टाइल में हल निकालना मुश्किल नहीं है

Pradeep Awasthi Updated On: May 23, 2017 11:21 PM IST

0
जय माता दी: हर मर्ज की दवा है मां

वो आती है. मां का फर्ज निभाती है. टैक्सी में बैठती है. एक फोन आता है. ड्राइवर उसे हैरानी से देख रहा है. जब वो टैक्सी में बैठती है तो साड़ी में है. टैक्सी से उतरती है तो बुर्के में है. जाते-जाते ड्राइवर को अपना कार्ड पकड़ा जाती है जिस पर लिखा है-जय माता दी. यह है शॉर्ट फिल्म.

मजाक में कही गंभीर बात

आपको रहना है. आप घर ढूंढ रहे हैं. आपके पास पर्याप्त पैसे हैं. आप उसका खर्च उठा सकते हैं. आपने देश के कानून के हिसाब से कभी कुछ गलत नहीं किया है. देश के सभ्य नागरिक रहे हैं.

लेकिन वो घर आपको नहीं मिल सकता क्योंकि हाउसिंग सोसाइटी का चेयरमैन या सेक्रेटरी ऐसा नहीं चाहता. उसे दिक्कत है कि आप अकेले क्यों रहना चाहते हैं, लड़का- लड़की बिना शादी के साथ में क्यों रहना चाहते हैं या आप कोई पक्की नौकरी क्यों नहीं करते.

anurag

फिल्म मजाकिया लहजे में बेहद गंभीर मसला उठाती है. गंभीर मसला इसलिए क्योंकि मुंबई में नए आए लोगों के स्ट्रगल और काम की तलाश के दिनों में एक नई ही परेशानी सामने आती है.

धारदार है फिल्म की कहानी

ये फिल्म कहीं कोई सिरा ढीला नहीं छोड़ती है और न ही कोई पेंच ज्यादा कसने की कोशिश करती है. किरदार ऐसे जिनमें मुंबई में रहने वाले या नए नए मुंबई आने वाले लड़के लड़कियां पूरी तरह खुद को देख पाएंगे.

फिल्म के नायक और नायिका अपने लिए घर ढूंढ रहे हैं. एक ब्रोकर उन्हें घर और सोसाइटी के फायदे गिना रहा है. ठीक वैसे ही जैसे हमें गिनाए जाते रहे हैं या निर्देशक को भी गिनाए गए होंगे. बढ़ा-चढ़ाकर की गईं बातें जिनमें आधी बाद में गलत निकलती हैं.

हर किरदार है खास

किरदारों को खूब चुना और निभाया गया है. चालू किस्म का ब्रोकर जिसे किराएदारों और सोसाइटी सेक्रेटरी के बीच पुल का काम करना है. शक्की मिजाज और संस्कारी सेक्रेटरी जिसे हर मसले में टांग अड़ानी है.

तो लिव-इन में रहने की इच्छा रखने वाले प्रेमियों के सामने दिक्कत ये आती है कि सोसाइटी में उनको नहीं घर मिलेगा. लेकिन यहीं काम आता है वो रास्ता जिसे हम जुगाड़ के नाम से जानते हैं.

आप यदि नैतिकतावादी होकर चलेंगे तो शायद सफल न हों. लेकिन ब्रोकर नाम की प्रजाति के पास हर चीज का तोड़ है. ये ब्रोकर नाम की प्रजाति चल ही जुगाड़ पर रही है. यहां फिल्म ढूंढकर लाती है इन प्रेमियों को घर दिलाने का नायाब तरीका-मां.

जब प्रेमी बन जाते हैं भाई-बहन

मां हमारे यहां वो पवित्र हथियार है जो प्रेमियों का भी भाई-बहन होना स्थापित कर सकती है. ऐसा करके वो यकीनन दो प्यार भरे दिलों की बड़ी समस्या सुलझा रही है. साथ ही अपनी और ब्रोकर की जेब की समस्या भी.

मुंबई में ज्यादातर सोसाइटी में सिंगल लड़कों या लड़कियों को अकेले रहने के लिए घर नहीं मिलता. यदि आप परिवार वाले नहीं हैं, तो आपको शक की नजरों से देखा जाता है.

फिर समझा जा सकता है कि लिव-इन में रहने की कोशिशों में किन-किन दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. ये सब इतनी आसानी से और इतना ज्यादा होता है कि आप भूल जाएंगे कि एक लोकतान्त्रिक देश होने के नाते आपके कुछ नागरिक अधिकार भी हैं, जिनके चलते कोई भी इन पैमानों पर आपको घर देने से नहीं रोक सकता.

मुंबई की मुश्किल का ऐसे निकलेगा हल 

इससे भी ज्यादा हैरत की बात ये है कि आज के समय में मुंबई जैसे शहर में कई बार लोगों को धर्म की वजह से भी घर ढूंढने में दिक्कत होती है. स्टैंडअप कॉमेडियन जाकिर खान को कई दिन इसी वजह से घर ढूंढने में दिक्कत हुई.

karanjohar

फिल्म के निर्देशक नवजोत गुलाटी का कहना है कि उन्हें नहीं लगता था कि इतनी सरलता से कही गयी बात इतनी प्रभावी साबित होगी. वे कहते हैं कि उनके पास जय माता दी नाम से एक कहानी थी. वे कहानी पर काम कर रहे थे तभी कुछ दोस्तों के निजी अनुभवों से ये कहानी उपजी. वे कहते हैं कि उन्हें खुद भी हाउसिंग सोसाइटी के चेयरमैन और सेक्रेटरी से काफी जद्दोजहद करनी पड़ती रही है.

बड़ी सोच से बनाई शॉर्ट फिल्म 

फिल्म में सोसाइटी सेक्रेटरी का किरदार निभाने वाले मनु ऋषि चड्ढा कहते हैं कि बड़ी सोच से बनायी गयी छोटी फिल्म दूर तक पहुंच रही है. वे कहते हैं कि अब जब वे अभिनय यूं ही कर रहे हैं तो ढेर सारा प्यार मिल रहा है. इन दिनों लिखना ज्यादा हो रहा है.

कहते हैं कि दोस्तों का कहना है कि अभिनय करना चाहिए तो अब मन बन रहा है. वे ओये लकी ! लकी ओये, फंस गया रे ओबामा, आंखों देखी, मिथ्या तथा अन्य फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं. वहीं ओये लकी ! लकी ओये के डायलॉग्स लिखने के लिए उन्हें फिल्मफेयर से भी नवाजा गया.

फिल्म के डायलॉग्स बहुत अच्छे लिखे गए हैं और बातों बातों में ही कुछ जरूरी बातें भी बोल दी गयी हैं. वहीं अभिनय के मामले में मनु ऋषि, सुप्रिया पिलगांवकर और सानंद वर्मा मजेदार डायलॉग्स को और निखारते हैं.

यदि गैर-कानूनी तरीके से जबरदस्ती इस तरह की परेशानियां थोपी जा सकती हैं, तो इस फिल्म द्वारा सुझाया गया ऐसा हल निकालना भी कोई बहुत काल्पनिक बात नहीं.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi