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Jagga Jasoos Review: अंदर का बच्चा जिंदा है तो देखिए ये फिल्म

सभी को यह जानने में रुचि होगी कि क्या ये फिल्म 'बर्फी' को पार कर पाती है?

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Abhishek Srivastava | Published On: Jul 14, 2017 03:41 PM IST | Updated On: Jul 14, 2017 03:50 PM IST

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Jagga Jasoos Review: अंदर का बच्चा जिंदा है तो देखिए ये फिल्म
निर्देशक: अनुराग बसु
कलाकार: रणबीर कपूर, कैटरीना कैफ, शाश्वत चटर्जी, सौरभ शुक्ला

अनुराग बसु की 'जग्गा जासूस' देखने के पहले आपको कुछ चीजों का ध्यान रखना पड़ेगा. ये बच्चों की फिल्म है, बर्फी में जो इमोशंस की झड़ी अनुराग ने लगाई थी उसकी उम्मीद आप 'जग्गा जासूस' में न करें. सबसे बड़ी बात कि ये एक म्यूजिकल है यानी कि दिल को छू जाने वाले या फिर जिस पर सीटियां पडें ऐसे डायलॉग की भी उम्मीद न करें.

कहने का सार यही है कि ये एक अलग तरह की फिल्म है जो हिंदुस्तान मे पहले कभी नहीं बनी है. अब सबसे बड़ा सवाल है कि आपको फिल्म देखनी चाहिए या नहीं? इस पर मेरा यही कहना होगा कि अगर आपके अंदर का बच्चा अभी भी जिंदा है तो आप इसको जरूर देखिए वरना दूर रहने में भलाई है. आपको ये फिल्म एक अलग दुनिया मे ले जाएगी- अलग दुनिया से मेरा मतलब है आपको ये फिल्म आपके बचपन की सैर कराएगी.

फिल्म की कहानी जग्गा के बारे में है जो हकलाता है. उसके मां-बाप के बारे में फिल्म में जिक्र नही किया गया है और उसका पालन पोषण करते है बादल बागची जिसका किरदार फिल्म में शाश्वत चटर्जी ने निभाया है. कुछ अजीबोगगरीब हालात मे बादल बागची एक दिन गायब हो जाते है और फिर जग्गा उनकी खोज में निकल पड़ता है.

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सौरभ शुक्ला फिल्म में इंटेलिजेंस ग्रुप के वरिष्ठ अधिकारी सिन्हा की भूमिका में हैं और वो भी बादल बागची के खोज कर रहे हैं. फिल्म के क्लाईमेक्स मे कुछ चीजों का खुलासा होता है. ध्यान देने वाली बात ये है कि इस फिल्म की पृष्ठभूमि साल 1995 मे बंगाल के पुरुलिया जिले मे हुई आर्म्स ड्रॉपिंग केस पर आधारित है.

अभिनय की बात करे तो इस फिल्म मे एक भी सितारा ऐसा नही है जिसके पांव गलत पड़े हों यानी सभी ने सधा हुआ अभिनय किया है. रणबीर कपूर ने जिस लगन से जग्गा के किरदार को जिया है वो बिल्कुल सटीक है. कैटरीना कैफ फिल्म मे एक इंवेस्टिगेटिव पत्रकार की भूमिका में है और उनका भी काम सधा हुआ है. सौरभ शुक्ला का अभिनय तो हमेशा शानदार ही रहता है.

बादल बागची के रुप मे शाश्वत चटर्जी ने सभी से बाजी मार ली है. फिल्म मे जग्गा के दत्तक पिता के रुप मे उन्होंने अपने किरदार में जान डाल दी है. फिल्म की शूटिंग के पहले ऐसी खबरें आ रही थी की पहले ये रोल ऋषि कपूर करने वाले थे. शाश्वत को देखने के बाद यही कहा जा सकता है कि उनका चयन बिल्कुल सही था.

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लेकिन ऐसा भी नही है कि अनुराग बसु की ये फिल्म सभी मापदंडों पर खरी उतरती है. अगर फिल्म का सार बयान करे तो मूलत: ये फिल्म एक बेटे की अपने पिता की खोज के बारे मे है और अनुराग यही पर मात खा गए हैं.

फिल्म में जितना समय उनको बाप-बेटे पर देना चाहिए था, उसमें कमी रह जाती है. कई लोग इस फिल्म को फंतासी कहकर नकार भी सकते हैं और ये गलत भी नहीं होगा क्योंकि ये फिल्म बच्चों को ध्यान मे रखकर बनाई गई है. फिल्म की जो गति फिल्म के पहले हाफ मे अनुराग ने बनाई है वो काबिल-ए-तारीफ है लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शस्त्रों के व्यापार के मुद्दे पर बात करके यही लगता है कि बच्चों को उस वक्त उन्होने ध्यान में नही रखा है.

ये एक बिल्कुल नए तरह की फिल्म है. इस तरह की फिल्मों में हॉलीवुड पहले ही महारत हासिल कर चुका है. ऐसी इक्का-दुक्का फिल्म ही हिंदुस्तान मे बनी है. हालिया फिल्मों की बात करें तो पिछले 25 साल मे इस तरह की फिल्म के दीदार नहीं हुए हैं. अनुराग की ये कोशिश बेहद ही सराहनीय है. ऐसी फिल्म बनाकर उन्होने एक बड़ा जुआ खेला है.

फिल्म को सिनेमाटोग्राफर रवि वर्मन ने बेहद ही दिल लगाकर शूट किया है. इस बार अनुराग अपना कैमरा लेकर मणिपुर तक पहुंच गए हैं. जिस तरह से लोकल कल्चर को अनुराग अपने कैमरे में कैद करते हैं, उसमें उनका कोई सानी नहीं है. फिल्म में जग्गा के स्कूल के हिस्से और मोरक्को (फिल्म मे मोंबाका) में जो क्लाईमेक्स फिल्माया गया है वो बेहद रोचक है.

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जाहिर सी बात है कि सभी को यह जानने में रुचि होगी कि क्या ये फिल्म अनुराग की बर्फी को पार कर पाती है. इसका सीधा जवाब होगा- नहीं.

बर्फी एक ऐसी फिल्म थी जिसमे इमोशंस कूट-कूट कर भरे हुए थे. उस फिल्म में किरदारों के अभिनय का कमाल था. बर्फी एक अंडरअचीवर था जिसने बाद में बहुत कुछ पाया. जग्गा इसके उलट है. यहां पर किरदारों के अभिनय से ज्यादा अनुराग की बनाई दुनिया का ज्यादा महत्व है. सबसे बड़ी बात ये एक फंतासी फिल्म है. इसलिए बेहतर यही होगा की फिल्म देखने के पहले बर्फी को अपने जहन से निकाल दें. आपको ये फिल्म एक अलग चश्मे से देखनी पड़ेगी और अपने अंदर के बच्चे को बाहर लाना पड़ेगा.

लगभग पौने तीन घंटे की फिल्म में कहानी के बदले फंतासी हंगामा ज्यादा होता है. मुमकिन है कि अनुराग को इस फिल्म के लिए गालियां पड़ सकती हैं और लोग इसे रणबीर की दूसरी बॉम्बे वेलवेट बुला सकते है लेकिन इस नए तरह की फिल्म बनाने के लिए रणबीर और अनुराग की तारीफ तो करनी ही पड़ेगी.

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