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अपनी डिक्शनरी को फिल्म मेकर्स की 'गीता' क्यों बना रहे हैं निहलानी

फिल्म डायरेक्टरों की छोटे-छोटे सीनों पर आपत्ति करने वाले पहलाज निहलानी ने खुद कई स्तरहीन फिल्में बनाई हैं

Nidhi Nidhi | Published On: Jun 26, 2017 06:45 PM IST | Updated On: Jun 26, 2017 06:47 PM IST

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अपनी डिक्शनरी को फिल्म मेकर्स की 'गीता' क्यों बना रहे हैं निहलानी

सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज निहलानी ने इम्तियाज अली की अगली फिल्म 'जब हैरी मेट सेजल' के एक प्रोमो में एक खास शब्द को लेकर आपत्ति जताई है. जैसा कि वो आजकल हर दूसरी फिल्म में करते आ रहे हैं. निहलानी ने शाहरुख खान और अनुष्का शर्मा की फिल्म के प्रोमो में 'इंटरकोर्स' शब्द पर आपत्ति जताई है.

अब हमारे ‘संस्कारी सेंसर बोर्ड' के अध्यक्ष ‘इंटरकोर्स' शब्द पर ट्रायल चला रहे हैं. उन्होंने इस शब्द के पक्ष में एक लाख गवाह जुटाने के लिए कहा है, नहीं तो वो ‘कुसंस्कारी’ करार दिया जाएगा.

मैं इसके पक्ष में गवाही दूं या इसे अश्लील मानते हुए इसका विरोध करूं, इसी कश्मकश में मुझे अचानक याद आया कि इस शब्द से मेरा सामना कई साल पहले भी हुआ था. बारहवीं क्लास में बायो की किताब. याद आते ही मैंने इंटरनेट से जल्दी-जल्दी किताब डाउनलोड की कि कहीं किताब के लेखकों ने वो अनर्थ तो नहीं कर दिया जिस अनर्थ से पहलाज निहलानी जी हम भारतीय सिनेमा दर्शकों को बचाना चाहते हैं.

12वीं में ही पढ़ाया गया था 'इंटरकोर्स'

human reproduction

तो मेरा शक बिलकुल सही था. ये अंडर ट्रायल शब्द कंट्रोल प्लस एफ दबाते ही सामने आ गया. 'इंटरकोर्स', इस शब्द के साथ ही इसकी पूरी व्याख्या भी चैप्टर में दी गई है. तो क्या इन किताबों के लेखक हमारी नैतिक शिक्षा को लेकर इतने उदासीन थे कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि इस तरह के शब्द बच्चों पर बुरा प्रभाव डाल सकते हैं.

चलिए कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि ‘इंटरकोर्स’ जैसे शब्द का किताबों में और सामान्य बोलचाल में अलग संदर्भ में उपयोग होते हैं. ये भी मान लेते हैं कि इस फिल्म के प्रोमो को जिस अंदाज में पेश किया गया है उसे कोई सभ्य परिवार एक साथ बैठकर देख या सुन नहीं सकता है. लेकिन ऐसा पहली बार तो हुआ नहीं है जब कोई शब्द, कोई मुद्दा सेंसर बोर्ड के संस्कारों पर खतरा बना हो.

पीरियड के मुद्दे को भी 'ए' सर्टिफिकेट क्यों?

Phullu

हद तो तब हो जाती है जब महिलाओं में पीरियड के समय उपयोग में आने वाले सेनेट्री पैड और उससे जुड़ी सामाजिक समस्यायों को लेकर एक सच्ची घटना से प्रेरित फिल्म ‘फुल्लू’ को ‘ए’ सर्टिफिकेट दिया गया है.

हमारे समाज में आज भी पीरियड को एक कुदरती प्रक्रिया न मानकर इसे सांस्कृतिक, धार्मिक टैबू के साथ जोड़कर देखा जाता है. इससे जुड़े तमाम तरह के अंधविश्वास हम सब अपने-अपने समाज में देखते-सुनते आ रहे हैं.

आकड़ों के लिहाज से भी देखें तो अभी भी 77% महिलाएं पीरियड के समय पुराने इस्तेमाल किए हुए कपड़े का इस्तेमाल करती हैं, भारत के गांवों में तो ये संख्या और भी ज्यादा है. इस समय इंफेक्शन से होने वाली बीमारियों के खतरे भी बढ़ जाते हैं. तो फिर जाहिर सी बात है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर बात करने की और लोगों को जागरूक करने की जरूरत है.

हमारे हिंदी फिल्म डायरेक्टर और प्रोड्यूसर वैसे भी मसाला फिल्में, कॉमर्शियल फिल्में ही ज्यादा बनाते हैं. ऐसे में अगर एक-आध फिल्म इन मुद्दों को उठाती हैं तो फिर उसे बढ़ावा देने के बजाय 'ए' सर्टिफिकेट देकर उसके दर्शकों को सीमित किया जा रहा है. जबकि अक्षय कुमार की फिल्म 'टॉयलेट: एक प्रेम कथा' के टीजर और ट्रेलर को खूब सराहा जा रहा है. ये फिल्म भी देश में शौचालय की समस्या पर बनी फिल्म है. इस फिल्म से निहलानी इतने खुश हैं कि वे अक्षय कुमार को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोग्राफी के लिए चुन रहे हैं.

हम सब मानते हैं कि 'घर से बाहर शौचालय' भी एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है. और इसे बिलकुल सराहा जाना चहिए. लेकिन क्या निहलानी जी को ये नहीं लगता कि जिस तरह शौचालय के लिए जागरूक होना जरूरी है वैसे ही महिलाओं के पीरियड के विषय पर भी लोगों में जागरूकता फैलाने की जरूरत है. फिर 'फुल्लू' जैसी फिल्म को 'ए' सर्टिफिकेट देने के पीछे उनकी क्या मंशा थी?

नारीवादी मुद्दे नकारे गए

डायरेक्टर प्रकाश झा की फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का' की रिलीज पर ही सेंसर बोर्ड ने रोक लगा दी थी. उनका कहना था कि, ‘इसकी कहानी नारीवादी, गाली-गलौज वाले शब्द, ऑडियो पोर्नोग्राफी और समाज के एक वर्ग से जुड़े कुछ संवेदनशील मामले शामिल हैं. यही वजह है कि इस फिल्म को नकारा जाता है.’ बहुत कोशिशों के बावजूद फिल्म रिलीज तो हुई लेकिन उसे भी ‘ए’ सर्टिफिकेट दिया गया.

Lipstick Under My Burkha

इससे पहले निर्माता अनुराग कश्यप की फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ को लेकर पहलाज निहलानी ने आपत्ति जताई थी. सेंसर बोर्ड फिल्म उड़ता पंजाब में भारी काट-छांट करने के साथ ही इसके नाम से पंजाब शब्द को भी हटाना चाहता था.

फिल्में समाज और परिस्थितियों से ही प्रेरित होती हैं. कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि पूरा पंजाब बुरी तरह से नशे की चपेट में डूब रहा है. अब ये बात किसी राज्य की बुराई हो या किसी देश का सच. जो है उससे मुंह मोड़कर क्या हमें सिर्फ झूठी महानता का गुणगान करना चाहिए?

किसिंग सीन से ऐतराज

इसके अलावा हॉलीवुड की जेम्स बॉन्ड सिरीज की फिल्म 'स्पेक्टर' से किसिंग सीन हटाने पर भी भारी विवाद शुरू हुआ था. निहलानी पर फिल्म के कई और सीन हटाने के भी आरोप थे.

इन सारी फिल्मों से हो रहे संस्कार पर खतरे को देखते हुए एक बार पहलाज निहलानी साफ-साफ बता दें कि आखिर वो भारतीय सिनेमा को कहां ले जाना चाहते हैं? अब अगर वो तय नहीं कर पा रहे हैं तो एक बार हमें उनकी निर्देशित फिल्मों की तरफ नजर जरूर डालना चहिए, जिसके आधार पर उन्हें इस पद के लिए चुना गया है.

निहलानी की  कुछ फिल्में

1994 में आई थी फिल्म 'अंदाज' जिसके प्रोड्यूसर पहलाज निहलानी थे. अब इस फिल्म के कुछ गाने सुनिए.

क्या सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष ऐसे डबल मीनिंग गाने और डायलॉग वाली फिल्में दिखाना चाहते हैं?

अब उनकी स्तरहीन फिल्में और गानों को देखकर तो नहीं लगता कि निहलानी उतने ही संस्कारी हैं जितने कि वो सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष बनने के बाद होने की कोशिश कर रहे हैं. संभव है कि वो ऐसा इसलिए भी कर रहे हों कि इससे  एक खास ऑडियंस खुश होगा.

निहलानी तुगलकी निर्देशों को देख कई फिल्मी जानकारों का मानना है कि वो ऐसा केंद्र सरकार को खुश करने के लिए करते हैं. इसका प्रमाण उन्होंने 'मेरा देश है महान' जैसा गाना बनाकर दिया था.

लेकिन इस तरह फिल्मों से छोटे-छोटे सीन और शब्द हटाकर किसे और क्या संदेश देना चाहते हैं? क्या निहलानी भी जबरदस्ती के संस्कार सिखाने में जुटे हैं?

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