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Irada Movie Review: एक खोया हुआ मौका है अरशद, नसीर की 'इरादा'

अगर आप किसी अहम मुद्दे को उठाते हैं लेकिन उसमें जान नहीं फूंकते तो सारी कोशिश बेकार जाती है.

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Anna MM Vetticad | Published On: Feb 17, 2017 11:39 AM IST | Updated On: Feb 17, 2017 11:58 AM IST

Irada Movie Review: एक खोया हुआ मौका है अरशद, नसीर की 'इरादा'
निर्देशक: अपर्णा सिंह
कलाकार: अरशद वारसी, नसीरुद्दीन शाह, सागरिका घाटगे

पंजाब के बठिंडा से राजस्थान के बीकानेर जाने वाली ट्रेन को लोगों ने 'कैंसर ट्रेन' का नाम दे रखा है. इसकी वजह है कि इस ट्रेन में अक्सर कैंसर-पीड़ित मरीज बीकानेर जाते हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कैंसर मरीजों की संख्या में यह इजाफा क्षेत्र में कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग का नतीजा है. इस हफ्ते की फिल्म 'इरादा' हमें इसी समस्या की एक और दिशा में ले जाती है- स्थानीय इंडस्ट्री के कारण पानी का प्रदूषित होना.

ऐसा मुद्दा उठाने के लिए ही 'इरादा' की तारीफ होनी चाहिए. निर्देशक अपर्णा सिंह की फिल्म एक प्लांट में विस्फोट से शुरू होती है. यह प्लांट पैडी शर्मा (शरद केलकर) का है जिसकी ताकत सत्ताधारी पार्टी को दिए गए उसके चंदे से है. मुख्यमंत्री रमनदीप (दिव्या दत्ता) उसकी जेब में है और वह ब्लास्ट के पीछे की वजह छुपाने में मदद करती है. इसके लिए वह एनआईए अफसर अर्जुन मिश्रा (अरशद वारसी) को बुलाती है. कहानी में लेखक पर्बजीत वालिया (नसीरुद्दीन शाह) और पत्रकार माया सिंह (सागरिका घाटगे) भी हैं. माया का एक्टिविस्ट बॉयफ्रेंड रहस्यमय तरीके से गायब हो जाता है.

इरादा अच्छा, फिल्म कमजोर

इसमें कोई शक नहीं है कि फिल्म की बेसिक थीम तारीफ के काबिल है. लेकिन 'इरादा' इस मुद्दे को एक जीवंत लोगों की जीवंत कहानी में बदलने में असफल हो जाती है.

अगर इस फिल्म को एक डॉक्युमेंटरी के तौर पर देखें तो इसके मिलने वाली जानकारी अस्पष्ट है. एक काल्पनिक फीचर के तौर पर फिल्म की वैल्यू सीमित है क्योंकि यह केवल इस समस्या से पीड़ित लोगों की भावनाओं के गहरे चित्रण के बजाय ऊपर-ऊपर से निकल जाती है.

उदाहरण के लिए फिल्म में एक महिला अस्पताल में अपने बच्चे के सामने अपने इलाज के लिए पति की गई कुर्बानी की कहानी सुनाती है. क्या हम इस किरदार को और जान सकते थे? या एक ऐसी मां का किरदार के बारे में जो ट्रेन में सभी सह-यात्रियों के बारे में ऐसे बात करती है मानो वह किसी टूरिस्ट पार्टी का हिस्सा हों? लेकिन फिल्म के लेखक- सिंह और अनुष्का रंजन- इन किरदारों को कुछ पलों में सीमित कर देते हैं. उनका फोकस अपराध छुपाने की फिराक में जुटे अथॉरिटीज पर ज्यादा है. ठीक है- आखिर दुष्टता भी दिखाई जानी ही चाहिए. लेकिन यहां भी स्क्रीनप्ले किरदारों को विकसित होने नहीं देता.

ह्यूमन-इंटेरेस्ट की कहानी के बजाय इरादा एक थ्रिलर में बदल जाती है. इस ओर भी संभावनाएं कम नहीं हैं. आखिर विस्फोट किसने कराया? क्यों? आखिर इसे अंजाम कैसे दिया गया? लेकिन इस मोर्चे पर भी फिल्म कुछ खास नहीं कर पाती क्योंकि जांच का ब्योरा और तरीका बेवकूफाना लगता है.

उदाहरण के लिए एनआई अफसर मिश्रा दीवारों को घूरता है, ऐंवे ही हाथ घुमाता है और हवा में से गुत्थियां सुलझा लेता है. लेखक वालिया कथित सुरागों से भरी कविताएं सुनाता है- सुनने में यह बड़ा शानदार लगता है लेकिन है नहीं. माया सिंह के पास करने को कुछ नहीं है- सो हम सागरिका घाटगे को अभी 'चक दे' फेम ही कहते रहेंगे.

और फिल्म का सबसे बड़ा खुलासा आपको नहीं चौंकाता. ऐसा नहीं है कि इस खुलासे में कोई चौंकाने वाली बात नहीं है लेकिन जह यह सामने आता है तब तक आपको फिल्म के बारे में फर्क ही नहीं पड़ता.

अच्छे एक्टर्स के पास करने को कुछ नहीं

फिल्म में वारसी, शाह, दत्ता और राजेश शर्मा जैसे शानदार एक्टर्स हैं, लेकिन 110 मिनट की फिल्म में एक भी यादगार सीन नहीं है. ऐसा नहीं है कि उनकी एक्टिंग खराब है लेकिन वे साधारण हैं- जब निर्देशन लचर और पटकथा रुखी हो तो अक्सर ऐसा टैलेंटेड एक्टर्स के साथ ऐसा ही होता है.

सिनेमा के किसी भी कद्रदान के लिए वारसी को ऐसी फिल्म में देखना मुश्किल है, जब सात दिन पहले ही जॉली एलएलबी 2 रिलीज हुई है. सीरीज की पहली फिल्म में अरशद वारसी की शानदार अदाकारी ने ही जॉली एलएलबी को याद रखने लायक ब्रैंड बनाया था.

क्या अरशद कुछ गलत कर रहे हैं या फिर मौजूदा फिल्मी दुनिया की रीत ही ऐसी है कि जॉली एलएलबी सीरीज में उनकी जगह अक्षय कुमार - एक बड़े सुपरस्टार लेकिन कलाकार के रूप में कहीं न कहीं अरशद से पीछे- ले लेते हैं, जबकि वारसी को इरादा जैसे अधकचरी, कमजोर फिल्म करनी पड़ती है?

पंजाब की 'कैंसर ट्रेन' को कई भारतीय फिल्मों और मीडिया रिपोर्ट्स का विषय होना चाहिए. अगर आप किसी अहम मुद्दे को उठाते हैं लेकिन उसमें जान नहीं फूंकते तो सारी कोशिश बेकार जाती है. इरादा एक जरूरी मुद्दे की ओर लोगों का ध्यान खींचने का एक खोया हुआ अवसर है. और यह निराश करता है!

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