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Saturday Special : फिल्मों से ज्यादा पैसा कमाएंगी 'वेब सीरीज' - विवेक ओबरॉय

विवेक का मानना है कि आज डिजिटल प्लेटफॉर्म की पहुंच सिनेमाघरों से बहुत ज्यादा है

Abhishek Srivastava Updated On: Jul 01, 2017 11:15 AM IST

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Saturday Special : फिल्मों से ज्यादा पैसा कमाएंगी 'वेब सीरीज' - विवेक ओबरॉय

विवेक ओबराय अपनी पहली वेब सीरिज इनसाइड एज को लेकर खासा उत्साहित हैं. मुंबई के बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स में अमेंजॉन प्राम वीडियो के ऑफिस में जब उनसे मुलाकात हुई तब वो बाहर हो रही रिमझिम बारिश के बीच चाय और कुकीज का लुत्फ उठा रहे थे.

विवेक का मानना है कि वेब सीरिज फिल्मों के गणित और अर्थशास्त्र दोनों पर असर करने वाला है. विवेक अपनी इस दलील को आंकड़ों के जरिये सामने रखते हैं.

कंपनी, शूटआउट एट लोखंडवाला सरीखी फिल्मों में अपने नेगेटिव अंदाज से लुभाने वाले, इस बार एक बेहद ही शातिर शख्सियत के रुप में नजर आयेंगे जो मैच का रुख बदलने की ताकत रखता है.

उनकी आने वाली सीरिज को लेकर फर्स्टपोस्ट हिंदी ने उनसे एक खास बातचीत की.

आजकल ऐसा कहते हैं कि पर्दे पर विवेक जब बुरे होते हैं तो अच्छे होते हैं और जब बहुत बुरे होते हैं तब बहुत अच्छे होते हैं, इनसाइड एज में कुछ ऐसा ही है क्या?

सब कुछ तो आपने बोल दिया अब मेरे लिये बोलने को क्या रखा है? मुझे पता है कि इंटरव्यू के शुरुआत में ही आप इसको रखेंगे और इस बात को मैं सूंघ सकता हूं. मैं अपने रोल्स को इस तरह से नहीं देखता हूं. जब मैंने 'कपंनी' से अपनी शुरुआत की थी तब लोगों ने कहा था कि मैं इस तरह की फिल्म से शुरुआत कैसे कर सकता हूं.

एक ऐसी फिल्म जहां पर मैंने अपना चेहरा काला कर लिया है, फैशनेबल कपड़े नहीं पहन रहा हूं. ऋतिक का डेब्यू मुझसे दो साल पहले हुआ था और फिर लोगों ने ऋतिक की ओर इशारा करके कहा की डेब्यू ऐसा होना चाहिये.

मुझसे लोगों ने कहा था की लॉन्च पैड बिल्कुल ऋतिक की तरह होना चाहिये जहां पर आप नाच रहे हों, गा रहे हों और लड़की के साथ रोमांस कर रहे हों लेकिन मैं हमेशा से ही अनकनवेंशनल रहा हूं और मेरे लिये सिर्फ रोल की महत्ता होती है. मुझे लगता है कि कंपनी से मैंने अपनी छाप छोड़ी थी, रिलीज होने के बाद लोगों ने कहा कि क्या काम किया है.

उसके बाद मेरी साथिया रिलीज हुई और शूटिंग के पहले लोगों ने कहा कि मुझे ऐसे रोमांटिक रोल नहीं करने चाहिये. फिर साथिया के बाद लोगों ने कहा कि अरे यार ये तो दोनों तरह से रोल कर लेता है. मैं उसी तरह के रोल करता हूं जिसमें मेरा विश्वास होता है.

मेरे हिसाब से इनसाइड एज में मेरा जो विक्रांत धवन का किरदार है हां वो काफी सेक्सी है. उसके लिये अधिकार और शक्ति, नशे के सामान है और इसके लिये वो कुछ भी कर सकता है. वो लोगों को पुतलों की तरह कंट्रोल करता है और बेटिंग की इस अलग दुनिया का मास्टरमाइंड है.

जब चैंपियंस ट्राफ़ी के फाइनल में भारत पाकिस्तान से हार गया था तब मेरे और आप जैसे प्रौढ लोगों ने कहा था कि कोई बात नहीं उस दिन पाकिस्तान ने अच्छा खेला था लेकिन जैसे ही पाकिस्तान के एक पूर्व क्रिकेटर ने कहा कि मैच फिक्स था बाकी लोग भी कहने लगे की मैच फिक्स था खासकर की वो लोग जो हारने वाले की तरफ थे. वो पचा नहीं पा रहे थे इस हार को.

ये बेटिंग, फिक्सिंग क्या है, कितने लोग इसका हिस्सा हैं, ये कैसे काम करता है, इसकी दुनिया किस तरह की है, इस एंट्री पाइंट कहां से है. इनसाइड एज इन्हीं सब चीजों के बारे में बात करती है और विक्रांत धवन की दुनिया में ले जाती है.

अगर आपकी फिल्मोग्राफी पर नजर दौड़ाई जाये तो पता चलता है कि भले ही आप एक हीरो हैं और पाजीटिव रोल ज्यादा करते हैं लेकिन नेगेटिव शेड्स वाली भूमिकाओं में आपकी कुछ ज्यादा ही जंचते हैं.

रोल कभी भी नेगेटिव या पॉजीटिव नहीं होता है. रोल या तो दिलचस्प होता है या फिर उबाऊ होता है. किसी भी रोल जिसमें महज एक ही शेड होता है वो काफी बोरिंग होता है. अपने करियर की शुरुआत से ही मैंने किसी भी रोल को हीरो या विलेन के रुप में नहीं देखा है.

कुछ किरदार दिलचस्प होते है कुछ नहीं होते है. विक्रांत धवन का किरदार को मैंने इसलिये हां कहा क्योंकि वो लोगों को कठपुतली की तरह शतरंज के खेल की तरह आगे पीछे करता रहता है.

उसे हमेशा अंजाम की पड़ी रहती है चाहे उसका रास्ता सेक्स, मर्डर या हिंसा के रास्ते होकर क्यों ना निकले. इस अजीब सी दुनिया के ऊपर अपने कंट्रोल को बनाने के लिये वो किसी भी हद तक जा सकता है.

जिस तरह से फिल्मों से लोग निकल कर वेब सीरिज में काम कर रहे है, कुछ सालों के बाद फिल्मों का क्या होगा?

सिनेमा एक अनुभव रहेगा. आपको अपने घर में खाना मिलता फिर भी आप रेस्त्रां जाते हैं खाने के लिये. कुछ वैसा ही सिनेमा भी है. सिनेमा एक अनुभव है जहां पर लोग जायेंगे, मस्ती करेंगे, सीटी बजायेंगे और फिर वापस अपने घरों को लौट आयेंगे.

सिनेमा का रोल आने वाले सालों में बदल जायेगा. देश की लगभग 130 करोड़ की आबादी में बमुश्किल 2.5 करोड़ सिनेमा हाल जाने वाले लोग हैं. कम से कम 25 करोड़ लोगों के लिये तो सिनेमा हाल बनने चाहिये. अब इसके पीछे की एक वजह यह भी हो सकती है लाजिस्टिक जिसका सीधा मतलब ये है कि आप वहां तक पहुंच नहीं पाये हैं.

अगर आप मोबाल के माध्यम से लोगों को कॉन्टेंट देना शुरु कर दें तो 60 करोड़ लोगों के पास तो आप चुटकियों में पहुंच जायेंगे. हिंदुस्तान में आज के समय लगभग 40 करोड़ स्मार्टफोन्स हैं. अगर 100 रुपये के टिकट के हिसाब से अगर 2.5 करोड़ लोग फिल्म देखने जाते हैं तो आप 250 करोड़ कमाते हैं.

अगर आपने इसी टिकट के दाम 20 रुपये कर दिये तो इसे शर्तिया ज्यादा लोग देखेंगे. और इसका फायदा ये भी है कि आपका सिनेमा हाल जाने का खर्चा बचेगा, आपके गाड़ी के पार्किंग का खर्चा बचेगा, तेल की बचत होगी और आप सीधे अपने घर में इसका लुत्फ उठा सकते है. आप मेरी सारी फिल्मों की लाईब्रेरी वहां पर मिल जायेगी.

दूसरी बात ये है कि अगर आपको मेरी फिल्म पसंद नहीं आ रही है तो आप फौरन किसी और फिल्म पर जंप कर सकते हैं, किसी सीरिज का एपिसोड पसंद नहीं आ रहा है तो आप किसी और एपिसोड पर जा सकते हैं.

मेरे कहने का मतलब ये है कि मनोरंजन का पूरा गणित और अर्थ शास्त्र बदलने वाला है. किसी जमाने में आपको लगता था कि लैंडलाइन फोन के बिना आपका गुजारा नहीं होने वाला है लेकिन आज उसी फोन को लोग अपने घरों में सजावट और यादों के लिये रखते है.

अगर अमेरिकी फिल्मों की बात करें तो पिछले कुछ सालों में एक बात ये सामने आई है कि जो प्रतिभाशाली लोग हैं अब उनका मोह सिनेमा से भंग हो रहा है और इसलिये आजकल वो वेब सीरिज और टीवी की ओर रुख कर रहे हैं. हिंदुस्तानी सिनेमा के लिये भी ऐसा कुछ हो सकता है.

ये शुरु हो चुका है. कबीर खान अपना एक मेगा प्रोजेक्ट जल्दी ही लेकर आपके सामने आने वाले हैं. जब ऐसी सीरिज की बात चल रही थी तो मैं ऐसा पहली व्यक्ति था जिसमें अपनी दिलचस्पी दिखाई थी और लोगों ने मुझसे कहा था कि मैं ऐसा क्यों कर रहा हूं.

उन्होंने मुझसे कहा था कि इससे बेहतर में टीवी के लिये कुछ कर लूं. लोगों में वेब सीरिज का एक समझ ये है की ठोंक-पीट कर बनाया हुआ कांटेंट हो जिसके प्रोडक्शन वेल्यू काफी निम्न स्तर का है. लेकिन अगर आप इनसाइड एज को देखेंगे को आपको पता चलेगा कि इसका प्रोडक्शन वेल्यू कई फिल्मों से बेहतर है.

मैं धन्यवाद दूंगा अमेजॉन और एक्सेल को उन्होंने इस पर इतने पैसे खर्च किये. इसका बजट काफी बड़ा है और इसलिये एक अच्छे प्रोडक्शन की फील इससे निकल कर आती है.

विवेक, वेब सीरिज को लेकर एक और बात निकल कर सामने आती है और वो ये है कि इसमें समय की काफी महत्ता है, कम समय में ज्यादा कॉन्टेंट शूट करना पड़ता है. जाहिर सी बात है सीरिज की गुणवत्ता पर इससे काफी असर पड़ता होगा. आप इसको किस नजरिये से देखते है?

ये सोच गलत है कि अगर वेब सीरिज की शूटिंग चल रही है तो इसका ये मतलब है कि कॉम्प्रोमाइस हो रहा है. इसको हमने बाकायदा एक फिल्म जैसी ही बनाया है. ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि इसका एक एक शेड्यूल हमने 10-10 दिनों के अंदर जल्दबाजी में काम करके निपटा दिया है.

हर एपीसोड में हर कैरेक्टर का एक ग्राफ निकल कर बाहर आता है. इसके दस एपीसोड हैं और इसको एक दस घंटे की फिल्म की तरह ही शूट किया गया है. मेरा ये मानना है कि अगले दो साल में वेब सीरिज की दुनिया में इतना बदलाव आ जायेगा कि आप फिल्मों से ज्यादा पैसे इससे बनायेंगे और ये बात मैं कलाकारों के लिये भी कह रहा हूं.

मैं आपसे ये बिल्कुल नहीं पूछूंगा कि इस सीरिज को करने के लिये आपको कितने पैसे मिले, बस आप इतना बता दिजिये की जो पैसे आपको मिले, वो आपकी फिल्मों से कम थे या ज्यादा?

देखिये मेरा इनके प्रोड्यूसरों के साथ तीन सीजन का अनुबंध है और इतना ही कह सकता हूं कि अच्छे पैसे मिले हैं.

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यार ये कई चीजों पर आधारित है. मैंने इस बाबत वहां के लोगों से बात भी की थी लेकिन तब तक काफी देरी हो चुकी थी. मैंने उनका सुझाया था कि इस फिल्म को वर्ल्डवाइड डिजिटल रिलीज करना चाहिये था क्योंकि डिजिटल पर ही इसके बारे में बातें हो रही थीं.

एक ऐसा वर्ग है जिसके पास आप अपनी फिल्म को पहुंचा नहीं पा रहे है. आज की जो युवा पीढ़ी है वो बैंक चोर जैसे कॉन्टेंट को देखने के लिये उत्साहित हैं और अगर ऐसे 10 प्रतिशत लोग भी हों तो वो लोग देश के हर कोने में हैं.

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि ये फिल्म शहरों के लिये है या फिर आंतरिक इलाकों के लिये है. ये फिल्म कुल यंग स्पेस में आती है और डिजिटल माध्यम से आप इन बंधनों को तोड़कर इनके पास पहुंच सकते हैं अगर आप इसे 700 सिनेमाघरों में डिस्ट्रीब्यूट ना भी करें तो आपका काम बन सकता है.

आप ऐसा नहीं कह सकते हैं कि आप सौ किमी चल कर मेरी फिल्म देखने के लिये आओ. कम पैसों में आप अच्छी प्रोडक्शन क्वालिटी वाली फिल्में भी बना सकते हैं.

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आपको अपना रास्ता ढूंढना पड़ेगा. डिस्ट्रीब्यूशन में आपको अपने जेब से पैसे निकालने पड़ेंगे, प्रिंट बनाने में भी आपको पैसा देना पड़ेगा और पी एंड ए में भी आपको अपनी जेब से पैसा डालना पड़ेगा.

लेकिन जब आप अमेजॉन जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आप ये सब कुछ करते हैं तो आपका सारा पैसा बच जाता है. इस प्लेटफॉर्म की यही खूबी है कि आपको भी बाकी के साथ मौका मिलता है अपना हुनर दिखाने का.

ऐसा भी सुनने में आ रहा है कि सीरिज में जो आप किरदार निभा रहे है उसमें पूर्व आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी की झलक है. 

नहीं वो विक्रांत धवन है (हंसी). लगता है तो ठीक है, नहीं लगता है तो भी ठीक है. दुनिया असली है लेकिन किरदार काल्पनिक हैं. इस सीरिज को बनाने के पहले इसकी पूरी दुनिया पर हमने अच्छा खासा रिसर्च किया था कि बुकीज का व्यवहार कैसा होता है, इनकी दुनिया कैसी होती है. इसके पीछे के लोग कौन होते हैं. प्रीमियर लीग क्रिकेट को लेकर हमारा रिसर्च पूरी तरह से है.

विवेक जब पहली बार क्रिकेट मैच में मैच-फिक्सिंग की बात निकल कर बाहर आई थी तब क्या आपका आदर क्रिकेट की तरफ कम हुआ था?

जी हां. कहीं ना कहीं क्रिकेट को अब हमने खेल की तरह लेना बंद कर दिया है और अब इसके साथ राष्ट्रवादी गौरव की बात जुड़ गई है और इसलिये अब लोग इसे अपने दिल पर लेने लगे हैं.

आप चाहते हैं कि भारत हर मैच अपना जीते क्योंकि आप भारत के लिये गर्व महसूस करते है. मैंने इस बात को हमेशा माना है कि दुनिया भर की मीडिया इसे एक रेत का महल की तरह खेल समझती है. पहले वो उसे बनाते है और बाद में नष्ट कर देते हैं.

लोग उनकी बातों को मानने लगते है और जब वो किसी की सफलता और उसके बाद पतन देखते है तो उससे वो बेहद प्यार करते है. ये मानव प्रकृति का ही एक हिस्सा है. सट्टेबाज़ी की हवा इतनी फैली हुई थी कि आप किसी भी क्रिकेटर को अपना निशाना बना सकते हैं.

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आप किसी भी खेल को अपना निशाना बना कर कह सकते है कि ये फिक्स है. पाकिस्तान की जीत को भी इसने अपना निशाना बनाया. अब मुझे ये लगता है कि मैं अब मैच फिक्सिंग को लेकर किसी की बात नहीं सुनूंगा जबतक उसमें कोई तथ्य ना हो.

चलिये में आखिर बात यही पूछूंगा कि अब आपने क्रिकेट की अलग दुनिया के ऊपर पूरी सीरिज कर ली है जो की तथ्यों पर आधारित है तो क्या क्रिकेट की ओर वो आदर अभी भी है?

जी हां (हंसी के साथ)

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