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IIFA SPECIAL: कमर्शियलाइजेशन ने फीकी कर दी है आईफा की रंगत

18 सालों में आईफा में जबरदस्त बदलाव आया है

Abhishek Srivastava Updated On: Jul 12, 2017 11:18 AM IST

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IIFA SPECIAL: कमर्शियलाइजेशन ने फीकी कर दी है आईफा की रंगत

आईफा अवॉर्ड्स इस साल अपने 18 साल पूरे कर लेगा. अपने तरह का यह अनूठा फिल्म अवार्ड समारोह अपने 18 सालों में कई उतार चढ़ाव देख चुका है. यह फिल्म जगत का इकलौता ऐसा अवार्ड समारोह है जिसका आयोजन हर साल विदेश में ही होता है.

2000 में इसकी शुरुआत लंदन के मिलेनियल डोम से हुई थी और साउथ अफ्रीका, सिंगापुर, मकाओ, थाईलैंड, दुबई, हॉलैंड, मलेशिया, श्रीलंका,कनाडा स्पेन के बाद इस साल ये अपना जलवा अमेरिका में दूसरी बार दिखाने वाला है.

लेकिन अगर मैंने जलवा शब्द का इस्तेमाल किया है तो शायद यह गलत शब्द का चयन है. आईफा अवॉर्ड्स का जलवा तब हुआ करता था जब अमिताभ बच्चन इसके ब्रैड एंबेसडर हुआ करते थे.

amitabh-bachchan IIFA

महज इवेंट को प्रमोट करने के लिये अमिताभ बच्चन अवार्ड समारोह के जगह पर दो बार दौरा करते थे - पहली बार वो समारोह को प्रमोट करने के लिये एक महीने पहले जाते थे और दूसरी बार समारोह के दौरान. लेकिन जबसे सदी के महानायक ने आईफा को अलविदा कहा है तबसे आईफा की साख और जलवे में कमी ज़रुर आई है.

श्रीलंका के आईफा समारोह के बाद सदी के महानायक ने आईफा को एक तरह से अलविदा कर दिया था. और उनके साथ साथ अलविदा कहा था उनकी पत्नी जया बच्चन, पुत्र अभिषेक बच्चन और बहू ऐश्वर्या राय बच्चन ने.

Bachchan IIFA

सूत्रों की मानें तो उस साल 2010 के आईफा अवार्ड्स कोलंबो में होने तय थे और उसी वक्त उनके बेटे अभिषेक की फिल्म रावण का प्रीमियर समारोह के दौरान तय किया गया था. लेकिन फिल्म के निर्देशक मनी रत्नम के सिंहली तमिलों पर सालों पहले दिये गये बयान ने फिल्म के प्रीमियर को विवादों में खड़ा कर दिया और उसके बाद ही बच्चन परिवार और आईफा आयोजकों के रिश्तों के बीच खटास आ गई थी.

मुझे भी दो आईफा अवार्ड कवर करने का मौका मिला था 2005-06 में और उस वक्त के माहौल और आज के माहौल में जमी आसमान का अंतर आपको नजर आयेगा. ये वो वक्त था जब सितारे ज्यादा कमर्शियल नहीं हुये थे और उनके आगे पीछे 10 लोगों का स्टाफ नहीं हुआ करता था. चाहे वो पत्रकारों की जमात हो या फिर फैंस की - सभी को अपने चहेते सितारों से मिलने का मौका ज़रुर मिल जाता था.

Shahid-Farhan IIFA

मुझे याद है 2005 का आईफा जब आशुतोष गोवारिकर, विपुल शाह, मधुर भंडारकर, कुणाल कोहली जैसे निर्देशक अपने होटल में चेक इन करने के बाद एम्सटर्डम शहर पैदल घूमने निकल गये थे.

सड़क के बगल के तमाम रेस्त्राओं के ढेर में से किसी एक में अपना डेरा जमा लिया था और उसके बाद हंसी ठिठोली का दौर चल निकला था. कभी फैंस के साथ अपना फोटो खिंचवाते तो कभी इलेक्ट्रानिक मीडियो के पत्रकारों के साथ वॉक थ्रू करते.

Deepika IIFA

कहने का आशय यही है की उनको रोकने के लिये उनकी टीम से कोई नहीं था - ना ऑर्गनाईजर्स और ना ही उनकी पीआर मशीनरी के लोग. सभी चीजें नार्मल माहौल के परिवेश में ही चलती थी.

अमिताभ बच्चन भी जब आईफा को प्रोमोट करने के लिये एम्सटर्डम के मशहूर डैम स्काव्यार में साईकिल चलाने के लिये पहुंचे तो भीड़ के हुजुम के बदले कुछ गिने चुने ही लोग थे वहां मौजूद थे.

प्रोमोशन के उनके नायाब नज़ारा देखने के लिये. बच्चन के पास इतना वक्त भी था की अपने सभी चाहने वालों के साथ तबियत से फोटो भी खिंचवाई. लेकिन आने वाले समय के साथ साथ ये नज़ारा दुर्लभ हो गया. सितारों के लिये उनका होटल अभेद किला बन गया जहां फैंस और पत्रकार जैसे परिंदे पर भी नहीं मार सकते थे.

Priyanka-Chopra-IIFA

इंटरव्यू के लिये समय मांगना और उनके साथ स्पेशल चीजों को अंजाम देना दुर्लभ सी बात हो गई थी आने वाले आईफा समारोह में. शुरुआत का आईफा एक ऐसा दौर था जब सितारे और पत्रकार एक ही हवाई जहाज़ से सफर किया करते थे और आना भी एक साथ ही हुआ करता था. अपने बिज़नेस क्लास से निकल कर सितारे इकानमी क्लास में बैठे पत्रकारों से गपशप के लिये अक्सर आ जाते थे.

मुझे याद है एक ऐसा ही सफर जब अभिषेक बच्चन अपने एक रिपोर्ताज पर एक पत्रकार से निराश चल रहे थे. हवाई जहाज़ में जब उनका पाला उस पत्रकार से पड़ा मानो गुस्से का उबाल निकल पड़ा हो.

मामले को सुलझाने के लिये सुनील शेट्टी को आगे आना पडा. लेकिन जब सफर पूरा हुआ तब अभिषेक उस पत्रकार के गले में अपना हाथ डालकर चल रहे थे.

 

Bollywood IIFA

आने वाले कुछ सालों तक आईफा एक ऐसा समारोह बना रहा जब आयोजकों को इस बात के लिये माथापच्ची नहीं करना पड़ती थी या फिर परेशान नहीं होना पड़ता था कि हिंदी फ़िल्मों के सितारे समारोह में शिरकत करेंगे या नहीं.

जरा गौर फरमाइये 2005 के आईफा अवार्ड्स पर जब सितारों के हुजुम ने आईफा को रोशन कर दिया था - अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन, शाहरुख खान, सलमान खान, रानी मुखर्जी, ऋतिक रोशन, अनिल कपूर, संजय दत्त, शाहिद कपूर ये सारे कुछ ऐसे सितारे थे जो एक ही छत के नीचे नजर आये थे.

लेकिन वक्त ने करवट बदली और उसके बाद चीजें बदलने लगीं. सितारों ने अपनी डिमांड रखनी शुरु कर दी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के एवज में. कई सितारों को लगने लगा की अपनी ज़िद से वो आईफा को झुका देंगे और हुआ भी कुछ ऐसा ही.

IIFA-Awards-2015

आईफा अवार्ड समारोह ना रह कर तीन दिन का एक ऐसा उत्सव बन गया जिसमें हर बड़े सितारे की बात रखने के लिये कुछ ना कुछ चीज़ो का इंतज़ाम किया जाने लगा. सितारे भी अब तीन दिन रुकने की बजाय अपना काम जल्द खत्म करके वापस लौटने में अपनी भलाई समझने लगे हैं.

अपनापन की इस कमी की एक वजह हो सकती है चीजों का कुछ ज्यादा कमर्शियल होना. अब अवार्ड समारोह से फोकस हट कर इसके टेलीविजन स्वरूप पर चीज़े टिक गई है क्योंकि आयोजक को पता है कि पैसे भी वही से आने वाले हैं.

लेकिन अवार्ड समारोह तो दूर की बात है अब चैनल सितारों की शॉपिंग को भी कैमरे में क़ैद करने में भी उतनी ही तन्मयता से रुचि रखते हैं और ये लाज़िमी भी है क्योंकि अगर कंटेंट कुछ ज्यादा हो तो को क्यों ना उसके खींचकर पूरे समारोह को दो वीकेंड तक इस्तेमाल किया जाये.

और ये सब कुछ होता है बाकी मीडिया की बलि चढाकर. सच ये है कि आईफा अपने 16 साल के आयोजन में फिल्म फेयर या स्क्रीन को टक्कर नहीं दे पाया है अगर बात क्रेडिबिलिटी की हो तो.

सितारे भी इसी एक तीन दिन के झंझट की तरह ही इस्तेमाल करते है जहां रुकने के लिये होटल, आने जाने के लिये हवाई जहाज़ का टिकट सब कुछ मुफ्त मिलता है. उनको कुछ देना होता है तो वो है समय जो आयोजक अपने कांटेंट को निकालने के लिये इस्तेमाल में ले आते है.

आईफा दस साल पहले तक एक फोरम था जहां पर सितारों और पत्रकारों के बीच की दूरियां मिटती थीं जहां तीन दिन तक एक उन्मुक्त माहौल में विचारों का आदान प्रदान होता था. कमर्शियलाईजेशन के सुरसामयी मुंह ने अब इसको लील लिया है.

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