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Hindi Medium Review : कहानी इस फिल्म की 'हीरो' है

जो काम खोसला का घोसला ने रियल स्टेट के लिए किया था वो ही काम हिंदी मीडियम शिक्षा के क्षेत्र में करेगी

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Hemant R Sharma Hemant R Sharma | Published On: May 18, 2017 10:22 AM IST | Updated On: May 18, 2017 09:34 PM IST

Hindi Medium Review : कहानी इस फिल्म की 'हीरो' है
निर्देशक: साकेत चौधरी
कलाकार: इरफान खान, सबा कमर, दीपक डोबरियाल और अमृता सिंह

ये हर उस इंसान की कहानी है जिसने रीजनल बोर्ड से पढ़ाई की है लेकिन वो अपने बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाना चाहता है, क्योंकि इंग्लिश मीडियम में पढ़ाई आज के समाज के लिए ना सिर्फ ‘स्टेटस’ है बल्कि ये ‘सच्चाई’ बन चुका है.

इसी सच्चाई और होड़ का ‘रिएलिटी चेक’ है डायरेक्टर साकेत चौधरी की ये फिल्म हिंदी मीडियम जिसे एक सीधी-साधी स्टोरी में दिखाने की साकेत ने ‘अच्छी’ कोशिश की है.

सबसे अच्छे स्कूल में एडमिशन की होड़

अच्छे स्कूलों में एडमिशन की मारामारी हर शहर की परेशानी है. दिल्ली में नर्सरी स्कूलों में दाखिले का मुद्दा तो हर बार मीडिया की बड़ी हेडलाइंस बनाता है. मुट्ठी भर कॉन्वेंट स्कूलों की थोड़ी सी सीट्स के लिए कैसे डोनेशन, सिफारिश और कोटे का खेल होता है उसी स्टोरी को लेकर ये फिल्म आगे बढ़ती है.

कहानी घर-घर की

राज मल्होत्रा, मीता और पीया की ये कहानी दिल्ली की है. जहां राज मल्होत्रा के रोल में इरफान खान चांदनी चौक में एक साड़ी का स्टोर चलाते हैं. अपने ग्राहकों को साड़ी बेचने के लिए वो खुद उन्हें साड़ी पहन-पहनकर भी दिखाते हैं. पाकिस्तानी एक्ट्रेस सबा कमर के रोल में राज की वाइफ बनी मीता अपनी बेटी को कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाना चाहती है क्योंकि कॉन्वेंट एजुकेशन उसके लिए जरूरत से ज्यादा ‘स्टेटस का सिंबल’ है.

राज दिल्ली के सरकारी स्कूल में पढ़ा एक देसी इंसान है वो हिंदी में ही सोचता है और हिंदी में ही बोलता है. मीता अपनी बेटी पीया को राज की तरह नहीं बनाना चाहती इसी के लिए उसे पीया को कॉन्वेंट में भेजना है. तैयारी शुरू होती है. परिवार चांदनी चौक से निकलकर वसंत विहार में शिफ्ट हो जाता है. ये हर घर की कहानी इसलिए लगती है क्योंकि बच्चों के स्कूल के हिसाब ले लोग घर शिफ्ट कर लेते हैं.

पैरेन्ट्स की नर्सरी

कॉन्वेंट्स ने पढ़ाई के नाम पर किस तरह से अपने सिस्टम का बाजारीकरण कर लिया है और उसमें फिट होने के लिए बच्चे से पहले पैरेंट्स को कैसे इंटरव्यू की तैयारी करनी पड़ती है, उसे इस फिल्म में बड़े ही मजेदार तरीके  से दिखाया गया है. इसकी तैयारी में इरफान और सबा की एक्टिंग लाजवाब है.

एडमिशन की तिकड़म

इतने के बाद भी जब पिया का नाम किसी कॉन्वेंट स्कूल की लिस्ट में नहीं आता तो राज को लेना पड़ता है ‘गरीबी’ का सहारा. राज फर्जी डॉक्यूमेंट के सहारे बीपीएल कोटे से पीया के एडमिशन की कवायद शुरू करता है और वसंत विहार जैसी पॉश जगह से ये परिवार एक झुग्गी बस्ती में शिफ्ट हो जाता है. ताकि अगर कोई इन्क्वारी हो तो मौके पर मौजूद रह सकें. मीता यहां गरीबी की ट्रेनिंग लेती है और राज फैक्ट्री में काम करने जाता है. ये सब एडमिशन की खातिर.

दीपक डोबरियाल का जादू

एक्टर दीपक डोबरियाल पहले भी अपनी फिल्मों में एक्टिंग का कमाल दिखा चुके हैं. यहां भी फैक्ट्री वर्कर श्याम के तौर पर उनकी एंट्री कमाल की है. गरीबी में वो राज का साथ देते हैं. बीपीएल कोटे से वो भी अपने बेटे का एडमिशन उसी स्कूल में कराना चाहता है जिसमें राज की बेटी ने फॉर्म भर रखा है. राज की दोस्ती में वो अपनी जान भी दांव पर लगा देता है.

एडमिशन का ट्विस्ट

स्कूल की लॉटरी सिस्टम में राज की लॉटरी निकल आती है और गरीब कोटे से पीया का एडमिशन तो स्कूल में हो जाता है लेकिन राज को इसके लिए की गई तिकड़म पर पछतावा होता है क्योंकि श्याम उसे कहता है कि उसने उसके बेटे की सीट पर ‘डाका’ डाला है.

कैसे मिलेगा न्याय?

तो क्या राज श्याम के बेटे को वापस उसी स्कूल की सीट दिला पाता है, इसी सवाल के जवाब की खातिर हम आपको इस फिल्म को देखने की सिफारिश करते हैं.

एक्टिंग

इरफान खान की एक्टिंग के बारे में चर्चा करना इसलिए फिजूल है क्योंकि वो एक दो नहीं अपनी हर फिल्म में खुद को साबित कर चुके हैं. पाकिस्तानी एक्ट्रेस सबा कमर की एक्टिंग के लिए उन्हें पूरे नंबर मिलने चाहिए क्योंकि पत्नी के रोल में उनकी एक्टिंग लाजवाब है और वो कई मौकों पर इरफान पर भारी पड़ी हैं. वो तो प्रड्यूसर्स को पाकिस्तानी स्टार्स के साथ काम करने से रोका जा रहा है वर्ना सबा के लिए इस फिल्म के बाद फिल्मों की लाइन लगना तय माना जा सकता है.

दीपक डोबरियाल ने फिल्म को आगे बढ़ाने में बड़ा रोल प्ले किया है. अमृता सिंह कड़क प्रिंसिपल के तौर पर अपना अच्छा प्रभाव छोड़ने में कामयाब हुई हैं.

फिल्म में नहीं हैं गाने

हिंदी मीडियम में गाने नहीं हैं पूरी स्टोरी आपको बांधे रखती है. अच्छी खबर ये है कि डायरेक्टर साकेत इस बात से पूरी तरह कॉन्फिडेंट नजर आते हैं कि गैर जरूरी गानों से फिल्म और लोगों के वक्त को बर्बाद नहीं किया जा सकता. इसके लिए उनकी तारीफ जरूरी है. एक छोटा सा स्टेज परफॉर्मेंस है, जिसे स्टोरी को आगे बढ़ाने के लिए बड़ी ही खूबसूरती से कोरियोग्राफ कराया गया है.

मैसेज पर है जोर

इस फिल्म के हीरो न तो इरफान खान हैं और सबा कमर और न दीपक डोबरियाल, इसकी हीरो है इस फिल्म की स्टोरी जिसने समाज को एक बड़ा मैसेज देने की कोशिश की है. अच्छी स्टोरी के लिए हिंदी मीडियम को आप अपनी पूरी फैमिली के साथ जाकर जरूर देखिए क्योंकि इसमें आपको कहीं ना कहीं अपनी कहानी भी जरूर देखने को मिलेगी.

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