S M L

हम बैलगाड़ी से चल कर तो फिल्म का प्रोमोशन नहीं करेंगे : गुरदीप सप्पल

फिल्म राग देश के प्रोमोशन पर उठते सवालों को लेकर राज्यसभा टीवी के सीईओ के जवाब

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Aug 05, 2017 11:55 PM IST

0
हम बैलगाड़ी से चल कर तो फिल्म का प्रोमोशन नहीं करेंगे : गुरदीप सप्पल

फिल्म ‘राग देश’ को लेकर फर्स्टपोस्ट हिंदी के रिपोर्टर रविशंकर सिंह ने राज्यसभा टीवी के सीईओ और फिल्म के प्रोड्यूसर गुरदीप सप्पल से विस्तार से बात की. उन्होंने सभी सवालों के जवाब दिए.

प्रश्न- फिल्म 'राग देश' बनाने का क्या उद्देश्य था? फिल्म बनाने की जरूरत राज्यसभा टीवी को क्यों पड़ी?

जवाब- देखिए, हम जो भी काम करते हैं उसमें सारी पार्टियों की सहमति होती है. हमारी एक कमेटी है जिसमें सारे राजनीतिक दलों के सदस्य शामिल हैं. उन सदस्यों का ये मानना था कि इस देश में लोगों को इतिहास बताने की जरूरत है. क्योंकि हमलोग इतिहास भूल चुके हैं.

इसमें ये हुआ कि हमलोगों ने पहले संविधान धारावाहिक बनाया. संविधान इतना सफल हुआ कि आज हमारे प्रधानमंत्री विदेश जाते हैं तो गिफ्ट के तौर पर राज्यसभा द्वारा बनाए गए संविधान की कॉपी देते हैं.

नेपाल में संविधान बनने की प्रक्रिया जब शुरू हुई तो मेरे पास नेपाल से फॉर्मल रिक्वेस्ट आई कि मुझे संविधान की कॉपी चाहिए उन्होंने कहा हम चाहत हैं कि आपके संविधान कैसे बना हैं.

ये काम आज तक किसी ने नहीं किया. राज्यसभा टीवी के तौर पर वो काम हमने किया. संविधान धारावाहिक जब सफल हुआ तो ये तय हुआ कि हमलोग इसको एक कदम और आगे ले जाएंगे.

फिर हमलोगों ने एक नया फॉर्मेट विकसित किया. एक विषय टीवी सीरीज और दूसरा फिल्म. लोग फिल्म देखना पसंद करते हैं. दो घंटे की फिल्म में सारी कहानी आ जाती है.

उसमें हमलोगों ने तीन विषय लिया. दो विषय पर हमारा इनपुट था और एक पर सरकार के तरफ से इनपुट आया.

आजाद हिंद फौज और सुभाष चंद्र बोस के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. इसलिए हमलोगों ने निर्णय किया कि एक फिल्म सुभाष चंद्र बोस पर बनाएंगे. सरदार पटेल पर भी हम लोग एक फिल्म बना रहे हैं. इस पर हमारा काम चल रहा है.

सरदार पटेल ने 562 रियासतों को एक किया था. पूरी दुनिया के इतिहास में बिना युद्ध किए इतने रियासतों को जोड़ कर एक बना दिया गया. ये कहीं नहीं हुआ. पांच हजार साल के इतिहास में ऐसा कहीं उदाहरण देखने को नहीं मिलता है.

इन रियासतों के साथ कौन सा युद्ध हुआ. गोवा और हैदराबाद के साथ युद्ध हुआ तो जुनागढ़ को धमकी दिया गया था. इसके अलावा 559 राज्यों को बिना युद्ध के सरदार पटेल ने मिला दिया. अब आप ही बताएं देश को कहानी कहने की जरूरत है कि नहीं?

तीसरा यह था कि सरकार फौज के इतिहास पर भी कुछ बनाना चाहती थी. हमने इसके लिए भी एक फिल्म पर काम पूरा किया हुआ है उसमें श्याम बेनेगल हमारे कंसलटेंट हैं.

इस प्रोजेक्ट के भी दो पार्ट हैं. एक है फिल्म और दूसरा जो सात युद्ध भारतीय सेनाओं ने लड़े, पहला विश्वयुद्ध, दूसरा विश्वयुद्ध, 47 का युद्ध, 62 का युद्ध, 65 का युद्ध, 71 का युद्ध और कारगिल का युद्ध ये सात फिल्में बननी हैं.

इन सभी पर फिल्म बनाने का उद्देश्य बताता हूं कि इंडिया गेट के पास जो प्रिसेंस हॉल है जहां भारतीय आर्म्स फोर्सेज के स्मारक हैं. यह फिल्म इसी उद्देश्य से बनाई जा रही है.

राज्यसभा टीवी यह सारे काम कर रही है. इस तरह की फिल्म तो सरकार की ही कोई एजेंसी बनाएगी और सबसे बड़ी बात यह है कि संविधान मेरा पहला सीरियल था. सारे किरदार पॉलिटिकल थे. कोई भी गैरराजनीतिक किरदार ‘संविधान’ सीरियल में नहीं है.

'राग देश' में भी सारे किरदार पॉलिटिकल हैं. एक भी राजनीतिक दल ने उंगुली नहीं उठाई. ईमानदारी क्या है? आज के समय में कोई चीज आप लें, और राजनीतिक विषय होने के बावजूद उस पर उंगली न उठे. इससे बढ़कर मेरे लिए क्या चीज है. यही मेरा उद्देश्य है.

प्रश्न- फिल्म का बजट क्या है?

जवाब- फिल्म और सीरियल 13 करोड़ 12 लाख रुपए में बने हैं और डिस्ट्रीब्यूशन और बाकी के खर्चे जैसे प्रोमोशन मिला कर 7 करोड़ 95 लाख रुपए लगे हैं.

प्रश्न- जब आपने यूएफओ को फिल्म राग देश की मार्केटिंग राइट्स दे दिए तो पिछले एक महीने से राज्यसभा टीवी पर इतना मार्केटिंग करने की क्या जरूरत थी?

जवाब-  हमने टेंडर निकाला. देश में जितने भी डिस्ट्रीब्यूटर हैं, चाहे वह पीवीआर है, चाहे आईनॉक्स है या फिर यशराज फिल्म्स. सबको हमने ईमेल किया कि हमारा टेंडर निकला है आप अप्लाई कीजिए. पांच ने आवेदन किया जिसमें यूएफओ जीता. सारा काम नियम-कानून से हुआ है.

अब यूएफओ तो एक एजेंसी है उसको फिल्म के बारे में क्या पता है? उसको फिल्म के थीम के बारे में क्या पता है? वो तो राज्यसभा टीवी के आदमी ही जाकर पब्लिक में बताएंगे. तो हमलोग गए.

आपने अगर कोई प्रोजेक्ट बनाया तो उसकी पब्लिसिटी तो करेंगे. हमारे देश में आज तक का इतिहास क्या है? एनएफडीसी भी फिल्म बनाता है. फिल्म डब्बे में बंद हो जाती है. कोई जानता तक नहीं. राज्यसभा टीवी की सफलता मानी जा रही है कि हमने फिल्म बनाई और सफलता से रिलीज भी हुई और आगे स्कूलों में दिखाई भी जाने वाली है.

प्रश्न- कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म के बहाने आप राज्यसभा टीवी के अपने कुछ लोगों को सैर करा रहे हैं?

जवाब- भाई हम तो इंसान हैं. आधुनिक मुल्क का राज्यसभा टीवी आधुनिक चैनल है. आज आम आदमी भी फ्लाइट से चलता है. हम तो बैलगाड़ी से चल कर तो प्रोमोशन नहीं करेंगे.

अफ्रीका के माली जैसे किसी दूर-दराज इलाके में तो राज्यसभा टीवी नहीं बसा है. सरकारी सिस्टम के अंदर फ्लाइट से वही आदमी जा सकता है जो फ्लाइट से जाने का अधिकारी होता है. फ्लाइट का क्या मतलब है? आज राज्यसभा टीवी प्राइवेट चेनलों को टक्कर देता है. क्योंकि हम आधुनिक चैनल हैं. फ्लाइट में चलना इस देश में गुनाह कब से होने लगा? रेलवे की आधी बोगियां खाली जा रही है क्योंकि आम आदमी ने फ्लाइट से चलना शुरू कर दिया है.

प्रश्न- संसद का मॉनसून सत्र चल रहा है. ऐसे में जनता से जुड़े मुद्दे उठाने के बजाए राज्यसभा टीवी पर सिर्फ फिल्म का ही प्रोमोशन क्यों किया जा रहा है?

जवाब- मोबाइल पर राज्यसभा की कार्यवाही दिखाते हुए और पीछे अपने चैंबर में टीवी दिखाते हुए कहते हैं. पीछे क्या चल रहा है? संसद की कार्यवाही को लाइव दिखाया जा रहा है. यूट्यूब देख रहे हैं. अगस्त चार की सारी डिबेट आ रही हैं. ये काम कौन कर रहा है? लाइव भी हो रहा है. यूट्यूब पर भी है और ट्विटर पर भी है.

हमने अगर फिल्म बनाई और हम अपने चैनल पर इस फिल्म का प्रोमोशन नहीं करते तो आप मुझसे आ कर पूछते कि इस फिल्म में आप क्या छुपा रहे हो. अगर संसद की कार्यवाही चल रही है तो तब थोड़े हम फिलर दिखाएंगे. अगर कार्यवाही रुक गई है तो हम फिलर दिखाएंगे. हमारा प्रोडक्ट है फिल्म. इसके लिए तो हमे पैसा देने नहीं पड़ते हैं.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi