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मैं बच्चों के साथ बच्चा हो जाता हूं: गुलजार

गुलजार गर्मी की छुट्टियों में बच्चों के लिए पिनोकियो नाम के नाटक का भारतीय रूपांतरण लेकर आ रहे हैं, पेश है रूना आशीष से उनकी बातचीत

Runa Ashish | Published On: May 17, 2017 07:09 PM IST | Updated On: May 17, 2017 07:09 PM IST

मैं बच्चों के साथ बच्चा हो जाता हूं: गुलजार

पिनोकियो वो होता है जो झूठ बोलता है. मुझसे ज्यादा झूठ कौन बोलता है. मेरी सारी शायरी झूठी है. मुझे झूठ ही तो बोलना होता है और क्या.

मैं कहता हूं कि मैं सारे सितारे लाकर तुम्हारे कदमों में रख दूंगा... कभी रखा है मैंने या किया है ऐसा मैंने? मैं ऐसे ही झूठ बोलता रहता हूं. मेरी नाक सबसे बड़ी होनी चाहिए. मैं तो खुद एक पिनोकियो हूं.

जब लोगों में अपनी खास छाप बनाने वाले और बाल साहित्य और फिल्मी-गैर फिल्मी गीतों में अपनी परचम लहराने वाले गुलजार ऐसी बातें करें तो हजम कर पाना मुश्किल होता है.

लेकिन गुलजार के इस नए अनजाने रूप को बच्चे आपके सामने ला रहे हैं. दरअसल गुलजार गर्मी की छुट्टियों में बच्चों के लिए पिनोकियो नाम के नाटक का भारतीय रूपांतरण लेकर आ रहे हैं.

पिनोकियो एक म्यूजिकल है. इस म्यूजिकल का निर्देशन सलीम आरिफ कर रहे हैं और लुबना सलीम इस शो में कॉस्ट्यूम निर्देशक हैं.

कार्लोस की असली कहानी पिनोकियो को एक म्यूजिकल बनाकर पेश किया गया है. इसमें पिनोकियो के किरदार में श्रेया आचार्य दिखाई देने वाली हैं. नाटक और उससे जुड़ी कई जानकारी के लिए फ़र्स्टपोस्ट संवाददाता रूना आशीष ने गुलजार से बातचीत की.

आपको मैंने बच्चों के साथ बच्चा बनते देखा अभी. लगता नहीं कि आप वही हैं जिन्हें भारत सरकार ने पद्मभूषण और साहित्य अकादमी अवॉर्ड से नवाजा है?

बस ये ही होता है कि आप बच्चों के साथ काम करें और आप खुद भी बच्चे बन जाते हैं. मैंने इन नाटक के कुछ भाग इसके मूल लेखक कार्लो से लिए. कार्लो ने ये कहानी 19 वीं शताब्दी में लिखी थी. मेरे हिसाब से ये कहानी दुनिया के हर जुबान में लिखी गई है.

लेकिन हिंदी या हिंदुस्तानी में कहीं नजर नहीं आया था. इस कहानी को नाटक बनाने की कई सारी संभावनाएं थीं. इसमें कुछ छोटे-मोटे बदलाव किए गए वो भी इसीलिए क्योंकि ये हमारे समय और वातावारण के लगें.

इतने बदलाव तो हर किसी ने किए भी हैं चाहे वो चायनीज में हो या जापानीज में हो या किसी यूरोपीय भाषा में. वैसे ये नाटक मूल रूप से इटैलियन में लिखा गया है. जब मैंने इसे हिंदुस्तानी में लिखा तो इसे म्यूजिकल बना दिया.

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तस्वीर: पिनोकियो के बाल कलाकारों के साथ गुलजार

पिनोकियो का नाटक के मंच पर कैसे आया?

मेरा पिनोकियो तो मेरी किताब में पड़ा रह जाता किसी कार्टून की तरह. किसी दिन किताब का कार्टून बन जाता या पुतला बन कर रह जाता. निर्देशक सलीम आरिफ ने उसे एक जिंदगी दे दी.

मैंने फिल्में की हैं और मैं जितना सोच सकता था वो यह था कि किसी दिन पिनोकियो की एक फिल्म बनेगी या फिर उस पर कभी कोई एनिमेशन फिल्म बनेगी.

वैसे भी थिएटर कभी भी मेरा मीडिया नहीं रहा है. मुझे ये मीडिया सलीम ने सिखाया है. एक दिन वो आए और मैंने उन्हें अपनी ये कृति दिखाई और पिनोकियो मंच पर आ गया.

अब ये नाटक म्यूजिकल है तो इसके संगीत पर खास ध्यान दिया गया होगा?

इस नाटक के संगीत निर्देशक को मैं यहां दाद देना चाहूंगा क्योंकि म्यूजिकल होने के नाते इसमें संगीत की बहुत ही अहम जगह थी, जो पूरी की गई है.

सुजीत को संगीत की अच्छी समझ है. वो हर बार नाटक में कुछ नया ही संगीत ले आता है. एक तो यह नाटक का संगीत है. यहां हर एक को गाना है. फिर एक साथ सभी से गवाना भी उतनी ही बड़ी चुनौती होती है. लेकिन संगीतकार ने वो किया है.

इसमें पिनोकियो की नाक पर भी एक गाना हमने किया है. मुझे इसके सारे गाने बड़ें पसंद आए. इसमें मेरी आवाज में मेरे कुछ मोनोलॉग भी होंगे. क्या इसके पहले पिनोकियो भारत के मंच पर आया है

इसके पहले पिनोकियो पर बिरजू महाराज की टीम की तरफ से कथक में भी किया गया था. उनकी बेटी शाश्वती ने दिल्ली में 200 बच्चों को लेकर कथक में पिनोकियो को पिरोया था. यह बहुत ही खूबसूरत था. लेकिन क्या करें अब वो बच्चे बड़े हो गए हैं.अब वो बच्चे बच्चे नहीं रहे. लेकिन वो प्रोग्राम था बड़ा खूबसूरत.

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अब जब आपकी कहानी एक नाटक में तब्दील हो गई है तो कैसा लग रहा है?

इसमें सबसे अच्छी चीज मेरे हिसाब से एक तो ऐक्टिंग है. श्रेया नाम की लड़की पिनोकियो बनी है. फिर संगीत है और फिर कॉस्ट्यूम है. इसमें एक लोमड़ी है एक बिल्ली भी है. फिर कठफोड़वा भी है. इन कठफोड़वो की नाक ने भी कमाल किया है. वो तो नाक से ही काम कर गया. यानी मुझे यह म्यूजिकल बहुत अच्छा लग रहा है.

बच्चों के साहित्य में कई बातें ऐसी सिखाई जाती हैं जो असल जिंदगी में नहीं होती फिर भी उन्हें सिखाया जाना क्या जरूरी है?

पुस्तक लेकर स्कूल जाना बहुत जरूरी है वर्ना ज्ञान कहां से मिलेगा. वैसे भी बच्चों को सिखाना नहीं होता है. वो नाटकों का काम भी नहीं है. लेकिन वो कैसे बातों ही बातों में कई बातें बच्चों को सिखा जाते हैं, यह बड़ी चीज है.

बच्चों की परिकथाओं की खूबसूरत दुनिया दिखाई जाती है लेकिन बड़े होकर पता चलता है कि असल जिंदगी में ऐसा बिल्कुल नहीं होता है. तो बड़े हो कर परियां कहां से मिलेंगी?

कभी परिकथाओं में महाभारत मत खोजिए. अगर आप बड़े हो कर परियों की खोज करेंगे तो आपको एक फिर से एक बार बाल साहित्य को समझना होगा.

आपको बाल साहित्य को बच्चा बन कर समझना होगा ना कि समीक्षक या महाभारत के युधिष्ठिर की तरह. इन सबको भीष्म पितामह की तरह मत देखिए. बच्चा बन कर इस साहित्य के मजे लूटिए.

बच्चों के लिए लिखने के लिए आप क्या कोई नया रूप ले लेते हैं. क्योंकि आपके मोगली, दानासुर और पोटली बाबा की अभी तक लोगों को याद है?

मैं अपने लिए ये ही कर सकता हूं कि मैं बच्चों में अपने आप को गुम कर लेता हूं. मैं शुरु से ही बच्चों के लिए लिखता रहा हूं. तो मैं तो कभी बड़ा ही नहीं हुआ हूं. तो मैं तो बच्चों में रम जाता हूं तो पिनोकियो की नाक पहनना और उसे खींचना मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं लगती है.

मैं अगर कोई ऐक्टर होता और उस उम्र का होता तो मैं सलीम आरिफ के पीछ पड़ कर अपने लिए कोई रोल भी मांग लेता.

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