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Review बहन होगी तेरी : गर्मी ज्यादा लगे तभी देखने जाएं

इस फिल्म के मेकर्स और स्टार्स शायद नहीं चाहते कि ये फिल्म चले इसलिए इन लोगों ने इस फिल्म का कहीं भी प्रमोशन नहीं किया

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Abhishek Srivastava | Published On: Jun 07, 2017 06:55 PM IST | Updated On: Jun 07, 2017 06:55 PM IST

Review बहन होगी तेरी : गर्मी ज्यादा लगे तभी देखने जाएं
निर्देशक: अजय पन्नालाल
कलाकार: राजकुमार राव, श्रुति हसन, रंजीत, गुलशन ग्रोवर, अजय पन्नालाल

अगर कहानी आपके खुद के घर की है या फिर अगर आपने फिल्म के उन पलों को जिया है तो कहानी कहने में कुछ ज्यादा ही मज़ा आता है. बहन होगी तेरी की सबसे बड़ी सफलता यही है.

अगर आप इस फिल्म को देखेंगे तो इस बात को मैं पहले ही बताना चाहूंगा कि फिल्म में श्रुति हसन के भाई बने अज्जु दरअसल निजी जिंदगी में फिल्म के निर्देशक अजय पन्नालाल हैं और फिल्म के कई सीक्वेंसेस उनकी निजी जिंदगी से लिये गये हैं. बहन होगी तेरी एक बार फिर से फिल्म जगत में उत्तर प्रदेश के माहौल की चल रही हवा को भुनाने की कोशिश करती है.

इसका परिणाम तनु वेड्स मनु तो नहीं है लेकिन फिर भी फिल्म को देखने में मज़ा आता है. फिल्म का पहला हाफ ठंडे हवा के झोंके की तरह है लेकिन मध्यांतर के बाद गरम लू के थपेडों से कुछ जगहों पर आपको दो चार होना पड़ सकता है.

कहानी लखनऊ के दो परिवारों की है जहां पर फिल्म के मुख्य किरदार राजकुमार राव (गट्टू) और श्रुति हसन (बिन्नी) का परिवार आमने सामने रहता है. दोनों ही परिवारों में घनिष्ठ संबंध है और सुख-दुख के साथी हैं. आग चल कर गट्टू को बिन्नी से इश्क हो जाता है लेकिन रुढ़िवादी परंपराओं के चलते ये अपने परिवारों के सामने अपने प्रेम का इज़हार नहीं कर पाते हैं.

दो परिवार के बच्चों के बीच प्यार पनपने पर एक तरह की अनकही पाबंदी है. और इन्हीं वजहों से उस मोहल्ले के लड़के रक्षाबंधन के दिन अपने घरों से कोसों दूर जाकर छुप कर अपना दिन बिताते हैं.

जो भी अपने प्रेम का इज़हार मोहल्ले की लड़कियों से करने की कोशिश करता है उसकी कलाई पर राखी बांध दी जाती है. गट्टू इसी सोच का मारा है लिहाज़ा दोनों परिवार और दुनिया उसे बिन्नी का भाई मानने लगती है. इस बीच तमाम गलतफहमियां होती है जिसका निपटारा सुखद तरीके से फिल्म के क्लाइमेंक्स में हो जाता है.

राजकुमार राव हैं फिल्म की जान

गट्टू के किरदार में राजकुमार राव ने एक बार फिर से जता दिया है कि अभिनय की बारिकियों को उन्होंने अपने छोटे से करियर में बड़े ही ध्यान से समझ लिया है. लखनऊ के एक ऐसा लड़का जिसका समय क्रिकेट और प्यार की बीच गुजरता है और किताबों में मन बिल्कुल नहीं लगता है, के किरदार में राव ने जान डाल दी है.

श्रुति के रोल में दम नहीं

श्रुति हसन के किरदार पर मेट्रो हैंगओवर नजर आता है. काश थोड़ी बहुत मेहनत श्रुति अपने बोलने के लहज़े पर कर लेती तो मज़ा कुछ और हो सकता था. ज़रा याद कीजिये तनु वेड्स मनु में कंगना का किरदार. निनाद कामत.

मजेदार हैं रंजीत

बिन्नी के भाई के रोल में और ताऊ के रोल में एक लंबे अरसे के बाद नजर आयें रंजीत को देखने में बेहद मज़ा आता है तो वही दूसरी ओर गट्टु के दोस्त भूरा के रोल में हेरी टंगरी और गट्टु के पिता के रोल में दर्शन जरीवाला काफी लाउड नजर आते है.

डायरेक्टर ने भी की है एक्टिंग

फिल्म के निर्देशक अजय पन्नालाल ने अपनी फिल्म में ही अपने टैलेंट का सबूत दे दिया है लेकिन यहां पर इस बात को कहना पड़ेगा कि इस टैलेंट को अभी और निखरना होगा. फिल्म के पहले हाफ में आपको हंसने के कई मौके मिलेंगे. मसलन जब राजकुमार राव का प्रपोसल श्रुति हसन मना कर देती है तब बेहद हंसी आती है या फिर जब राजकुमार राव नशे की अवस्था में अपने दोस्त के साथ मिलकर दुनिया के सारे ‘राहुलों’ की दुहाई देते हैं कि आखिर में लड़की वही ले जाते हैं और लड़की की शादी उन्हीं के साथ होती है. फिल्म में लखनऊ के माहौल को भी अच्छी तरह से पिरोया गया है.

बीच में बोर भी करती है स्टोरी

सही मायने में इस फिल्म की कहानी बेहद ही सपाट है लेकिन अगर किसी चीज में दम है तो वो है इसके सीक्वेंसेज यानि की दूसरे शब्दों में इसका स्क्रीनप्ले. ये फिल्म दो घंटे और आठ मिनट की है लेकिन दूसरे हाफ में एक मौका आयेगा जब आपको लगेगा की ये फिल्म कब खत्म होगी.

क्लाइमैक्स तो पहले ही निकल गया

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि देखने वाला यही सोचता है कि राजकुमार राव अपने प्रेम का इजहार आखिर कब करेंगे? चिढ़ तब मचती है जब पानी सर के ऊपर से क्लाइमेंक्स के आधे घंटे पहले गुज़र जाता लेकिन राजकुमार राव की चुप्पी बराबर बनी रहती है.

फुस्स पटाखा निकली रंजीत-गुलशन की एंट्री

जब फिल्म के आखिर में रंजीत और गुलशन ग्रोवर की एंट्री होती है तब यही लगता है कि मज़ा दोगुना हो जायेगा लेकिन ये एक फुसफुसा पटाखे की तरह ही है. लेकिन फिल्म में कई चीजें ऐसी भी है जिसकी वजह से आप इस फिल्म को एक बार ज़रुर आजमा सकते हैं.

ये फिल्म किसी चीज का ढोंग नहीं करती है और इसकी सफलता इसी बात में छुपी है. और आखिर में इस फिल्म के डायलॉग के बारे में जरूर कहूंगा कि फिल्म में ये कैटेलिस्ट का काम करता है. इसकी वजह से आपको महसूस होगा कि आप लखनऊ में हैं.

आप इस हफ्ते सिनमाघरों में जाकर खुल कर हंस सकते हैं. बहन होगी तेरी से आपको इस गर्मी में निजात मिलेंगी.

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