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Director's Cut : डायरेक्टर का काम जेंडरलेस होता है - फराह खान

फराह खान के एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में पढ़िए उनकी आने वाली फिल्मों के प्लान्स और बॉलीवुड पर उनकी बेबाक राय

Bharti Dubey Updated On: Oct 19, 2017 07:21 AM IST

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Director's Cut : डायरेक्टर का काम जेंडरलेस होता है - फराह खान

फराह खान ने कंटेंट, फिल्म्स और इवेंट फिल्म्स के बारे में बात की. उन्होंने बताया कि क्यों वह महिला डायरेक्टर को अलग रखकर देखने को पसंद नहीं करती हैं. उन्होंने यह भी कहा कि आज की पीढ़ी काम को लेकर काफी भावशून्य है और ये केवल सहयोगी रहते हैं जिससे लंबी दोस्ती या दुश्मनी की जगह नहीं रह जाती है.

जब आप शूटिंग नहीं कर रही होती हैं तब आप टीवी शो और इवेंट्स में व्यस्त दिखाई देती हैं.

ऐसा नहीं है, मैं साल में केवल एक या दो शो करती हूं. जब मैं निर्देशन नहीं कर रही होती हूं तो मैं अपने बच्चों के साथ छुट्टियां बिताती हूं. मैंने तय कर लिया है कि केवल स्टूडियोज तक सीमित रखने के लिहाज से जिंदगी काफी छोटी है. ऐसे में मैं बच्चों या मेरे बच्चों के स्कूल की मम्मियों के साथ साल में 4-5 हॉलिडे प्लान करती हूं.

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आपने ब्लॉकबस्टर मूवीज दी हैं. ऐसे में मौजूदा वक्त के ट्रेंड्स को आप कैसे देखती हैं. यहां कंटेंट फिल्में भी अच्छा कर रही हैं और जुड़वां 2 जैसी फिल्म भी बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड बनाती है.

हम दोनों का मिक्स रख सकते हैं. जैसे दंगल या ओम शांति ओम, जिनमें कंटेंट था, ये कंप्लीट एंटरटेनर्स थीं और इन्होंने खूब पैसा कमाया. लेकिन, आलोचक कमर्शियल फिल्मों को नकारना पसंद करते हैं. अगर कमर्शियल फिल्में नहीं आएंगी तो कंटेंट फिल्में बनाने के लिए पैसा कहां से आएगा. हमें इस वक्त दोनों में संतुलन बनाने की जरूरत है. लेकिन, इसकी कोई परवाह नहीं करता. मिसाल के तौर पर, वे 30 करोड़ रुपये कमाने वाली फिल्म को सुपरहिट बताते हैं और 120 करोड़ कमाने वाली फिल्म को फ्लॉप. कंटेंट आधारित फिल्मों को भी मनोरंजन करना चाहिए. बोर होने के लिए कोई भी 500 रुपये खर्च नहीं करेगा. अगर आप बोर होना चाहते हैं तो 500 रुपये खर्च करने की बजाय अपने पति के साथ लॉन्ग ड्राइव पर जाइए.

आपको आज के दौर का मनमोहन देसाई कहा जाता है...

मैंने मनमोहन देसाई का सिनेमा एंजॉय किया है, लेकिन मैं उनका अनुसरण नहीं करती हूं. वह आज भी प्रासंगिक हैं. आपको 1977 के दौर की कंटेंट आधारित फिल्में याद नहीं होंगी, लेकिन आपको अमर अकबर एंथोनी और नसीब याद होगी. आपको अमिताभ बच्चन की एक्शन फिल्में याद होंगी, लेकिन अमोल पालेकर की फिल्में पता नहीं होंगी. और मुझे पूरा भरोसा है कि उस वक्त भी उनके जैसे फिल्ममेकर की क्रिटिक्स द्वारा आलोचना की जाती होगी और उन्हें गालियां मिलती होंगी. ऐसे में यह एक पुरानी परंपरा है. आज यही सिनेमा है जिसे हम पीछे मुड़कर देखते हैं, उनके सिनेमा से बॉलिवुड की पहचान है.

इसके साथ ही, हमें आगे भी बढ़ना होगा. आप पीछे नहीं जा सकते और यह नहीं कह सकते कि मैं बिना किसी लॉजिक के फिल्म नहीं बनाऊंगा. आज हमारे पास नेटफ्लिक्स और एमेजॉन पर इतना सारा कंटेंट है. किसी को भी घर से लाने और 500 रुपये चुकाने के लिए राजी करना काफी मेहनत का काम है. मुझे अभी भी लगता है कि लोग इवेंट फिल्म देखने के लिए आएंगे, जिन्हें वह एमेजॉन या नेटफ्लिक्स पर नहीं पाते हैं.

लेकिन इवेंट फिल्में रोज नहीं आतीं?

इसीलिए मैं हर रोज फिल्में नहीं बनाती. मौजूदा वक्त में किसी इवेंट फिल्में में ज्यादा लॉजिक होना चाहिए क्योंकि फोन रखने वाला हर शख्स एक क्रिटिक है. इसी वजह से मैं और शिरीष हर वक्त चर्चा करते रहते हैं. फिल्म बनाने के लिए फिल्म नहीं बनाती. इसके अलावा मैं हमेशा फिल्मों के बीच में गैप रखती हूं. मेरी भी जिंदगी है.

क्याआज हर कोई क्रिटिक हैये तथ्य आपको डराता है?

सोशल मीडिया पर मौजूद सभी के लिए यह डराने वाला है. आपको पूरी तरह से खत्म किया जा सकता है. प्रतिस्पर्धी ट्रोल्स को हायर कर रहे हैं ताकि आपको डराया जा सके. मुझे याद है वह वक्त जब वे हैपी न्यू ईयर को खत्म कर रहे थे. आज की तारीख में कोई 200 करोड़ रुपये कर के दिखा दे. कोई फिल्म जो कि रिलीज के भी लायक नहीं है, उसे आज देखा जा रहा है, खासतौर पर बच्चों द्वारा.

यह हकीकत है, यहां तक कि मेरी ननद भी हैपी न्यू ईयर बार-बार देखती है. यह टीवी पर सुपरहिट साबित हुई. असली लोग आपको सोशल मीडिया पर डराते या ट्रोल नहीं करते. ऐसे कुछ लोग हैं जो कि आपके सिनेमा को कभी पसंद नहीं करते और डल और बोरिंग फिल्में पसंद करते हैं, लेकिन ये फिल्में हमारी इंडस्ट्री को नहीं बचातीं. इसमें कोई दिक्कत नहीं है कि आपको हमारी फिल्में पसंद नहीं हैं, लेकिन उन्हें खत्म करने की कोशिश मत करिए.

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मुझे लगता है कि कमर्शियल फिल्ममेकर्स कहीं ज्यादा सिक्योर हैं. मूवीज के बनने के साथ ही कुछ लोग हमेशा उसे खत्म करने में लग जाते हैं. शोले और पाकीजा को ही देख लें. इन्हें तकरीबन खत्म कर दिया गया था. लेकिन, देखिए कि ये फिल्में आज कहां पर हैं, इन्हें कल्ट फिल्मों में रखा जाता है.

आपको महिला निर्देशक कहलाना पसंद नहीं है?

मुझे यह अच्छा नहीं लगता क्योंकि लोग आपको एक कैटेगरी में बांध देते हैं. मैं एक मेनस्ट्रीम डायरेक्टर हूं और मुझे बड़े डायरेक्टर्स में गिना जाना चाहिए. आप मुझे महिला निर्देशकों में रखना चाहते हैं जिन्होंने कभी ऐसी मूवी नहीं बनाई जिसने 200 करोड़ रुपये की कमाई की हो. एक डायरेक्टर का जॉब जेंडरलेस होता है. यह किसी एक्टर या एक्ट्रेस का काम नहीं है.

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लेकिन, क्या कभी जेंडर आपके रास्ते की रुकावट बना है?

मेरे साथ ऐसा कभी नहीं हुआ. बल्कि, मुझे महिला होने और बड़ी फिल्में बनाने के लिए काफी शाबाशी मिली. मैं इस बात से परेशान हो जाती हूं जब मुझसे पूछा जाता है कि मैं किस तरह की फिल्में बनाती हूं. मैं उन्हें बताना चाहती हूं कि जाओ और रोहित शेट्टी और राजू हिरानी से उनकी तरह की फिल्मों के बारे में पूछो. दर्शकों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि किसने फिल्म बनाई है. अगर मैं फरहा की जगह फरहान को रख दूं तो क्या वे मैं हूं ना को ज्यादा पसंद करते?

मैं इस बात से भी परेशान होती हूं जब मुझे अन्य महिला डायरेक्टरों के साथ कोई कवर करने के लिए कहा जाता है. मैं उन्हें बताती हूं कि क्या मुझे तभी बुलाएं अगर वे बड़े डायरेक्टर्स के साथ शूट कर रहे हैं, अन्यथा नहीं. लेकिन, मैं पुरुष डायरेक्टरों और उनके ईगो को देखकर हैरान हूं. इनमें 10 फीसदी टैलेंट है और बाकी का घमंड. और मुझे पता है कि मैंने उनके लिए कितना किया है. उन गीतों ने उनकी फिल्में बनाई हैं. मुझे एक टेक्नीशियन के तौर पर कभी कोई असुरक्षा नहीं महसूस हुई. जब मैं सेट पर जाती हूं तो किसी की मुझसे कुछ पूछने की हिम्मत नहीं होती- यह घमंड नहीं है, लेकिन एक टेक्नीशियन के तौर पर मेरा कॉन्फिडेंस है.

हर कॉरियोग्राफर आपकी तरह फिल्ममेकर नहीं बन पाया. वित्तीय संकट से जूझने वाले कॉरियोग्राफर्स के बारे में आप क्या सोचती हैं?

सिने डांसर्स एसोसिएशन के पास भारी मात्रा में पूंजी है, वह कहां जाती है? इसका इस्तेमाल रिटायर होने वाले डांसर्स की मदद में क्यों नहीं होता है. ये इनके लिए कोई योजना क्यों नहीं बनाते हैं? एसोसिएशन हर डांसर से एक निश्चित रकम डिपॉजिट कराती है और एसोसिएशन की मेंबरशिप 5 लाख रुपये जितनी महंगी है. शुरुआत में मैं इनके लिए लड़ी, लेकिन अब मैंने ऐसा करना छोड़ दिया है.

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2018 तकरीबन चुका है. आपका क्या प्लान है?

हमने एक आइडिया फिक्स कर लिया है. मैंने लिखना शुरू कर दिया है, उम्मीद है कि हम 2018 में शूटिंग शुरू कर देंगे.

क्या इसमें शाहरुख खान होंगे?

मैंने अपनी पहली और दूसरी फिल्म उनके लिए लिखी थी. अब मैं एक अच्छी स्क्रिप्ट पर काम कर रही हूं. यह एक मनोरंजक विषय है और मेरे जोन का है. यह आज की मूवी है.

खान्स के साथ काम करने के बाद युवा लॉट के साथ काम करने में कैसा लगता है?

ये सभी अच्छे हैं. और मैं रणबीर कपूर को बहुत पसंद करती हूं. लेकिन, खान्स जैसा स्टार पावर पाना मुश्किल है क्योंकि लोग बदल गए हैं. इनका एक मजबूत फैन बेस है जो कि सालों के दौरान तैयार हुआ है. मैंने बहुत सारे युवाओं के साथ खान्स जैसे इमोशनल नहीं हैं. यह उनके लिए अच्छा है कि वे चीजों के साथ इमोशनल तौर पर अटैच नहीं होते.

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लेकिन, खान अभी भी इमोशंस पर चलते हैं. इसी वजह से आज की पीढ़ी से कहा जाता है कि कोई भी तगड़ी दोस्ती या दुश्मनी अब होना मुश्किल है क्योंकि अब हर कोई सहयोगी है. सलमान खान और शाहरुख खान लड़े और फिर दोस्त बन गए. मैं और शाहरुख लड़े और दोस्त बन गए और ऐसा केवल इस वजह से हो सका क्योंकि यह प्यार था. ऐसे दिन वापस नहीं आएंगे क्योंकि यह क्लीनिकल दौर है और किसी को किसी की परवाह नहीं है.

प्रियंका चोपड़ा और दीपिका पादुकोण के इंटरनेशनल सितारे होने को लेकर आपकी क्या राय है?

मैंने मुझसे शादी करोगे और दोस्ताना फिल्में प्रियंका के साथ कीं और मैंने दीपिका को लॉन्च किया. सोचिए, ओम शांति ओम के 10 साल पूरे हो रहे हैं. यह सपने जैसा है जब आपने उनके साथ काम किया हो. दोनों आगे बढ़ी हैं, लेकिन दीपिका ने थोड़ी देरी की है. ओम शांति ओम के बाद के शुरुआती तीन साल उसने खो दिए. प्रियंका पहले दिन से अपने करियर को लेकर पक्की धुन में रही है. मुझे ऐसे लोग पसंद हैं.

ओम शांति ओम के बाद दीपिका ने कैसा सफर तय किया है?

यह देखिए कि वह कहां से कहां पहुंची हैं. मुझे पता था कि वह स्टार बनेंगी, लेकिन उन्होंने अपने अंदर जिस तरह के बदलाव किए हैं वे बेहतरीन हैं. अपनी आवाज से लेकर डायलॉग डिलीवरी तक हर चीज में उन्होंने बदलाव किया है. वह इतनी अच्छी अदाकारा बनेंगी इसका मुझे अंदाजा नहीं था. उन्होंने कड़ी मेहनत की है. हैपी न्यू ईयर में वह एक अलग शख्स थीं. उनमें जबरदस्त कॉन्फिडेंस है. उनकी सीन की समझ और परफॉर्मेंस से मैं हैरत में थी.

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