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Daddy Review: दिखावे पर ना जाओ, फिल्म के टाइटल पर अक्ल लगाओ

अगर अाप एक अंडरवर्ल्ड डॉन की कहानी बता रहे हैं तो उसका डार्क होना बेहद जरूरी है, असीम की इस फिल्म में यही नही है.

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Abhishek Srivastava Updated On: Sep 08, 2017 12:55 PM IST

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Daddy Review: दिखावे पर ना जाओ, फिल्म के टाइटल पर अक्ल लगाओ

कलाकार - अर्जुन रामपाल, फरहान अख्तर

डैडी को लेकर मेरी सबसे बड़ी शिकायत ये है कि अर्जुन रामपाल को किस बात का डर था? चाहे वो किरदार हो या तथ्य हो या फिर इतिहास- इन सभी के साथ निर्देशक असीम अहलूवालिया और निर्माता अर्जुन ने खिलवाड़ करने की कोशिश की है. नतीजा ये निकलता है कि एक ऐसा गैंगस्टर जिसकी जिंदगी वाकई में रोमांचक थी, जब वही चीज रुपहले पर्दे पर आती है तो वो बिल्कुल फीका और बासी सा लगता है.

भटक गए हैं असीम अहलूवालिया

फिल्म के निर्देशक असीम अहलूवालिया से जब मैंने कुछ दिनों पहले बात की थी तो उन्होंने यही बताया था कि फिल्म के लिए सारे राइट्स उन्होंने बाकायदा अरुण गवली से लिया था जिनके ऊपर फिल्म आधारित है. उन्होंने ये भी बताया था कि फिल्म बनाने के पहले उन्होंने शर्त रखी थी की वो ईमानदारी से फिल्म बनाएंगे और किसी को भी ग्लोरिफाई करने की कोशिश नही होगी. लेकिन फिल्म देखने के बाद लगता है कि असीम इन सारी बातों को फिल्म बनाते वक्त भूल गए थे. देखकर आश्चर्य होता है कि ये वही असीम है जिनकी पहली फिल्म मिस लवली कान्स फिल्म फेस्टिवल तक होकर आई थी.

कहानी से नहीं हुआ है न्याय

डैडी की कहानी मशहूर गैंगस्टर अरुण गवली के बारे में है. कहानी बताती है कि किस तरह से मुंबई के एक मिल कर्मचारी का बेटा आगे चलकर बंबई शहर का बेखौफ डॉन बन गया. फिल्म की कहानी गवली के डॉन में तब्दील होने पर ज्यादा वक्त जाया नही करती है.

डैडी फिल्म क्लेम करती है कि ये सच्ची कहानी पर आधारित है लेकिन जिस तरह से चीजों को फिल्म में दिखाया गया है, उसको देखकर यही लगता है कि सच्ची के साथ खिलवाड़ किया गया है. फिल्म में अर्जुन रामपाल जो कि अरुण गवली के किरदार में हैं उनको एक डॉन के रुप में दिखाया गया है और उनका वो रूप जिसमें मर्डर, अपहरण, लूट-खसोट वगैरह शामिल थे उसको कहीं छोड़ दिया गया है.

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फिल्म में दिखाया गया है कि अर्जुन का डॉन वाला भयानक रूप कहीं दबा हुआ है अपने परिवार और अपने दोस्तों के प्रति प्रेम को लेकर. लेकिन तब आपका ध्यान फिल्म के टाइटल पर भी जाता है कि इसका नाम तो डैडी है, तो इसमें उनके एक किलर या स्मगलर होने की बात क्यों करे और ये फिल्म यही मात खा जाती है. हमें अरुण गवली का सच्चा रुप देखना था ना कि उनका प्रेम उनके परिवार और दोस्तों के लिए.

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सेपिया टोन की वजह से असीम ने ८० के दशक का माहौल तो फिल्म में क्रिएट जरुर कर दिया है लेकिन इस रंग रोगन के चक्कर में वो फिल्म की नब्ज को पकड़ नही पाए हैं. वेशभूषा, आइटम सॉन्ग और बंदूकों की भिड़ंत की मदद से उन्होंने एक माहौल जरुर बना दिया है लेकिन फिल्म की कहानी इस चक्कर में धरी की धरी रह गई है.

अभिनय भी है कमजोर

अर्जुन रामपाल का रंगरूप, वेशभूषा और चाल-ढाल असल अरुण गवली से तो जरुर मिलता है लेकिन अगर उनके अभिनय की बात करें तो वो इसमें जान नही डाल पाए हैं. फिल्म मे कुछ सीन्स जरुर ऐसे हैं जब अर्जुन की कलाकारी दिखाई देती है लेकिन ज्यादातर जगहों पर वो फ्लैट ही नजर आता है.

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शिकायत इस बात को भी लेकर है कि फिल्म में दाउद का नाम क्यों नही इस्तेमाल किया गया है. दाउद को मकसूद बनाने के पीछे कौन सी वजह थी. फरहान अख्तर इस फिल्म मे मकसूद बने हैं लेकिन उनका भी कमोबेश हाल अर्जुन वाला ही हैं. वो अपने किरदार में जान नही डाल पाए हैं और इसके लिए एक हद तक जिम्मेदार उनकी आवाज भी है. निशिकांत कामत भी फिल्म में एक भ्रष्ट पुलिस असर के रोल में हैं जो डैडी को मकसूद के कहने पर परेशान करता है. बी आर ए गैंग के बाकी दो मेंबर है- आनंद इंगले और राजेश श्रृंगारपुरकर और इन दोनों का काम बेहतर है फिल्म में.

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इस फिल्म की वही परेशानी है जो पिछले साल इमरान हाशमी अभिनीत फिल्म अज़हर का हुआ था. अज़हर और डैडी में समानता ये है कि ये दोनों ही किरदार ऐसे हैं जो कानून की दूसरी तरफ चले गए थे और मिल्खा या मैरी कॉम की तरह ये पॉजिटिव किरदार नही थे.

बेजान है डायलॉग्स

अज़हर और अरुण गवली की कारगुजारियों से दुनिया वाकिफ है तो फिर उनके कृत्यों पर पुताई क्यों करना. जब आप ऐसे किसी किरदार को ग्लोरिफाई करने की कोशिश करते हैं तब उसी वक्त आप अपने हथियार डाल देते हैं और फिर उसे पचाना मुश्किल हो जाता है. डायलॉग की भी बात करें तो वो भी बेहद ही साधारण है जो बेअसर साबित होते हैं और जान कतई नही फूंक पाते हैं.

अगर अाप एक अंडरवर्ल्ड डॉन की कहानी बता रहे हैं तो उसका डार्क होना बेहद जरूरी है, असीम की इस फिल्म में ये भी नही है. ये फिल्म कई फ्रंट्स पर निराश करती है. अगर ऐसा किरदार जिसका कानून से अक्सर पाला पड़ा था, उसकी सहमति लेकर फिल्म बनाएंगे तो ये बात तो निश्चित है कि उसका भी पक्ष आपको रखना पड़ेगा. डैडी का ट्रेलर अलबत्ता निराला था लेकिन पूरी फिल्म एक सजा है.

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