S M L

ऋषि कपूर : अमिताभ को सभी सह कलाकारों का शुक्रिया अदा करना चाहिए था...

ऋषि कपूर का सबसे बेबाक इंटरव्यू कपूर खानदान, रणबीर, अमिताभ सभी पर ऋषि कपूर की खरी-खरी

Abhishek Srivastava Updated On: Sep 12, 2017 09:16 PM IST

0
ऋषि कपूर : अमिताभ को सभी सह कलाकारों का शुक्रिया अदा करना चाहिए था...

ऋषि जी, आपकी आने वाली फिल्म पटेल की पंजाबी शादी से हम क्या उम्मीद लगा सकते है?

ये फिल्म दो किरदारों के बारे में है जो दो अलग वातावरण से आते हैं. इस फिल्म का मैसेज बिल्कुल साफ है कि सभी को मिलजुल कर सौहार्द से रहना चाहिए. अगर इसको मैं किसी उदाहरण के तौर पर समझाऊं तो मैं अपनी पहली फिल्म बॉबी के बारे में कहूंगा. आप उस फिल्म से ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया को हटा दीजिए और उसको उस फिल्म में जो रोल प्राण और प्रेम नाथ ने निभाया था उनकी नज़रों से देख लीजिए. ये एक कल्चर के बारे में है जो दूसरे के बिना जिंदा नहीं रह सकता है.

ऋषि जी, आप उस जमाने से आते हैं जब किसी गाने का निर्माण होता था तो अभिनेता, गायक, संगीतकार सभी एक साथ मिल बैठ कर उसके ऊपर काम करते थे. लेकिन आज के जमाने में एक ही फिल्म में चार संगीतकार काम करते हैं.

आजकल कई लोग मुझसे शिकायत करते हैं कि उनके काम की कद्र नहीं होती है. वो कहते हैं कि अगर हम कुछ अच्छा लिखते हैं तो म्यूजिक कंपनी उसे कूड़ा करार देती है. आजकल के जमाने में म्यूजिक कंपनी के लोग बॉस बने हुए हैं. म्यूजिक कंपनी यही कहती है कि हमें कोई लंबा चौड़ा गीत नहीं चाहिए, उसमें सिर्फ तुकबंदी फिट कर दो. आजकल संगीत का निर्माण होता है रिंगटोन के लिए. आजकल की जो पीढ़ी है वही उसके लिए जिम्मेदार है. हम तो समाज का आईना हैं. जो समाज को चाहिए हम वही देते हैं. अगर आपको कूड़ा पसंद है तो आपको तो वही मिलेगा. आजकल रेस इसी की है कि कौन भद्दे और मोटे स्वर में गा सकता है. आजकल किसी भी गायक की शेल्फ लाइफ नहीं है. वो सभी दो साल के अंदर ग़ायब हो जाते हैं. क्या वजह है कि आज के जमाने लता, रफ़ी, किशोर, मुकेश और आशा नहीं हैं. इन सबके जिम्मेदार हम ही हैं.

क्या आर के बैनर फिल्मों का निर्माण फिर से शुरु करेगा.

आजकल सभी चीजें बदल गई हैं. ये सवाल मुझसे किसी ने कुछ दिन पहले ही पूछा था. शायद ऐसा हो सकता है कि हमारे अंदर आज के जमाने में खुद को बचाए रखने की युक्ति हमारे अंदर नहीं है. हमें सिखाया गया था कि सिनेमा बनाने का एक खास अंदाज़ होता है. शायद हम अब पुराने जमाने के लोग हो चुके है. शायद हमें अब आज के टैलेंट को लाना पड़ेगा हमारे लिए फ़िल्मों को बनाने के लिए. आरके के जमाने में फिल्मों को बनाने का एक परंपरा थी लेकिन लगता है कि आजकल फिल्म बनाना एक तरह का समझौता हो गया है.

ऋषि जी क्या लगता है आपको कि आज के जमाने में भी एक औसत हीरो से ज्यादा फिल्में आपको ऑफर की जाती हैं

मैं आपको बताऊं कि 20-30 साल पहले जब रोमांटिक हीरो की दुकान बंद हो गई थी तो उसके बाद आपको या तो हीरो या फिर हीरोइन के पिता का रोल निभाने का ऑफर मिलता था. इसके अलावा और कोई दूसरा काम नहीं था. राजेंद्र कुमार, शम्मी कपूर जैसे अभिनेताओं का जब गोल्डन एरा खत्म हो गया तब उनकी अहमियत खत्म हो गई थी. लेकिन बच्चन साहब की वजह से इसमें बदलाव आया है क्योंंकि उनकी वजह से चीजें बदलीं और उनकी वजह से हम जैसे लोगों को काम मिल रहा है. आज की तारीख में पटेल की पंजाबी शादी जैसी फिल्में बन रही हैं जबकि इसमें कोई भी बिकने वाला सितारा नहीं है.

इसकी वजह ये है कि उस वक्त सिंगल थियेटर का दौर था और जनता हमारी हर चीज माफ़ कर देती थी वो मनोरंजन के नाम पर कुछ भी ले लेते थे. सिर्फ दो तरह की फिल्में उस दौर में बनती थीं - भाईयों के बिछड़ने की कहानी या फिर कोई प्रेम कहानी और कुछ नहीं. लेकिन जब से मल्टीप्लेक्स का चलन शुरु हुआ है एक वर्ग है समाज का जो सोचता है और 300 रुपए की टिकट के लिए अपनी जेब ढीली कर सकता है. इस तरह की जनता ने अलग तरह की फिल्में को सराहा और ये संभव कर दिखाया है की ऐसी फिल्में बन सकती हैं और इसी की वजह से हमें काम मिलने लगा. इस तरह की जनता की मानसिकता आटो वाले से अलग है जिसे सिर्फ बजरंगी भाईजान और साउथ की भद्दी फिल्में देखनी हैं. पटेल की पंजाबी शादी सिर्फ ऐसे लोगों की बदौलत ही बन पाई है. इन्होंने हिंदुस्तान को अच्छी फिल्मों को बनाने का मौका दिया है.

अगर आप अलग सिनेमा की बात करते हैं तो आपको नहीं लगता की आपके बेटे रणबीर भी आज के जमाने के अभिनेताओं में सबसे आगे है इस तरह की फिल्मों को करने के मामले में?

मैं ये मानूंगा कि रणबीर ने एक अलग रास्ता अपनाया है. उसने अपनी मां को बता दिया था कि उसे ऐसी फिल्में नहीं करनी हैं जिसमें उनको बेसबॉल कैप पहनना पड़े, स्केटबोर्ड पर चलना पड़े और पीछे 40 लोग एक साथ डांस कर रहे हों. शुरु में लोगों ने मुझसे कहा था कि रणबीर अपना करियर खुद ही बर्बाद करने पर क्योंं तुला हुआ है तो मेरा जवाब यही होता था कि उसके करियर में मैं दखल नहीं देता हूं. अगर मेरी चलती तो मैं उसको वेक अप सिद, रॉकस्टार, रॉकेट सिंह और बर्फी जैसी फिल्में साइन करने नहीं देता. मुझे याद है जब रणबीर ने बर्फी साइन की थी तब मेरे भाई ने मुझसे कहा था कि ये आत्महत्या क्यों कर रहा है अपने करियर के साथ. लेकिन उसने सभी को गलत साबित किया. मैं रणबीर के हर फिल्म के साथ इत्तेफ़ाक नहीं रखता हूं लेकि ये उसका खुद का करियर है. मेरे पिता ने मेरे करियर में दखल नहीं दिया था. मैं एक अलग पीढ़ी से हूं.

आपको लगता नहीं कि ऋतिक और कंगना की लड़ाई को अब कुछ ज्यादा ही तूल दे दिया गया है?

मैं इसके ऊपर कमेंट नहीं कर सकता हूं. इसका मेरी आने वाली फिल्म से कुछ भी लेना नहीं है. मैं प्रधानमंत्री के करीब हो सकता हूं लेकिन कृपया इसके बारे में मुझसे आप ना पूछें.

Amitabh-Rishi-Kapoor

आप ट्वीटर पर बेहद सक्रिय है, हर दिन आपके ट्वीट पर कोई ना कोई खबर बन जाती है.

देखिए आज की मीडिया का ये है कि उसे कुछ ना कुछ हमेशा लिखना होता है. मैं हमेशा देखता हूं कि कुछ ना कुछ मेरे बारे में लिखा ही जाता है. उसमें से कई तो पूरी तरह से कूड़ा होते हैं. आप किसके ऊपर उंगली उठाएंगे. आपको ये सब कुछ विथ ए पिंच ऑफ सॉल्ट की तरह लेना पड़ेगा. मैंने ये बात अपने बेटे को भी बोली है कि तुम्हारे बारे में अच्छा खराब सब लिखा जाएगा. कई बार नेगेटिव पब्लिसिटी भी पब्लिसिटी होती है. आप खबर में रहते हैं. ये बात हम सभी अभिनेताओं को समझनी पड़ेगी.

आप ये कहना चाहते हैं कि जो कुछ भी आप ट्वीटर पर लिखते हैं वो पब्लिसिटी के लिए होता है.

बिल्कुल नहीं. अगर ऐसा होता तो मैं खुद का और सरकार का मज़ाक नहीं उड़ाता.

आजकल एक ट्रेंड दिख रहा है कि जिन फिल्मों में देसी खुश्बू होती है, दर्शक उसे बेहद पसंद कर रहे हैं. क्या कहना है आपको जनता के स्वाद को लेकर. इस साल फिल्में धड़ाधड़ फ्लॉप हुई हैं.

अगर आपकी फिल्म में मनोरंजन नहीं है तो बेहतर होगा कि आप अपनी फिल्म दूरदर्शन के लिए बनाएं. आप मनोरंजन कर दे रहे हैं और फिल्मों में मनोरंजन ही नहीं है. अगर आपको उपदेश देना है तो बेहतर होगा कि आप किसी चर्च में जाकर पादरी से मिलें. आप बोरिंग सिनेमा नहीं बना सकते हैं. हमारा देश इकलौता ऐसा देश होगा जहां पर लोग रोने के लिए पैसे देते हैं. मेरे दादा ने एक फिल्म बनाई थी नानक नाम जहाज़. आपको जान कर आश्चर्य होगा कि जब लोग इस फिल्म को देखने जाते थे जो घुसने से पहले वो अपनी चप्पलें निकाल देते थे. जब बॉबी रिलीज हुई थी तब दिल्ली से गाज़ियाबाद और गुरग्राम के लिए स्पेशल बॉबी बसें चलती थीं ताकी वो लोग सिनेमा का लुत्फ़ उठ सकें क्योंकि गाज़ियाबाद और गुरग्राम में बॉबी कुछ समय के बाद रिलीज हुई थी. इस देश में इस तरह के दर्शक हैं.

कपिल शर्मा के शो में अपनी बायोग्राफी को प्रमोट करने गए थे ऋषि कपूर

कपिल शर्मा के शो में अपनी बायोग्राफी को प्रमोट करने गए थे ऋषि कपूर

आपकी कुछ फिल्में जो सत्तर के दशक में आई थी वो लॉजिक की हदें पार कर जाती हैं.

मनमोहन देसाई ने मुझसे एक बार कहा था कि हमारी जनता कुछ भी स्वीकार करने को तैयार रहती है. अगर मैं बेतुकी फिल्में बनाता हूं तो उसे भी मैं पूरी आस्था के साथ बनाता हूं. ज़रा याद कीजिए अमर अकबर एंथनी का वो सीन जब तीनों अभिनेता अपनी मां को अपना खून देते हैं. ऐसा लगता है कि मानो आप किसी पेट्रोल स्टेशन पर तेल ले रहे हैं. उसी फिल्म में सभी विलेन हम लोगों को ढूंढ रहे हैं और हम उनके अड्डे पर भेष बदल कर गाना गा रहे हैं और वो हमें पहचान भी नहीं पा रहे हैं. ये सब कैसे हो सकता है. लेकिन बात वही पर रुक जाती हैं कि उस फिल्म को आज भी लोग पसंद करते हैं.

कभी आपने मनमोहन देसाई से ये बात पूछी थी की ऐसा वो क्यों करते थे?

कितनी बार हम लोगों ने उनसे से बात पूछी थी लेकिन पूछने पर हमें गालियां ही सुनने को मिलती थीं. वो चिल्ला कर बोलते थे कि आप लोगों को फिल्म में काम करने के पैसे मिल रहे हैं. आप लोग अपना पैसे लीजिए और जैसा डायरेक्टर कह रहा है बिल्कुल वैसे ही कीजिए. लेकिन ये बात भी थी की वो बिल्कुल अलग तरह के थे और उनकी जैसी आस्था और किसी निर्देशक में नहीं थी. ये सब कुछ मज़ाक में ही होता था क्योंकि हम सभी को पता रहता था कि मन जी ऐसी फिल्में ही बनाते हैं.

Rishi Kapoor 1

आजकल बायोपिक बनाने का चलन है, क्या लगता है आपको कि आने वाले समय में हम पृथ्वी राज कपूर और राज कपूर के ऊपर कोई बायोपिक देखने का मौका मिलेगा.

राज कपूर के ऊपर बायोपिक बनाने की बात 15 सालों से चल रही है. बॉबी बेदी जिन्होनें बैंडिट क्वीन का निर्माण किया था उन्होंने हमको हमारे पिताजी के ऊपर बायोपिक बनाने का ऑफर दिया था. लेकिन पूरे परिवार को कुछ चीजों को लेकर आपत्ति थी. हम नहीं चाहते थे की जब तक हमारी मां हमारे साथ है हमारा ऐसा कुछ भी करने का इरादा नहीं है. मेरी बहन ने सुनील दत्त साहब से भी संपर्क साधा था कि क्या वो अपनी ओर से हमें राज जी के ऊपर बायोपिक बनाने की अनुमति देंगे. उन्होने यही कहा था कि अगर चीजों को वैसे ही छोड़ दे तो बेहतर रहेगा. हम ऐसा कुछ भी करना नहीं चाहते है जिससे परिवार या फिल्म जगत में किसी तरह का मनमुटाव आ जाए. आप एक बायोपिक बनाएं और उसमें वो सारी चीजें शामिल ना करें जो हुई थी तो गलत होगा. राज जी और नर्गिस के बीच संबंध थे जो मैंने अपनी आत्मकथा में भी लिखा है. मुझे सनसनी नहीं फैलानी है और इसके लिए मुझे पैसे भी नहीं चाहिए. अगर कुछ लोग हमारी इच्छा के खिलाफ उनके ऊपर कोई बायोपिक बनाने की कोशिश करेगा तो हम लोग उसे नकार देंगे. यही वजह है कि बायोपिक हमने नहीं बनाई है.

आपने अपनी आत्मकथा खुल्लम खुल्मा में अमिताभ बच्चन के बारे में जिक्र किया है जो काफी चर्चा में थी.

लोग मेरी बातों को ठीक से समझ नहीं पाए. मेरा सिर्फ ये कहना था कि उस दौर में दो तीन हीरो वाली फिल्मों का चलन था. मेरे फिल्मी करियर में मेरे निर्देशक, सह कलाकारों, गायक, संगीत कार इन सभी का एक बड़ा योगदान है. जैसे दीवार शशि कपूर के बिना अधूरी है कुछ वही हाल शोले में धर्मेंद्र, काला पत्थर में शत्रु और अमर अकबर एंथनी विनोद खन्ना और ऋषि कपूर को लेकर है.  उनकी सफलता की सीढ़ी में हम भी पायदान बने. अमिताभ बच्चन आज के दौर में सबसे महान कलाकार हैं. हमें पता रहता था कि सबसे अच्छा लिखा हुआ किरदार उनके नाम ही रहेगा. हमें उनसे नीचे के रोल करने में कोई आपत्ति नहीं होती थी. उनके साथ काम करना 100 मीटर की दौड़ होती थी. हम जीरो पर खड़े होते थे और अमिताभ 50 मीटर पर. मेरा सिर्फ ये कहना था कि जिन कलाकारों के साथ उन्होने काम किया उन सभी को धन्यवाद देना चाहिए था.

आपके जमाने की अभिनेत्रियां काम नहीं कर रही हैं, इसकी क्या वजह है?

शायद इसकी ये वजह हो सकती है की ज्यादातर फिल्में औरतों के ऊपर नहीं लिखी जाती हैं. मैंने कुछ दिन पहले ट्वीट करके श्रीदेवी से गुज़ारिश की थी को साल में दो फिल्में करें. लेकिन शायद सभी का अपना नज़रिया होता है. किसी को पैसे की दरकार है तो किसी को कुछ और. अब जब उनका सुनहरा वक्त जा चुका है तो सभी को अब फिल्मों में मदर इंडिया बनना है. उनको इस बात की समझ नहीं है कि जब नर्गिस ने मदर इंडिया का रोल किया था तब उनका गोल्डन फेज चल रहा था और वो महज 27 साल की थीं. लेकिन यहां पर हम कोशिश मदर इंडिया जैसी फिल्मों से करते हैं. वो आपको ऐसा रोल क्यों देंगे. ऐसे रोल के लिए वो दीपिका या प्रियंका के पास ना जाए. उनको इस बात की समझ नहीं है. ऐसे डूबते हुए सितारों को ऐसा रोल क्यों मिले. वो देश के बड़े सितारों को ऐसा रोल क्यों ना दें.

कह सकते हैं कि आपकी फिल्मी पारी का फिलहाल बेस्ट फेज चल रहा है?

जी हां बिल्कुल. मैं ऐसे नहीं कहूंगा की मैंने 25 साल बर्बाद किए हैं. उससे मेरा स्टारडम बना हुआ था. मैं देश का चोटी का सितारा नहीं था लेकिन मेरा नाम देश के चार बिकाऊ सितारों में ज़रुर शामिल था.  मैं अपने लुक की वजह से हेमा मालिनी, ज़ीनत अमान, परवीन बॉबी जैसे बड़ी अभिनेत्रियों के साथ काम नहीं कर पाया क्योंकि स्क्रीन पर वो मुझसे बड़ी लगती थी. मुझे काम करने का मौका मिला नीतू और नई अभिनेत्रियों के साथ.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi