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फिर गांधी की शरण में पहुंचे बोमन ईरानी..इस बार पूछेंगे बापू से सवाल

मैं चाहता हूं कि गांधीजी अंग्रेजों या सिस्टम को कई सवालों के जवाब दें

Runa Ashish Updated On: Mar 21, 2017 08:23 AM IST

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फिर गांधी की शरण में पहुंचे बोमन ईरानी..इस बार पूछेंगे बापू से सवाल

'लगे रहो मुन्नाभाई' में बोमन ईरानी को बड़े-बड़े लोगों के साथ फोटोशॉप की गई तस्वीर लगाने का शौक था. इस फिल्म में वे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ भी ऐसी तस्वीर लगाना चाहते थे.

रील लाइफ में बोमन गांधीजी का रोल भी कर चुके हैं. इस बार गांधीजी पर बनने वाले पहले म्यूजिकल में वे गांधीजी से कई सवाल भी पूछेंगे. 'गांधी- द म्यूजिकल' में  बोमन ब्रिटिश राज या सिस्टम की आवाज बने हैं जो गांधीजी से कई सवाल पूछता है. कभी उनकी बातें सुनता है तो कभी उन पर अचरज भी करता है.

इस म्यूजिकल के बारे फ़र्स्टपोस्ट की संवादाता रूना आशीष ने उनसे बातचीत की है.

इस म्यूजिकल में अपने करैक्टर के बारे में बोमन ईरानी कहते हैं कि, 'मैं इस म्यूजिकल में किसी कैरेक्टर की तरह हूं जो लगभग 13-14 लोगों की आवाज है.'

इसमें कभी मैं ब्रिटिश राज बना हूं तो कभी दक्षिण अफ्रीका में बसा रिपोर्टर भी बना हूं. ये आवाज पहले ही रिकॉर्ड कर ली गई है. यह म्यूजिकल करते समय मुझे बहुत मजा आया है.

बोमन इससे पहले 2014 में स्कूल के बच्चों के लिए एक ड्रामा कर चुके हैं. जो लगभग एक दशक के बाद नाटकों की दुनिया में उनकी वापसी थी.

बोमन आगे बताते हैं कि जब मैंने 1998 में 'महात्मा वर्सेस गांधी' किया था, तब मैंने गांधीजी के बारे मे जो भी जानकारी मिल सकती थी वो सब मैंने पढ़ी थी. और उनपर बनी फिल्में भी देखी थीं. वो पढाई मुझे इस म्यूजिकल में भी काम में आई.

तो उसमें और इस बार में कितना अंतर आपको महसूस हुआ, क्योंकि उस नाटक में तो आप खुद गांधी बने थे?

हां, इस बार मैंने गांधीजी के नए स्वरूप को पाया. नाटक 'महात्मा वर्सेस गांधी' में मेरा बहुत ही कठिन रोल था. इस म्यूजिकल के जरिए मुझे गांधीजी और भी ज्यादा समझ में आए. इस बार के नाटक में मैंने गांधीजी के सेंस ऑफ ह्यूमर को देखा और पाया. कैसे वे बिना किसी परेशानी के अहिंसा के साथ, बिना किसी को नीचा दिखाते हुए अपनी बात कह देते थे और सामने वाला सोचता रह जाता था.

गांधीजी के विचारों और अहिंसा के बारे में बहुत कुछ कहा गया है लेकिन कोई नहीं जानता है कि वे बहुत मजाक भी करते थे. तो जब मैं गांधी का रोल निभा रहा था तो मुझे हर वक्त बहुत सभ्य और सौम्य रहना होता था. लेकिन इस बार मैं बहुत स्वतंत्र हो कर काम कर रहा था.

मैंने गांधी जी से इस तरह से सवाल किए कि मैं खुद गांधीजी के उस रूप के लिए एक प्लेटफॉर्म बना सकूं ताकि दर्शकों को गांधीजी के स्वाभाव और विचारों को समझने में आसानी हो सके. ऐसा इसीलिए हुआ क्योंकि मैंने महात्मा वर्सेस गांधी नाटक किया था.

जब भी हमारे देश में किसी व्यक्ति विशेष पर आधारित कोई नाटक हो या कोई बायोपिक हो तो उसमें व्यक्ति के अच्छे पहलू को ही दिखाया जाता है. जबकि शख्स में बुराइयां भी तो होती हैं ना.

हां हम उस फिल्म या नाटक में शख्सित को वैसा देखते हैं जैसा हम उस शख्सियत को जानते आए हैं. 'महात्मा वर्सेस गांधी' में हमने गांधी को एक आम इंसान के तौर पर दिखाने की कोशिश की थी. वैसे भी गांधीजी तो खुद कहते थे कि मैं इंसान हूं कोई संत तो नहीं हूं.

गांधीजी खुद अपने मन के भीतर की कमियों को जानते थे. इस बात की वजह से गांधीजी और भी महान लगने लगते हैं. 'गांधी- द म्यूजिकल' को बहुत अच्छे तरीके से लिखा गया है.

जब मैं नाटक में गांधीजी से बातें कर रहा हूं तो मुझे इसलिए मजा आ रहा है क्योंकि मैं चाहता हूं कि गांधीजी अंग्रेजों या सिस्टम को कई सवालों के जवाब दें.

अपने नाटक 'महात्मा वर्सेस गांधी' में मैंने बहुत सारे लोगों को जवाब दिए थे लेकिन इस बार गांधीजी से मैंने सवाल पूछे हैं.

आज के समय में पारसी थिएटर के लिए क्या कहेंगे आप?

पारसी थिएटर तो लगभग 100 साल पहले ही मर गया है. आज जो आप देख रही हैं वो गुजराती थिएटर हो रहा है. पारसी थिएटर असल में उर्दू और हिंदी में हुआ करता था. बाद में इन थिएटरों ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को स्थापित करने में बहुत योगदान दिया.

आजकल जो नवरोज़ पर पारसी थिएटर करते हैं वो मुख्य तौर पर कॉमेडी और गुजराती प्ले होते हैं. सिली पॉइंट प्रोडक्शन्स कंपनी 'गांधी- द म्यूजिकल' बना रही है. यही कंपनी नवरोज़ पर एक पारसी प्ले करने वाली है. नवरोज़ 21 मार्च को है.

पारसी लोगों को प्ले देखना बहुत अच्छा लगता है. यह हमारे संस्कृति में है. अली मर्ज़बान, होमी तवाड़िया और नादर नरीमन जैसे जाने-माने नाम पारसी थिएटर में रह चुके हैं.

ये लोग बहुत कमाल की कॉमेडी करते थे और उनके नाटक आज भी नवरोज़ के दिन रिप्रोड्यूस करके दिखाया जाता है. एक और चीज होती है जो कॉमेडी रिव्यू कहलाती है. इसमें डांस गाना सब होता है. अदि मर्ज़बान इस तरह के प्रोडक्शन के लिए 60 और 70 क दशक में जाने जाते थे. इसमें कभी कोई फनी डांस कर लेता है तो कोई वन लाइनर सुना के चला जाता है जो बहुत ही एंटरटेनिंग होता है.

आप नवरोज़ पर क्या कर रहे हैं?

नवरोज़ पर हम सारे घर वाले एक नाटक देखने जाना वाले हैं- अमर, अकबर अकूरी. जो कि यही प्रोडक्शन कंपनी बना रही है. हम सारे घरवाले मिलेंगे. शाम को ड्रामा देखने जाएंगे और फिर हम सभी डिनर पर जाएंगे.

हम पारसी लोग यही करते हैं. नाटक हम लोगों के लिए मनोरंजन का एक बड़ा साधन होता है.

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