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जब बच्चन साहब के लिए चुराए गए गाने पर संजय दत्त हक जमा बैठे

चोरी के आइडिया पर दो स्टार्स की लड़ाई सच में बड़ी शर्मनाक है.

Animesh Mukharjee | Published On: May 08, 2017 08:22 AM IST | Updated On: May 08, 2017 08:22 AM IST

जब बच्चन साहब के लिए चुराए गए गाने पर संजय दत्त हक जमा बैठे

किसी भी क्रिएटिव आइडिया की चोरी में सबसे बड़ी मुश्किल जानते हैं क्या है? कोई और उसे ठीक उसी समय न चुरा ले. इंटरनेट के आने के बाद से किसी और के काम को अपने नाम से बेच देना बहुत मुश्किल हो गया है.

आज से 25-30 साल पहले ऐसा नहीं था. अड़ोस-पड़ोस के देशों में कुछ भी हिट हुआ, उठा लिया. दुनिया के किसी हिस्से में कोई नया पॉप स्टार उभरा उसके गानों को हिंदी में सुनवा दिया. मगर ऐसा भी हुआ है जब एक साथ एक ही गाने को दो लोगों ने अलग-अलग तरह से चुरा लिया हो. फिर क्या हुआ? चलिए बताते हैं.

तम्मा-तम्मा लोगे

अफ्रीकी पॉप स्टार हैं मोरे कांत. उनका एक एल्बम 80 के दशक में सुपर हिट हुआ. मशहूर संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने इस एलबम के तीन गाने अपने बना लिए. एक था अग्निपथ का थीम म्यूज़िक जो अमिताभ बच्चन के लिए फिल्म में कुछ जगह बजता है. दूसरा गाना उन्होंने प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘राम की सीता, श्याम की गीता’ के लिए रखा. गाने के बोल थे जुम्मा चुम्मा लोगे. अमिताभ बच्चन और श्रीदेवी को लेकर प्लान की गई ये फिल्म डब्बा बंद हो गई. लक्ष्मी-प्यारे ने इस गाने को मुकुल आनंद की फिल्म ‘हम’ के लिए इस्तेमाल किया. इसी के साथ उन्होंने कांत का ही एक और गाना हम के टाइटल सॉन्ग के लिए इस्तेमाल किया.

अब प्रकाश मेहरा ने संजय दत्त, माधुरी दीक्षित के साथ नई फिल्म बनाई ‘थानेदार’. इसमें बप्पी लाहिड़ी ने पूरी रचनात्मकता के साथ अंग्रेज़ी के ‘तम्मा-तम्मा लोडेड’ को तम्मा-तम्मा लोगे बना दिया. अब लक्ष्मी-प्यारे और बच्चन साब नाराज़ हो गए. 1991 में बच्चन के डगमगाते करियर में ये एक मात्र सुपरहिट चीज़ थी. उस पर भी 1990 की थानेदार ने डाका डाल दिया. बच्चन साहब ने उस दौर में जोश-जोश में एक इंटरव्यू भी दे डाला था. वैसे सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि हाल ही में जब तम्मा-तम्मा को फिर से फिल्म ‘बद्री की दुल्हनिया’ में इस्तेमाल करने की इजाज़त बप्पी लाहिड़ी ने फिल्म के म्यूज़िक डायरेक्टर को दी. अंतरआत्मा जैसी कोई चीज़ सुनी है क्या आपने.

सांसो की माला पे सिमरू मैं पी का नाम

माना जाता है कि ये कव्वाली नुसरत साहब ने 1979 में मीराबाई के एक भजन पर कंपोज़ की. इसके बाद ये नगमा काफी हिट हुआ. गुरद्वारों में बजा, मंदिरो में ‘शिव का नाम’ करके बजा. अब नुसरत साहब से तो हिंदुस्तान के म्यूज़िक डायरेक्टर इतनी मोहब्बत करते हैं कि उनके हर गाने को अपने नाम से इस्तेमाल कर लेते हैं.

पाकिस्तान से प्रेरणा की धारा बहा देने वाले नदीम श्रवण ने ये गाना 1996 की सनी देओल और करिश्मा कपूर की फिल्म ‘जीत’ में जस का तस ले लिया. इसी गाने को दर्दभरा बनाते हुए राजेश रौशन ने 1997 में ‘कोयला’ फिल्म में इस्तेमाल कर लिया. अब राजेश भाई का तो हिसाब ये है कि दूसरों के गानों को अपने नाम से इस्तेमाल करने का कोई पुरस्कार हो तो ये पहले नंबर पर आएं.

एआर रहमान ने 'हम से है मुकाबला' के ज़रिए हिंदी सिनेमा में जो तहलका मचाया था वो कौन भूल सकता है. 'उर्वशी-उर्वशी' तो कल्ट था ही 'मुकाबला-मुकाबला ओ लैला' में सिर्फ कपड़ों में नाचते प्रभुदेवा हर डांसर के भगवान बन गए थे. राजेश रौशन ने क्या किया. 'मुक्काला', मूंह काला होगा.

अगर आपको लगता है कि आजकल इंटरनेट के आने से ऐसी चोरियां कम हो गई हैं. तो ठहरिए. ये जापानी धुन सुनिए. हिंदुस्तान के महान डायरेक्टर की फिल्म का यूट्यूब पर करोड़ों व्यूज़ के रिकॉर्ड तोड़ने वाला, नशे सा चढ़ने वाला गाना याद आ जाएगा.

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