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बॉलीवुड में कोई भी मेरिल स्ट्रीप नहीं हो सकता

मेरिल स्ट्रीप का ये बयान संयोगवश ओमपुरी के निधन के बाद आया है

Monobina Gupta Updated On: Jan 11, 2017 12:31 PM IST

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बॉलीवुड में कोई भी मेरिल स्ट्रीप नहीं हो सकता

बॉलीवुड के स्टार या कलाकार की पहचान अक्सर उनकी एक्टिंग की काबिलियत के तौर पर होती है न कि उनके निडर बयानों या सच कहने की क्षमता के कारण.

इसके उलट उन्हें अक्सर राजनीतिक और सैद्दांतिक दादागिरी के सामने घुटने टेकते हुए देखा गया है - वे कभी भी परेशानियों में घिरे अपने साथी कलाकारों या देशवासियों के साथ खड़े नहीं होते.

ये बॉलीवुड स्टार जिनका रुतबा बहुत बड़ा होता है, वे अक्सर अपने साथियों के बुरे वक्त में खुद फेल हो जाते हैं. खासकर तब जब कट्टर ताकतें और सरकारें उनके साथी कलाकारों के पीछे पड़ जाती हैं. ये सच मुंबई फिल्म इंडस्ट्री का सबसे दुखद पहलू है.

दुख की बात ये है कि दुनियाभर में फैले सेलिब्रिटी एक ही मिट्टी से बने नहीं होते. जब इन लोगों का सामना ऐसे दबंग या गुंडे किस्म के लोगों से होता है तो इनमें से कुछ ऐसे भी होते हैं जो न तो दबाने वालों के सामने सिर झुका कर उनकी गोद में बैठते हैं न ही उनकी जबान को कोई ताला लगा पाता है. वे दो-दो हाथ करने को पूरी तरह से तैयार रहते हैं.

प्रेरणादायी उदाहरण

बीते रविवार की रात हॉलीवुड की बेहतरीन अदाकारा मेरिल स्ट्रीप ने एक बेहद ही प्रेरणादायी उदाहरण पेश किया. ये नमूना था इस बात का कि हमारे सेलिब्रिटीज किस तरह से अपना गुस्सा जाहिर कर सकते हैं.

गोल्डन ग्लोब्स अवॉर्ड सेरिमनी में जब मेरिल स्ट्रीप को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया जा रहा था, तब स्ट्रीप ने इस अवसर को एक ऐसे हालात  में बदल दिया जिसमें पिछले नवंबर के राष्ट्रपति चुनावों के बाद अमेरिका का एक बड़ा वर्ग बहुत ही डरा हुआ और व्याकुल है.

अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की खतरनाक और भेदभाव से भरी राजनीति पर टिप्पणी करते हुए स्ट्रीप ने कहा: ‘हॉलीवुड में काम करने वाले बहुत सारे लोग या तो बाहर से हुए हैं या फिर वे विदेशी हैं. इन्हीं लोगों की वजह से ये इंडस्ट्री अब तक चल रही है भले ही वो मंद गति से हो. अगर हम उन्हें यहां से मारकर बाहर कर देते हैं तो हमारे पास देखने के लिए जो बचेगा वो सिर्फ मार्शल आर्ट और फुटबॉल होगा जो किसी भी तरह से कला की श्रेणी में नहीं आता है.'

उन्होंने आगे कहा- 'कलाकार का काम सिर्फ इतना होता है कि वो वैसे लोगों की जिंदगी में घुस सके जो हमसे अलग होते हैं और आपको ये एहसास कराना होता कि वे लोग या उन जैसा होना कैसा होता है. इस साल ऐसी कई सशक्त अदायगी हुई है जिसने हमें ऐसा महसूस कराया था. ये काम ऐसे थे जिन्होंने असाधारण रुप से हमारी भीतरी संवेदनाओं को जगाता है.’

चुनौतियों की बात

अपने बेहद ही भावपूर्ण संबोधन में, हॉलीवुड की इस सीनियर अभिनेत्री ने अमेरिकी जनता और खासकर सिनेमा से जुड़े लोगों के जीवन में आने वाली चुनौतियों के बारे में बात की.

उन्होंने वहां मौजूद लोगों को बताया कि कैसे- अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक विकलांग रिपोर्टर की नकल ने उन्हें बहुत दुखी किया. उन्होंने कहा - 'मैं उससे अब तक निकल नहीं पा रही हूं क्योंकि वो कोई फिल्म नहीं थी. वो असल जिंदगी की बात थी. जनता का कोई प्रतिनिधि, जो बहुत ताकतवर भी होता है और ऐसी कोई हरकत करता है तो उसका ये कृत्य अन्य लोगों के जीवन का भी हिस्सा हो जाता है क्योंकि ये एक तरह ऐसी चीजों या हरकतों को मान्यता देने जैसा होता है.'

donald trump

डोनाल्ड ट्रंप ने एक दिव्यांग रिपोर्टर का मजाक उड़ाया था

मेरिल स्ट्रीप के भाषण को सुनने के बाद हम ये सोचने को मजबूर हो जाते हैं, कि ऐसी स्थितियों में पड़ने पर बॉलीवुड कलाकारों का व्यवहार कितना अलग हो जाता है. कैसे वो सिर्फ अपने निजी अधिकारों को ही नहीं बल्कि अपने सामुहिक अधिकारों को बचा पाने में नाकाम रहे हैं - इतना ही नहीं कई बार वे ऐसे रुढ़िवादी और पतनशील फरमानों की पैरवी करने लगते हैं.

हाल ही हमने देखा कि कैसे राज ठाकरे की एमएनएस का एक हिस्सा नवनिर्माण चित्रपट कर्मचारी सेना ने बॉलीवुड स्टार शाहरुख खान और निर्देशक करण जौहर पर धौंस जमाने की कोशिश की थी. इन कलाकारों ने हारकर राज ठाकरे को विश्वास दिलाया कि वे भविष्य में पाकिस्तान कलाकारों के साथ काम नहीं करेंगे.

तमाशा और सुपरस्टार

ये पूरा तमाशा आने वाले सितंबर महीने में शाहरुख खान की रिलीज होने वाली फिल्म रईस को लेकर था जिसमें पाकिस्तानी अदाकारा माहिरा खान मुख्य भूमिका में है. यही वो कारण है कि शाहरुख को राज ठाकरे के सामने झुकना पड़ा और ये भरोसा देना पड़ा कि जब तक भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध सामान्य नहीं हो जाते हैं तब तक वे किसी पाकिस्तानी कलाकार के साथ काम नहीं करेंगे.

एमएनएस चित्रपट कर्मचारी सेना की सचिव शालिनी ठाकरे ने तो यहां तक कह दिया कि, ‘ये कोई लुका-छिपी वाली धमकी नहीं है. ये शाहरुख और करण जौहर जैसे निर्माताओं को हमारी खुली धमकी है जो पाकिस्तानी कलाकारों को अपनी फिल्म में लेते हैं.’ लेकिन पूरा बॉलीवुड चुप रहा.

एमएनएस नेता राज ठाकरे ने पाकिस्तानी कलाकारों के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया था

एमएनएस नेता राज ठाकरे ने पाकिस्तानी कलाकारों के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया था

ठीक इसी तरह से जब मोदी सरकार ने पिछले साल अभिनेता आमिर खान को असहिष्णुता पर दिए गए उनके बयान के कारण उन्हें अपना निशाना बनाया तब भी पूरा बॉलीवुड चुप रहा.

इन मामलों की तकलीफदेह सच्चाई ये है कि इस तरह के सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष उत्पीड़न में हमारे कलाकार अपनी लड़ाई अकेले लड़ते हैं, वो भी तब जब वे इन दबंगों का पैर दबाने के लिए खुद ही घुटने के बल न दौड़ पाते हों.

राजनीतिक तेवर

ऐसे वक्त में इंटस्ट्री के बड़े नाम अपने फायदे और अपनी सुरक्षा के लिए ज्यादातर चुप रहना पसंद करते हैं. लेकिन, इस तरह की चापलूसी के ठीक उलट मेरिल स्ट्रीप ने न सिर्फ अपनी बिरादरी के लोगों के हक में आवाज बुलंद की बल्कि एक ऐसे बड़े समुदाय के हक में आवाज उठायी जो पहले से हाशिए पर हैं और ट्रंप की राजनीति उन्हें डरा रही है.

देखा जाए तो स्ट्रीप की स्पीच में एक राजनैतिक तेवर था. उन्होंने कहा- ‘अगर हम किसी की अनादर करते हैं तो हमें बदले में वही मिलेगा, हिंसा के बदले हिंसा मिलेगी. जब कोई ताकतवर किसी कमजोर को दबाने की कोशिश करता है तो हम सब हारते हैं.’

मीडिया से बातचीत करते हुए, स्ट्रीप ने कहा- वे सरकार की जवाबदेही के लिए माहौल बनाएं और जनता से स्वतंत्र रिपोर्टिंग के लिए समर्थन मांगे. उन्होंने हॉलीवुड की फॉरेन प्रेस से विनती की, कि वे इस कमिटी का समर्थन करें ताकि पत्रकारों की रक्षा की जा सके. ये कहते हुए कि, ‘हमें उनकी जरुरत होगी और उन्हें सच को बचाने में हमारी.’

मेरिल स्ट्रीप का ये बयान संयोगवश भारतीय अभिनेता ओमपुरी के निधन के बाद आया है, जिन्होंने जीवन भर तरक्की और सुधारवादी कार्यों के लिए अपनी आवाज उठाई थी. लेकिन जिन्हें पाकिस्तानी कलाकारों को काम देने के मुद्दे पर हुए विवाद में बयान देने के कारण अंतिम समय तक परेशान किया गया.

और जैसी की बॉलीवुड की रवायत है उन्हें इस दौरान अपनी ही बिरादरी का साथ हासिल नहीं हुआ. इन दिनों हमें जो आवाजें बॉलीवुड से सुनाई पड़ती हैं वो अनुपम खेर सरीखे कलाकारों की होती है - और ये बॉलीवुड की उस सभ्यता की ओर इशारा करती है जो भारत की फिल्म इंडस्ट्री पर हावी है.

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