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जन्मदिन विशेष: मुंशी बनने के लिए टाइपिंग सीखते थे तिग्मांशु धूलिया

बॉलीवुड के सबसे बेहतरीन डायरेक्टरों में शुमार तिग्मांशु ने किसी समय भविष्य बनाने के लिए सीखी थी टाइपिंग और शार्टहैंड

Arun Tiwari Arun Tiwari | Published On: Jul 03, 2017 12:03 PM IST | Updated On: Jul 03, 2017 12:03 PM IST

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जन्मदिन विशेष: मुंशी बनने के लिए टाइपिंग सीखते थे तिग्मांशु धूलिया

किसी कलाकार की जिंदगी में कई बार ऐसा होता है कि सफलता उसका तब तक इंतजार करती है जब तक वो अपनी जड़ों की ओर लौटकर नहीं जाता है. कह सकते हैं कि जिन जगहों पर उसके निजी अनुभव रहे हैं वो ही अनुभव जब वो कला के किसी भी माध्यम के जरिए लोगों के सामने रखता है तो ज्यादा लोगों से कनेक्ट कर पाता है.

तिग्मांशु धूलिया वैसे ही कलाकार हैं. नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से पास आउट होने के बाद तिग्मांशु ने कई नामी गिरामी डायरेक्टर्स को असिस्ट किया. इनमें शेखर कपूर और केतन मेहता के नाम शामिल हैं. भारत की अब तक सबसे चर्चित फिल्मों में रही बैंडिट क्वीन के वो कास्टिंग डाटरेक्टर रहे. ये बात है लगभग 1995-96 की. लेकिन बैंडिट क्वीन की सफलता के बाद जब शेखर कपूर एलिजाबेथ बनाने के लिए हॉलीवुड चले गए तो तिग्मांशु के सामने खुद फिल्म इंडस्ट्री में डायरेक्टर के रूप में खड़ा करने की चुनौती आ गई.

हासिल फिल्म जिससे तिग्मांशु राष्ट्रीय फलक पर छा गए. उसका विचार उनके दिमाग में तभी से चल रहा था. तिग्मांशु इलाहाबाद के रहने वाले थे और उस शहर की बारीकियों को उन्होंने अपनी युवावस्था में बहुत करीब से देखा था.

वो हासिल फिल्म बनाना चाहते थे लेकिन कोई प्रोड्यूसर इसके लिए राजी नहीं हो रहा था. फिल्म का आखिरी सीन संगम के किनारे आयोजित होने वाले कुंभ पर फिल्माया जाना था. साल 2000 नजदीक आ चुका था लेकिन कोई भी प्रोड्यूसर हासिल पर पैसा लगाने के लिए तैयार नहीं था.

तिग्मांशु ने इसके लिए अपने दोस्तों को तैयार किया जो फिल्म में किरदार निभा रहे थे. इरफान खान तिग्मांशु के एनएसडी के समय से दोस्त थे. उन्होंने इरफान से बात की और ढाई लाख रुपए लेकर निकल पड़े इलाहाबाद अपने सपनों की फिल्म का क्लाइमेक्स सीन शूट करने के लिए. वहां उन्होंने संगम तट पर क्लाइमेक्स सीन शूट किया और फिर मुंबई वापस लौटकर प्रोड्यूसरों को दिखाया. क्लाइमेक्स सीन की भव्यता देखकर प्रोड्यूसर हासिल पर पैसा लगाने के लिए तैयार हुए और तब कहीं जाकर 2003 में वो फिल्म आई जिसने तिग्मांशु की जिंदगी के मायने बदल दिए.

मतलब जो तिग्मांशु धूलिया इतने सालों तक मुंबई में सफलता की राह देखते रहे वो उन्हें उन्हीं अनुभवों से मिली जो उन्होंने युवावस्था में हासिल किए थे. इस बात को खुद तिग्मांशु धूलिया ने एनडीटीवी के वीडियो प्रोग्राम में स्वीकार भी किया है कि मैं फिल्मी बैकग्राउंड से नहीं आया हूं. मेरी वो ही फिल्में लोगों के बीच ज्यादा अपील करती हैं जो मैंने अपने अनुभवों के आधार पर बनाई हैं. वो ये जवाब बुलेट राजा फिल्म के फ्लॉप हो जाने के सिलसिले में दे रहे थे.

हासिल ने सफलता के दरवाजे काफी हद तक तिग्मांशु धूलिया के खोल दिए थे. फिर उसके बाद 2004 में आई चरस हो या फिर 2011 में आई शागिर्द और साहिब बीवी और गैग्स्टर. तिग्मांशु फिल्म डायरेक्शन के क्षेत्र में हर अगली फिल्म के जरिए अपने ऐसे दर्शकों की संख्या बढ़ाते जा रहे थे जो उनकी फिल्मों का इंतजार करते हैं.

फिर 2012 में आई एक और फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर ने तिग्मांशु की जिंदगी का एक और रूप लोगों के सामने रखा. वो माफिया डॉन रामाधीर सिंह के रोल में नजर आए जो अगर फिल्म का हीरो नहीं था तो उससे कम भी नहीं था. इस फिल्म के डायरेक्टर अनुराग कश्यप से जब तिग्मांशु को इतना बड़ा रोल दिए जाने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा था कि आप तिशु ( तिग्मांशु को उनके नजदीकी इसी नाम से पुकारते हैं) को सिर्फ एक डायरेक्टर के रूप में जानते हैं, आप नहीं जानते कि उन्होंने एनएसडी से एक्टिंग का ही कोर्स किया है. वो एक मंझे हुए अभिनेता भी हैं. तिग्मांशु ने अपनी अदाकारी के जरिए इस बात को साबित भी किया.

तिग्मांश धूलिया की जिंदगी में उसके बाद पान सिंह तोमर जैसी फिल्म भी आई जिसने एक डकैत, जो पहले एक नेशनल रनर भी था, को लोगों से भावनात्मक रूप से ऐसा जोड़ दिया कि आम जिंदगी में भी उसके डायलॉग इस्तेमाल किए जाते हैं.

एक बड़े कलाकार को कई बार हम एक व्यक्तित्व के तौर पर भी तौलना चाहते हैं. ये आम इंसानी फितरत है. तिग्मांशु की ये शायद सबसे बड़ी खासियत है कि वो अपनी जिंदगी के बारे में इतनी सहजता के साथ बताते हैं कि जैसे लगता है वो जो कुछ भी हैं वह सब पाने में उन्हें शायद बहुत ज्यादा मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ा.

जज पिता और प्रोफेसर मां की औलाद तिग्मांशु धूलिया ने स्वीकार किया है कि भविष्य के बारे में सोचते हुए एक बार उनके घर वालों ने उन्हें टाइपिंग की प्रैक्टिस करने भेज दिया था. जिससे कम से कम मुंशी तो बन सकें. वो ये भी बताते हैं कि एनएसडी वो इसलिए नहीं आए थे कि थियेटर से कोई बहुत ज्यादा लगाव था. एनएसडी में जिस बात नें उन्हें सबसे ज्यादा आकर्षित किया थो वो था वहां के माहौल का खुलापन.

कामयाबी के बाद अगर आपकी अभिव्यक्ति सादगी से भरी हो तो वो सहज आकर्षण पैदा करती है. तिग्मांशु की एक और फिल्म रागदेष जुलाई महीने में रिलीज होने को तैयार है. वो इस समय उसकी प्रमोशन में लगे हैं. इस दौरान मीडिया से बातचीत के दौरान उनकी बेबाक बयानबाजी आसानी से सुनी जा सकती हैं. जन्मदिन मुबारक तिशु

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